Sunday, 8 October 2017

घर में कैसे घुसा चूहा?

चूहों को कहीं प्राण ऊर्जा चूसने वाला माना गया है, तो कहीं प्रसूताओं के प्राण बचाने वाला। इन्हें इंसाफ करने वाला भी बताया गया है...!
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प्रशांत महासागर स्थित सोलोमन द्वीपों में हाल ही मंे चूहे की एक नई प्रजाति सामने आई है। इसकी खासियत यह है कि यह चूहा ऊंचे पेड़ों पर रहता है और यह लगभग डेढ़ फुट लंबा होता है! हालांकि स्थानीय रहवासी लंबे समय से कहते आ रहे थे कि यहां ऐसे चूहे पाए जाते हैं मगर अब तक वैज्ञानिकों को इसका प्रमाण नहीं मिल पाया था। अब वह भी मिल गया है। स्थानीय लोग बताते हैं कि विका नामक यह चूहा अपने नुकीले दांतों से नारियल तक को बेध देता है!
चूहे आम तौर पर गंदगी और बीमारी के पर्याय माने गए हैं, जिस कारण ये वितृष्णा जगाते हैं। इसके चलते इन्हें लेकर तरह-तरह की कहानियां भी गढ़ी गई हैं। इनमें से कुछ में तो इन्हें बड़े ही खौफनाक प्राणी के रूप में चित्रित किया गया है। मसलन, ब्राजील में कोलो कोलो नामक डरावने चूहे के बारे में बताया जाता है। कहा जाता है कि एक सांप द्वारा दिए गए अंडे को एक मुर्गे द्वारा सेने से जो प्राणी अस्तित्व में आया, वह कोलो कोलो था, जोकि चूहे जैसा ही था। लोग मानते हैं कि कोलो कोलो मनुष्यों के घरों में छुपकर रहता है। जब लोग सो रहे होते हैं, तब वह जाकर उनकी जीभ पर काटकर उनकी लार चूस लेता है। इसके साथ ही सो रहे व्यक्ति की प्राण ऊर्जा भी जाने लगती है और समय रहते स्थिति को संभाला नहीं गया, तो उसकी मृत्यु भी हो सकती है।
जर्मनी की एक लोककथा में कहा गया है कि एक क्रूर सामंत गरीबों पर खूब अत्याचार करता था। एक बार प्रांत में अकाल पड़ा। लोग भूख से तड़पने लगे। सामंत के भंडार अनाज से भरे थे लेकिन वह इसे गरीबों में बांटने को तैयार नहीं था। इसके बजाए, उसने गांव वालों को छलपूर्वक अपने एक खाली खलिहान में बुलाया, इस आश्वासन के साथ कि उन्हें अनाज दिया जाएगा। जब सारे ग्रामीण खलिहान में चले गए, तो उसने बाहर से दरवाजा बंद कर अपने खाली खलिहान को आग के हवाले कर दिया और चल पड़ा। लोगों की चीखें सुनकर वह बुदबुदाया, 'चूहे चीं-चीं कर रहे हैं!" इसके बाद जैसे ही वह घर पहुंचा, उस पर चूहों की फौज ने हमला बोल दिया। वह भागा, मगर चूहे उसे नोच-नोचकर खा गए। इस प्रकार चूहे यहां इंसाफ करने वाले के रूप में दर्शाए गए हैं।
चूहों संबंधित कुछ अंधविश्वास बेहद प्रचलित रहे हैं। मसलन यह कि यदि चूहे किसी समुद्री जहाज से बाहर कूद रहे हैं, तो इसका मतलब जहाज डूबने वाला है। इसी प्रकार यह भी कहा जाता है कि यदि चूहे अकारण घर से बाहर भागने लगें, तो यह किसी आसन्ना अनिष्ट का संकेत हो सकता है। मजेदार बात यह है कि कहीं-कहीं चूहों का घर में आना भी शुभ माना जाता है। कहते हैं कि यह इस बात का संकेत है कि उस घर में दौलत आने वाली है! चूहों संबंधी सपनों को लेकर भी मजेदार धारणाएं रही हैं। मसलन, यह कि यदि आप सपने में चूहे देखते हैं, तो आपके खूब सारे दुश्मन होंगे!
मिस्र में प्राचीन काल में लोग चूहों को बुद्धिमान प्राणी मानते थे। कारण यह कि ये कहीं भी पहुंचकर भोजन की तलाश कर ही लेते हैं। उधर प्राचीन रोम में सफेद चूहे का नजर आना अच्छा शगुन समझा जाता था।

सूदान की जनश्रुति में यह बताया गया है कि आखिर कैसे चूहे आकर इंसानों के घरों में रहने लगे। इसके अनुसार कई सदियों पहले प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु तय थी क्योंकि लोग प्रसव पीड़ा से तड़प रही स्त्री का पेट चीरकर शिशु को निकाल लेते थे। एक दिन एक चूहा गांव में आया। उसने जब यह प्रथा देखी, तो हैरत में पड़ गया। लोग एक प्रसूता का पेट चीरने को हुए, तो चूहे ने उन्हें रोक दिया और कहा, 'पेट मत चीरो, थोड़ा इंतजार करो। यह बच्चे को जन्म दे देगी।" थोड़ी देर में जब महिला ने प्राकृतिक रूप से बच्चे को जन्म दिया, तो स्वयं वह यह देखकर दंग रह गई कि बच्चा जनने के बाद भी वह जीवित बच गई है। तब मनुष्यों को यह ज्ञान हुआ कि बच्चे को जन्म देने के लिए मां का पेट चीरने की जरूरत नहीं होती। सारी कृतज्ञ महिलाओं ने चूहे को पुरस्कृत करना चाहा। तब चूहे ने कहा कि मुझे अपने घर में रहने दें और जो आप खाएं, वह खाने की मुझे भी अनुमति हो। बस, तभी से चूहा हमारे घरों में घुसा हुआ है!

Sunday, 24 September 2017

कौन लाता है तूफान...?

समुद्री तूफानों की व्यापक विनाशक शक्ति देख आदि मानव इस निष्कर्ष पर पहुंचा इतने व्यापक स्तर पर कहर बरपाना किसी दैवी शक्ति के ही बस की बात हो सकती है।
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इन दिनों दुनिया के कई हिस्सों से समुद्री तूफानों की खबरें आ रही हैं। विराट महासागर से भयावह गति से आतीं हवाएं, आकाश की ओर लपकतीं समुद्री लहरें, घनघोर घटाओं का आक्रमण और निरंतर घंटों कहर बरपाती बरसात...। ये तूफान अच्छे-अच्छों को भयाक्रांत करने की क्षमता रखते हैं। प्रकृति की इस आपदा का राज जानने की जिज्ञासा होना स्वाभाविक था। यह जिज्ञासा आदि मानव को इसी निष्कर्ष पर ले गई कि इतने व्यापक स्तर पर कहर बरपाना किसी दैवी शक्ति के ही बस की बात हो सकती है। इसीलिए जहां-जहां समुद्री तूफान आते हैं, वहां-वहां आपको ये कथाएं सुनने को मिलेंगी कि कैसे ये किसी देवता या फिर राक्षस के क्रोध अथवा प्रतिशोध का नतीजा होते हैं।
मध्य-पूर्व की प्राचीन सभ्यताओं में तूफान लाने का श्रेय अनेक देवताओं को प्राप्त है, जैसे तेशब, हदाद आदि। न्यूजीलैंड के माओरी आदिवासी आरा तिओतियो को समुद्री तूफानों का देवता मानते हैं। वहीं दक्षिण अमेरिका के माया साम्राज्य में हुरकन देवता को तूफान लाने का श्रेय दिया गया है। माना जाता था कि हुरकन की एक टांग मनुष्यों की टांग जैसी और दूसरी सर्प के जैसी थी। जब मनुष्यों ने अपनी करतूतों से सारे देवी-देवताओं को कुपित कर दिया, तो हुरकन ने ऐसा तूफान लाया कि धरती पर जल प्रलय आ गया और सब कुछ नष्ट हो गया। दरअसल, अनेक संस्कृतियों में ऐसे जलप्रलय के किस्से आते हैं, जिसके बाद सृष्टि नए सिरे से बसी और ये जल प्रलय भीषण तूफानों के ही नतीजे बताए गए हैं।
यूनान में कहा जाता था कि सौ हाथ व पचास सिर वाले तीन राक्षस समुद्रों में तूफान लाते हैं। वहां की पौराणिक कथाओं में देवताओं के साथ इन राक्षसों के युद्ध का वर्णन भी किया जाता है, जिसमें इन्होंने एक बार में पहाड़ के आकार के सौ-सौ पत्थर देवताओं पर बरसाए थे! स्पष्ट है कि तूफानों की ताकत से अभिभूत मानव मस्तिष्क ने इनके कर्ता की कल्पना अतिरंजित बाहुबल से लैस हस्ती के रूप में की।
अमेरिका में प्रेसकाय द्वीप पर एक किंवदंति प्रचलित है। कहते हैं कि वहां पानी की सतह के नीचे एक समुद्री चुड़ैल रहती है, जो तूफान का आह्वान करती है। इसके पीछे उसका लक्ष्य होता है तूफान में डूबने वाले जहाजों के नाविकों को हासिल करना। अमेरिका की ही लकोटा जनजाति के लोग तूफानों को इया नामक राक्षस का कृत्य मानते हैं। इया की भूख कभी शांत नहीं होती, इसीलिए वह मनुष्य, पशु और यहां तक कि समूचे गांव निगल जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इसके बावजूद ये लोग इया को बुरा नहीं मानते। उनके अनुसार, इया तो केवल वह कर्तव्य निभा रहा है, जो उसे सौंपा गया है।

जबर्दस्त तबाही मचाने वाले समुद्री तूफानों से प्रभावित होने वाले लोगों में इन्हें लेकर तरह-तरह के अंधविश्वास भी व्याप्त हैं। मसलन, यह कि तूफान आने से पहले घोड़े सामान्य से अधिक फुर्ती से दौड़ पड़ते हैं, भेड़िए रोने लगते हैं व खिले हुए फूल अपनी पंखुड़ियां समेटकर बंद हो जाते हैं। एक मजेदार सलाह यह दी जाती है कि यदि आप अपनी जेब में लाल प्याज लेकर चलते हैं, तो बड़े-से-बड़ा तूफान भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा! यानी एक अदद प्याज तूफानों पर भारी पड़ जाता है!

Sunday, 10 September 2017

जब हरी गाय चरे नीली घास!

यदि आप जानना चाहते हैं कि मनुष्य की कल्पनाशक्ति कहां तक जा सकती है, तो जरा हिचकियों से मुक्ति के लिए सुझाए जाने वाले उपायों पर गौर करें।
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कभी-कभी कोई छोटी-सी चीज भी हमें इस कदर परेशान कर देती है कि इस परेशानी से छुटकारा पाने के लिए हम किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाते हैं। हिचकी आना यूं कोई बड़ी बात नहीं है मगर जब यह लंबे समय तक बनी रहती है, तो इंसान को अन्वेषक से लेकर निरा घनचक्कर भी बना डालती है।
आम तौर पर कहा जाता है कि यदि आपको हिचकी आ रही है, तो इसका मतलब यह है कि कहीं कोई आपको याद कर रहा है। ऐसी धारणा भारत में ही नहीं, एशिया व योरप के अनेक देशों में भी व्याप्त है। हिचकियों से छुटकारा पाने के लिए ऐसी सलाह दी जाती है कि आप जितने लोगों को जानते हैं, उनके नाम एक-एक कर लेना शुरू करें। जिस व्यक्ति का नाम लेते ही हिचकियां रुक जाएं, समझ जाएं कि वही आपको याद कर रहा था। मनोवैज्ञानिक इस युक्ति के पीछे बड़ा तार्किक कारण बताते हैं। वह यह कि जब आप याद करने वाले का कयास लगाकर लोगों के नाम लेने लगते हैं, तो आपका ध्यान हिचकियों से हट जाता है। खैर, ऐसा भी नहीं है कि हिचकी का मतलब हमेशा यही माना जाए कि कोई याद कर रहा है। हंगरी में माना जाता कि हिचकी तब आती है, जब कोई किसी से आपकी चुगली कर रहा होता है। वहीं ग्रीस में कहा जाता है कि जब कहीं आपकी शिकायत की जाती है, तो आपको हिचकी आती है!
यूं हिचकियां स्वास्थ्य के लिए कोई गंभीर खतरा पेश नहीं करतीं मगर जापान में ऐसी धारणा रही है कि यदि किसी को लगातार सौ हिचकियां आ जाएं, तो उसकी मृत्यु हो जाती है! कोलंबिया में भी माना जाता है कि यदि हिचकियां रोकने के सारे उपाय बेकार जाते हैं, तो फिर मृत्यु ही उस व्यक्ति को इनसे छुटकारा दिलाती है। हिचकियों के प्रकोप से बचने के लिए वहां के लोग सलाह देते हैं कि भोजन बेहद धीरे-धीरे ग्रहण किया जाए! परातनकालीन इंग्लैड में कहा जाता था कि हिचकियों के पीछे नन्हे प्रेतों की खुराफात होती है। इन प्रेतों के प्रकोप से मुक्ति पाने के उपाय भी बड़े दिलचस्प सुझाए जाते थे। मसलन, यह कि कुछ खास जड़ी-बूटियों का लेप तैयार कर उससे क्रॉस का निशान बनाया जाए और लातीनी भाषा में एक खास प्रार्थना गाई जाए। या फिर यह कि अपने दायें हाथ की तर्जनी पर थूकिए और अपने बायें जूते के सामने क्रॉस का निशान बनाकर अमुक प्रार्थना उल्टी बोलें...!
आयरलैंड में तो हिचकियों से मुक्ति पाने के लिए बड़ी ही अफलातूनी युक्ति सुझाई जाती है। कहा जाता है कि यदि आप नीली घास चरती एक हरी गाय की कल्पना करें, जो हिचकियां चली जाएंगीं! स्कॉटलैंड में मध्यकाल में लोग अपनी जीभ पर रूमाल बांधकर उसे बाहर की ओर खींचकर सौ तक गिनते थे। माना जाता था कि इससे हिचकियों से छुटकारा मिल जाएगा। नॉर्वे में हिचकियों की काट के लिए लोग ग्लास में छुरी रखकर पानी पीते हैं! योरप की रोमानी जनजाति के पास भी एक नुस्खा है। वह यह कि अपने गले में लाल धागा डालिए, उस धागे में एक चाबी बांधिए और फिर उस चाबी को अपने बायें कंधे पर डाल दीजिए।

इसके अलावा भी कई और अजीबोगरीब तरकीबों की सिफारिश हिचकियों को भगाने के लिए की जाती है। मसलन, शीर्षासन करना, कूदना, सीने पर बर्फ रखना, नाक/ कान बंद करके पानी पीना, चम्मच को पांच मिनिट तक ठंडा करके माथे पर रखना आदि। कुल मिलाकर, एक मामूली हिचकी मनुष्य की कल्पनाशक्ति को भरपूर उड़ान दे डालती है। 

Sunday, 27 August 2017

स्वर्ग के राजा का तोहफा

सांड व बैल का मानव जीवन में खास स्थान रहा है। इसे पूजा भी गया है और इसके इर्द-गिर्द अनेक रोचक मिथक भी गढ़े गए हैं।
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एक चीनी लोककथा के मुताबिक, एक बार स्वर्ग के राजा ने देखा कि पृथ्वी पर लोग भूख से मर रहे हैं। राजा को उन पर दया आ गई। स्वर्ग में दो दिव्य बैल थे। राजा ने इन्हें पृथ्वी पर भेजा, पृथ्वीवासियों के लिए इस संदेश के साथ कि यदि तुम खूब मेहनत करोगे, तो हर तीन दिन में कम से कम एक बार तुम्हें भोजन अवश्य मिलेगा। स्वर्ग के बैल धरती पर आ गए मगर अपने राजा का संदेश सुनाने में गड़बड़ा गए। उन्होंने पृथ्वीवासियों से कहा कि यदि तुम खूब परिश्रम करोगे, तो हर दिन कम से कम तीन बार तुम्हें भोजन मिलेगा, ऐसी स्वर्ग के राजा की आज्ञा है! जब राजा को यह पता चला, तो वे बहुत नाराज हुए क्योंकि वे जानते थे कि धरतीवासी कितनी ही मेहनत क्यों न कर लें, इतनी मात्रा में भोजन का उत्पादन नहीं कर सकते और इस तरह तो स्वयं उन पर झूठा होने की तोहमत आ जाएगी! तब स्वर्ग के राजा ने अपने बैलों को आदेश दिया कि वे हमेशा के लिए धरती पर ही रहें और मनुष्यों के हल जोतें। बस, तभी से बैल धरती पर हैं और हल जोतकर मनुष्यों का पेट भरने में मदद कर रहे हैं।
बैल व सांड का मानव जीवन के साथ-साथ मिथकों व लोककथाओं में खास स्थान रहा है। आदि मानव द्वारा गुफाओं की दीवारों पर अंकित चित्रों में बैल देखे जा सकते हैं। यानी ये इन प्राचीनतम कलाकारों के जीवन का भी अभिन्ना हिस्सा थे। मेसोपोटामिया में कहा जाता है कि जब सम्राट गिलगमेश ने सौंदर्य व प्रेम की देवी इनाना के प्रणय निवेदन को ठुकरा दिया, तो कुपित देवताओं ने गिलगमेश को सबक सिखाने के लिए गुगलाना को धरती पर भेजा। गुगलाना को स्वर्ग के सांड के रूप में भी जाना जाता था और वह इनाना की बहन व मृत्युलोक की देवी का पति था। गुगलाना के चलने मात्र से धरती कांप उठी थी मगर गिलगमेश ने अपने साथी के साथ मिलकर उसका काम तमाम कर दिया।
एक यूनानी पौराणिक कथा के अनुसार क्रीत द्वीप के राजा माइनॉस ने समुद्र के देवता पोसायडन से आग्रह किया कि वे बलि के लिए एक सफेद सांड भेजकर यह संकेत दें कि सिंहासन पर उसी का हक है, उसके भाइयों का नहीं। पोसायडन ने माइनॉस के पास एक सुंदर, सफेद सांड भेजा मगर माइनॉस ने तय किया कि इतने शानदार सांड की बलि देना मूर्खता होगी। उसने इस दिव्य सांड को रख लिया और इसकी जगह एक साधारण सांड की बलि दे दी। अब पोसायडन का कुपित होना लाजिमी था। सो उन्होंने प्रेम की देवी एफ्रडाइटी के साथ मिलकर ऐसा जाल बुना कि माइनॉस की पत्नी उस सांड के प्रेम में पड़ गई और उसने आधे मानव व आधे सांड माइनोटॉर को जन्म दिया! उधर प्राचीन ईरान की पौराणिक कथाओं में भी असाधारण शक्तियों से लैस सांड के अनेक किस्से आते हैं। यहां तक कि इसे ईश्वर की छह आरंभिक रचनाओं में से एक कहा गया है।

बैल व सांड को पूजे जाने का भी लंबा इतिहास रहा है। माना जाता है कि मिस्र मंे एपिस के रूप में सांड को ही सर्वप्रथम पूजा गया। भारत में नंदी को शिवजी के द्वारपाल तथा वाहन होने का गौरव प्राप्त है। असीरिया (उत्तरी इराक) व आसपास के इलाकों में मनुष्य के सिर तथा पंख लगे सांड के धड़ वाले 'लमासू" की प्रतिमाएं मिलती हैं। इन्हें राजमहलों आदि के प्रवेशद्वार पर द्वारपाल के तौर पर स्थापित किया जाता था। यही नहीं, धरती पर अपने लिए बहु-उपयोगी सांड को मनुष्य ने वृषभ तारामंडल के रूप में आसमान तक में स्थापित कर दिया है...! 

Sunday, 20 August 2017

श्रृंगार से अध्यात्म तक... चोटियां!

चोटी की भूमिका श्रृंगार तक ही सीमित नहीं है। इसका संबंध सामाजिक रुतबे, आस्था और अध्यात्म तक से रहता आया है...
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चोटियां इन दिनों काफी चर्चा में हैं। यूं हम इन्हें भारतीय परंपरा से ही जोड़ते आए हैं मगर बालों की चोटी बनाने की परंपरा अधिकांश प्राचीन सभ्यताओं में रही है। खास बात यह कि चोटी बनाने का मामला केवल बालों के श्रृंगार या सुविधा से ही नहीं जुड़ा, इसका संबंध संस्कृति, समाज व आस्थाओं से भी रहा है। चोटी की परंपरा कितनी पुरानी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऑस्ट्रिया में पाई गई 25000 से 28000 साल पुरानी एक मूर्ति में एक स्त्री के बाल चोटियों में बंधे दर्शाए गए हैं! ऐसा भी नहीं है कि चोटी बनाना महिलाओं तक ही सीमित रहा हो। पुरातन काल में जब पुरुषों का भी लंबे बाल रखना आम था, तब उनके सर पर भी चोटी सजती थी। यह परंपरा आज भी विश्व के अनेक कबीलाई समाजों में जारी है।
चोटियों की विविधता का आलम यह है कि कई अफ्रीकी कबीले खास तरह की चोटी के माध्यम से ही अपनी पहचान प्रकट करते हैं। यानी चोटी देखकर कहा जा सकता है कि अमुक व्यक्ति किस कबीले का है। मिस्री साम्राज्य में राजसी परिवारों की स्त्रियों की चोटियां आम स्त्रियों से अलग हुआ करती थीं। वहीं रोमन काल में श्रेष्ठी वर्ग की महिलाओं में चोटियां स्टेटस सिंबल थीं। चोटी की संरचना जितनी अधिक जटिल हो, माना जाता था कि महिला उतने ही धनी कुल से है। इसका व्यवहारिक पहलू यह था कि साधारण परिवारों की महिलाओं के पास इतनी फुर्सत होने का सवाल ही नहीं उठता था कि वे अपनी चोटी को लेकर लंबे-चौड़े प्रयोग कर सकें। उत्तरी अमेरिका के कुछ जनजातीय समुदायों की परंपरानुसार केवल अविवाहित युवतियां चोटी बनाती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने बाल खुले रखती हैं। किसी समुदाय मंे पुरुष तीन चोटियां बनाते हैं और महिलाएं दो, वहीं मैदानी इलाकों के अमेरिकी आदिवासी समुदाय में महिलाएं बाल छोटे रखती हैं और पुरुष अपने लंबे बालों की चोटियां बनाते हैं!
चोटियों के श्रृंगार के भी विविध तरीके अलग-अलग समाजों में देखे जाते हैं। मोती-मनकों से लेकर घास-पत्तियों तक से चोटी को सजाया जाता है। उत्तरी अमेरिका में एक खास प्रकार की घास को धरती माता के पवित्र बाल माना जाता है। कुछ समुदायों में इस घास को अपनी चोटी में गूंथने की परंपरा है। कहा जाता है कि इससे व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से धरती माता के साथ जुड़ता है और उसके मन में पवित्रता का संचार होता है। अफ्रीका के मांगबेटु समुदाय की महिलाएं पशुओं की हड्डी से बनी सींकों से अपनी चोटियां सजाती हैं। वहीं मसाई सुमदाय के पुरुष अपनी चोटी पर गोबर लगाते हैं! उधर हिंबा समुदाय की महिलाएं अपनी चोटी पर गेरू, राख, मक्खन व कुछ जड़ी-बूटियां मलकर उसका रूप निखारती हैं।

अफ्रीकी समुदायों में मौजूद जटिल चोटियां बनाने की परंपरा विश्व प्रसिद्ध है। मगर यह बात कम लोग जानते हैं कि वहां चोटियां बनाने को लेकर कई तरह के नियम-कायदे भी हैं, निषेध भी और अंधविश्वास भी। मसलन, यह कि किसी एक व्यक्ति को ही दूसरे की चोटी बनानी चाहिए। यदि एक साथ दो लोग किसी की चोटी बनाते हैं, तो जल्द ही उनमें से किसी एक की मृत्यु हो जाती है। यह भी कि खुले आसमान के नीचे चोटी नहीं बनानी चाहिए। गर्भवती महिलाओं को किसी अन्य की चोटी बनाने की मनाही है। मजेदार बात यह है कि जिसने आपकी चोटी बना दी, उसे धन्यवाद कहना भी अशुभ समझा जाता है!

Sunday, 23 July 2017

ज्वार-भाटा लाने वाला महाकेकड़ा

समुद्र में लहरें व ज्वार-भाटा लाने से लेकर शहीद योद्धाओं की आत्मा धारण करने तक, कई तरह के काम केकड़ों के नाम दर्ज हैं देश-विदेश के किस्सों-कहानियों में...
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हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार बीते वर्ष महाराष्ट्र में केकड़े की छह नई प्रजातियां सामने आईं। इसके साथ ही अपनी विचित्रताओं को लेकर कौतुहल उत्पन्ना करने वाले इस जीव की कुछ और विविधताएं दर्ज हुईं। दो जोड़ी छोटे और चार जोड़ी बड़े पैरों के दम पर आड़ा चलने वाला यह प्राणी वैसे ही कई रोचक किस्से-कहानियों का किरदार रहा है। मसलन, फिलिपीन्स का मंडाया समुदाय मानता है कि सूर्य और चंद्रमा पति-पत्नी हैं और उनकी संतानों में तंबानाकानो नामक विशाल केकड़ा भी शामिल है। यह समुद्र तल में स्थित एक विशाल गड्ढे में रहता है। जब वह गड्ढा छोड़कर कहीं जाता है, तो समुद्र का पानी उस विशाल गड्ढे मंे भर जाता है और किनारों पर भाटा आ जाता है। जब तंबानाकानो वापस अपने गड्ढे में आता है, तो सारा पानी पुन: गड्ढे से बेदखल हो जाता है और किनारों पर ज्वार आ जाता है। यानी समुद्री ज्वार-भाटा केकड़े की ही देन हैं! यही नहीं, इस महाकेकड़े के हिलने-डुलने से ही समुद्र में लहरें भी उठती रहती हैं।
जापान में पाई जाने वाली केकड़े की हाइकेगानी नामक प्रजाति काफी प्रसिद्ध है। इसकी खासियत है इसकी पीठ पर उभरी मानव चेहरे जैसी आकृति। इसे लेकर बड़ी रोचक कथा प्रचलित है। कहते हैं कि हाइके योद्धाओं का जापान पर शासन था और मीनामोटो योद्धा उन्हें सत्ता से बेदखल करने को प्रयासरत थे। सन् 1185 में दोनों सेनाओं के बीच समुद्र के किनारे निर्णायक युद्ध हुआ। उस समय 7 वर्षीय बालक अंतोकू हाइके सम्राट था। मीनोमोटा सेना हाइके सेना पर लगातार भारी पड़ रही थी। हाइके योद्धाओं का नियम था कि युद्ध में पराजय अवश्यंभावी लगने पर वे युद्धबंदी बनने के बजाए अपने प्राण हरकर शहादत प्राप्त कर लेते थे। जब इस युद्ध में ऐसी नौबत आई, तो सैनिकों ने अपने 7 वर्षीय सम्राट को समुद्र में फेंक दिया। उनके पीछे-पीछे सम्राट की मां व दादी भी समुद्र में समा गईं। शेष बचे सैनिकों ने भी सम्राट के साथ जल समाधि ले ली। समुद्र की गहराइयों में मौजूद केकड़ों ने इन सब हाइके लोगों का भक्षण कर लिया। इसके बाद शहीद हाइके योद्धाओं की आत्मा इन केकड़ों में बस गई और इनकी पीठ पर योद्धाओं के चेहरे अंकित हो गए। ये केकड़े हाइकेगानी कहलाए। यदि किसी जापानी मछुआरे के जाल में हाइकेगानी केकड़े फंस जाते हैं, तो वे सम्मानपूर्वक इन्हें वापस समुद्र में डाल देते हैं।

यूनानी पौराणिक कथाओं में भी केकड़े का विशेष उल्लेख आता है। इसके अनुसार, महान योद्धा हरक्युलिस, जोकि देवराज ज़्युस की अवैध संतान था, अनेक सिर वाले महासर्प हायड्रा से युद्ध कर रहा था। तब कारकिनोस नामक केकड़े ने हायड्रा की मदद की गरज से हरक्युलिस का एक पैर जकड़ लिया। मगर अद्धभुत बल के स्वामी हरक्युलिस के आगे वह टिक नहीं सका। हरक्युलिस ने कारकिनोस को झटक दिया और अपने पैर तले कुचल डाला। मगर उसका बलिदान बेकार नहीं गया। ज़्युस की पत्नी हेरा हरक्युलिस ने घृणा करती थीं। उन्होंने कारकिनोस को आसमान में स्थापित कर दिया, जहां वह आज भी कर्क तारामंडल के रूप में देखा जा सकता है।

Sunday, 2 July 2017

महाकायों की महागाथाएं

असामान्य रूप से विशाल काया तथा असाधारण शक्तियों वाले लोगों की अवधारणा हमें रोमांचित करती है। शायद इसीलिए संसार भर में ऐसे महाकाय दैत्यों की कहानियां पाई जाती हैं।
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अलग-अलग नस्ल के इंसानों के डील-डौल में यूं तो अंतर होता ही है मगर एक बात बड़ी रोचक है। लगभग सभी संस्कृतियों की पौराणिक कथाओं, लोक कथाओं आदि में कुछ ऐसे लोगों का उल्लेख मिलता है, जो विराट आकार के थे। आकार के साथ-साथ ये असामान्य बाहुबल व कई प्रकार की अन्य शक्तियों से भी लैस हुआ करते थे। अमूमन इन्हें खलनायक के रूप में चित्रित किया जाता है, जो किसी 'सामान्य" कद-काठी वाले व्यक्ति के हाथों परास्त होते हैं। इन कहानियों के द्वारा यह प्रतिपादित किया जाता है कि विराट आकार व शारीरिक बल भी सत्य व सदाचार के आगे टिक नहीं सकते। अंत में जीत सत्य की ही होती है।
असामान्य कद-काठी व बल वाले इन लोगों को हमारे यहां राक्षस, दैत्य, दानव आदि नाम दिए गए हैं, तो अन्य देशों में जायंट, टाइटन आदि। तर्कवादी अक्सर यह सवाल पूछते हैं कि क्या इस प्रकार के लोग वास्तव में होते थे? यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि अलग-अलग कालखंडों में मनुष्य का औसत कद बदलता रहा है। मगर इस औसत कद के हिसाब से, अनेक आख्यानों में वर्णित कुछ पात्रों की कद-काठी अतिरंजित ही कही जाएगी। मगर यह अतिरंजना ही इन कथाओं को मनोहारी बनाती है और इनमें निहित संदेश को उभारती है।
प्राचीन यूनान में ऐसे दैत्यों को धरती और आकाश की संतान माना जाता था। संभवत: यह प्रतीकात्मक चित्रण था, उन लोगों के लिए, जिनके पैर धरती पर हों, तो सिर आकाश को छूता है। यूनानी आख्यानों में देवताओं के साथ इन दैत्यों के भीषण युद्ध का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें देवता विजयी रहे। कई बड़े-बड़े दैत्य पहाड़ों के नीचे दफन हो गए। माना जाता है कि ये दैत्य आज भी कभी भूकंप, तो कभी ज्वालामुखी के विस्फोट के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। एक दैत्य एटलस को देवताओं के राजा ज़्यूस ने धरती के पश्चिमी छोर पर खड़े होकर आसमान को अपने कंधों पर उठाए रखने की सजा दी, जिसके चलते एटलस युग-युगांतर तक आसमान को थामे रखने को अभिशप्त है!
अमेरिकी आदिवासी समुदायों में ऐसे महाकायों का जिक्र आता है, जो 40 फीट से लेकर 200 फीट तक ऊंचे होते हैं! वहीं जापान में ओनी कहलाने वाले दैत्यों की अवधारणा रही है। इन्हें 'सबसे ऊंचे आदमी से भी कई गुना ऊंचा" बताया गया है। दिखने में ये बेहद डरावने होते हैं और इनका रंग लाल या नीला होता है। इनमें जबर्दस्त शारीरिक शक्ति होती है और ये कई तरह की आपदाएं ला सकते हैं। कहा जाता है कि यूं तो जब जीवन भर बुरे काम करने वाला व्यक्ति मरकर नरक में जाता है, तो वह ओनी बन जाता है मगर यदि कोई अत्यधिक दुष्ट हुआ, तो वह जीते-जी ओनी बन जाता है। ऐसे ही ओनी कई जापानी लोक कथाओं में पाए जाते हैं।

उत्तरी योरप के आख्यानों में कहा गया है कि विश्व का पहला प्राणी ईमिर नामक महाकाय ही था। उसका जन्म अग्नि और बर्फ के मिलन से हुआ था। कहा जाता है कि ईमिर के मांस से धरती बनी, रक्त से महासागर, अस्थियों से पर्वत बने, केश से वृक्ष और मस्तिष्क से बादल! उसके पसीने की बूंदों से अन्य दैत्यों का जन्म हुआ। यानी यह समूची सृष्टि का जनक है।