आंसुओं
से मनुष्य जीवन का ऐसा नाता है कि यह संभव ही नहीं था कि जनश्रुतियों और पौराणिक
कथाओं में इनका उल्लेख न आए।
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बताते
हैं कि कई सदियों पहले एक आदमी सागर किनारे सील का शिकार करने गया। एक जगह उसे कई
सारी सील रेत पर बैठी दिखी, तो वह खुश हो गया कि आज उसे, उसकी
पत्नी और बेटे को भरपेट भोजन मिलेगा। वह सावधानी से आगे बढ़ने लगा लेकिन सीलों को
उसके आने की भनक लग गई और वे एक-एक कर फुर्ती से पानी में प्रवेश करने
लगीं। मगर एक सील रेत पर ही बैठी रही। आदमी ने सोचा, 'यह एक सील भी हमारे परिवार की भूख
मिटाने के लिए पर्याप्त है। शायद इसकी किस्मत में हमारा भोजन बनना ही लिखा है, इसीलिए
यह पानी में नहीं जा रही।" मगर पास जाकर जैसे ही वह उस सील पर
झपटा, वह
पलक झपकते ही पानी में समा गई। पहुंच के भीतर दिख रही दावत हाथ से निकल जाने पर
आदमी स्तब्ध रह गया। जब वह अपनी स्तब्धता से बाहर आया, तो उसने अपने भीतर एक विचित्र भाव
उमड़ते महसूस किया, जो उसने पहले कभी नहीं महसूसा था। उसके
मुंह से सिसकियों की अजीब-सी आवाज आ रही थी। तभी उसने पाया कि
उसकी आंखों से पानी जैसा कुछ झड़ रहा है। उसने अपनी आंखों को छुआ और उस पानी को
चखा। वह खारा था...। कहते हैं यही मनुष्य की पहली रुलाई
थी।
उत्तरी
अमेरिका के इनुइट आदिवासियों में रुलाई और आंसुओं की उत्पत्ति से जुड़ी यह कथा
कल्पना की भोली-सी उड़ान ही लगती है, जैसी कि जनश्रुतियां अक्सर होती हैं।
मगर गौर करें, तो यह विचार आता है कि भावनाओं के चरम पर पहुंचकर आंसू बहाने
का पहला मानवीय अनुभव शायद ऐसा ही कुछ रहा होगा। किसी उम्मीद पर तुषारापात जब दिल
तोड़ देने की हद तक तीव्रता से महसूस हो, तो भावनाओं का बांध फूट पड़ना लाजिमी
है। उदरपूर्ति का भी एक भावनात्मक पक्ष होता है और आदिम मानव के लिए तो शायद अपनी
व अपनों की भूख शांत करना उतनी ही बड़ी भावनात्मक जरूरत थी,
जितनी कि भौतिक।
कुल जमा यह कि बचपन को छोड़ दें, तो मनुष्य ने अपने पहले-पहले
आंसू भोजन के हाथ से निकल जाने पर बहाए होंगे, यह बहुत मुमकिन है। वैसे, आंसुओं
से मनुष्य जीवन का ऐसा नाता है कि यह संभव ही नहीं था कि जनश्रुतियों और पौराणिक
कथाओं में इनका उल्लेख न आए।
भारत
में रुद्राक्ष को भगवान शिव के आंसू माना जाता है। इसी प्रकार मिस्र में
मधुमक्खियों को सूर्य देवता के आंसू कहा जाता है। अमेरिका में ज्वालामुखी के लावा
में पाए जाने वाले ऑब्सीडियन नामक काले कांच-नुमा पदार्थ को अपाची आंसू भी कहा जाता
है। बताते हैं कि एक बार अमेरिकी सेना के हाथों अपनी हार को निश्चित मान अपाची
योद्धाओं ने पहाड़ से कूदकर अपनी जान दे दी थी। उनके परिजनों के आंसू जमीन पर गिरकर
ऑब्सीडियन बन गए।
ग्रीक
मिथकों में नायबी नामक रानी के बारे में बताया जाता है, जिसके सात बेटे और सात बेटियां थीं। एक
दिन उसने देवराज ज़्युस की पत्नी लीटो के समक्ष कह दिया कि 14 बच्चों
की मां होने के नाते मैं तुमसे श्रेष्ठ हुई क्योंकि तुम्हारे तो 2 ही
बच्चे हैं। जब लीटो के पुत्र अपोलो और पुत्री आर्टेमिस को यह पता चला, तो
उन्होंने अपनी मां के अपमान का बदला लेने की ठानी। उन्होंने नायबी के सामने ही
उसके सारे बच्चों को एक-एक कर कत्ल कर दिया। बच्चों को खोने पर
नायबी के पति एम्फियॉन ने आत्महत्या कर ली। इस प्रकार नायबी के पूरे परिवार का सफाया
हो गया। उसके ऊपर जैसे पहाड़ टूट पड़ा। उसके विलाप का कोई अंत न था। आखिरकार वह
देवराज ज़्युस के पास गई और उनसे अपनी पीड़ा से मुक्ति के लिए गुहार लगाई। ज़्युस को
उस पर दया आ गई और उन्होंने उसे पत्थर बना दिया, जिससे वह भावनाओं से मुक्त हो और उसकी
रुलाई का अंत हो। मगर कहते हैं कि पत्थर बनने के बाद भी नायबी के आंसुओं का बहना
नहीं रुका। ये आज भी बह रहे हैं। सिपलस पर्वत पर स्थित एक चट्टान, जिससे
पानी की धार बहती है, का आकार एक महिला के चेहरे-सा
जान पड़ता है।
आंसुओं
से जुड़ी एक कथा का संबंध चीन की दीवार से भी है। इस दीवार के निर्माण कार्य में
लगाए गए लाखों मजदूरों में मेंग जियांग नू नामक महिला का पति भी था। जब कई महीनों
तक पति की कोई खबर नहीं मिली, तो वह उसे ढूंढते हुए बर्फीले उत्तरी
इलाके में जा पहुंची, जहां दीवार का निर्माण कार्य चल रहा
था। बहुत तलाशने पर उसे पता चला कि उसका पति थकान से चल बसा है और दीवार के नीचे
ही दफन है। जिस स्थान पर वह दफन था, वहां जाकर मेंग ने कई दिन और कई रात तक
विलाप किया। अंतत: ईश्वर द्रवित हो गए और आसमान में भयंकर
बादल उमड़ पड़े। देखते ही देखते ऐसा भयावह बर्फीला तूफान आया, जैसा
पहले कभी नहीं आया था। तूफान के कारण नवनिर्मित दीवार का वह हिस्सा ढह गया, जिसके
नीचे मेंग का पति दफन था और उसका शव प्रकट हो गया। चारों ओर खबर फैल गई कि एक
स्त्री के आंसुओं ने दीवार ढहा दी। जब सम्राट तक यह खबर पहुंची, तो
वह स्वयं उस स्त्री के दर्शन करने चला आया। मेंग को देखते ही वह उसके सौंदर्य पर
मोहित हो गया और उसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रख दिया। मेंग ने कुछ सोचकर उसका
प्रस्ताव स्वीकार कर लिया मगर तीन शर्तें रख दीं। शर्तें ये थीं कि उसके पति का शव
श्रेष्ठ लकड़ी से बने ताबूत में रखा जाए, उसे राजकीय सम्मान के साथ दफनाया जाए
और स्वयं सम्राट व उसके सारे सैनिक मातम करें। सम्राट ने उसकी तीनों शर्तें मान
लीं। जब मेंग के पति का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो गया, तो
उसने पहाड़ से कूदकर अपनी जान दे दी...। लोगों ने मेंग की स्मृति में एक
मंदिर बनाया, जो आज भी मौजूद है।
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