Sunday, 13 May 2018

ककड़ी से रोग दूर और पिशाच प्रसन्न्!


शीतलता भरी ककड़ी किस्से-कहानियों व अनूठे विश्वासों का भी भंडार है। फिर बात चाहे रोगों से मुक्ति पाने की हो या नन्हे पिशाचों को खुश करने की...
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गर्मियों के दिन हों और खीरा-ककड़ी का लुत्फ न लिया जाए, यह संभव नहीं। मगर क्या आप जानते हैं कि ककड़ी शीतलता व तरावट देने के साथ-साथ रोचक आस्थाओं व दंतकथाओं के रस से भी भरपूर है? मसलन, इसके औषधीय गुणों से तो सभी अवगत हैं मगर जापान में इसकी मदद से तमाम व्याधियों से छुटकारा पाने का विशेष उपक्रम किया जाता है। कुछ खास मंदिरों में साल के एक तयशुदा दिन लोग ककड़ियां लेकर आते हैं। हर व्यक्ति अपनी लाई ककड़ी पर कागज चिपकाकर अपना नाम, उम्र व व्याधि लिख देता है। फिर मंदिर में विशेष मंत्रोच्चार के बीच इस ककड़ी को शरीर के प्रभावित भाग पर रगड़ा जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से शरीर की व्याधि ककड़ी में चली जाती है। बाद में इस ककड़ी को जमीन में गाड़ दिया जाता है।
जापान की बात चली है, तो यह भी जान लें कि वहां 'कप्पा" नामक नन्हे, शरारती पिशाचों का अस्तित्व माना जाता है। ये दस साल के बच्चे के बराबर होते हैं, पानी में रहते हैं, इनका रंग हरा-पीला होता है, त्वचा कछुए के खोल के समान होती है और सिर पर कटोरे नुमा गड्ढा होता है, जिसमें पानी भरा रहता है। इनकी तिलस्मी शक्तियां तभी तक इनका साथ देती हैं, जब कि इनके सिर पर यह पानी सवार रहे। इसलिए सलाह दी जाती है कि यदि कप्पा से सामना हो जाए, तो उसे किसी भी बहाने झुकने पर मजबूर किया जाए, जिससे कि उसके सिर के कटोरे में भरा पानी ढुल जाए और उसकी शक्तियां जाती रहें। मगर कप्पा को सिर झुकाने के लिए मजबूर करने में काफी दिमागी मशक्कत करनी पड़ सकती है। तो एक आसान रास्ता भी सुझाया गया है। वह यह कि कप्पा महाशय को ककड़ी भेंट की जाए। उन्हें ककड़ी बेहद पसंद है और इसे पाने पर वे प्रसन्न् होे जाते हैं व आपका नुकसान नहीं करते।
इंडोनेशिया में स्वर्णिम ककड़ी की कहानी कही जाती है। इसमें एक निसंतान दंपति को एक राक्षस से बेटी का वरदान मिलता है मगर एक शर्त पर कि जब बेटी 17 साल की हो जाएगी, तो वह उसे अपने साथ ले जाएगा। पति-पत्नी राजी हो जाते हैं। राक्षस उन्हें ककड़ी के बीज देकर घर के पीछे बोने को कहता है। पति-पत्नी ऐसा ही करते हैं। कुछ समय बाद वहां ककड़ी का पौधा उग आता है। एक दिन उसमें एक सुनहरे रंग की ककड़ी लगती है। वह सामान्य ककड़ियों से कहीं बड़ी व भारी होती है। उसके पक जाने पर पति-पत्नी उसे तोड़ लाते हैं और सावधानी से काटते हैं। ककड़ी के भीतर से बच्ची प्राप्त होती है। दंपति की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। वे उसका नाम तिमुन मास यानी सुनहरी ककड़ी रखते हैं और उस पर अपनी ममता लुटाते हैं।
देखते ही देखते 17 साल बीत जाते हैं। राक्षस लड़की को ले जाने आ धमकता है। मगर माता-पिता उसे अपने से दूर नहीं करना चाहते। पिता उसे एक थैला देकर पिछले दरवाजे से भाग निकलने को कहते हैं। राक्षस समझ जाता है कि उसके साथ धोखा हो रहा है। वह लड़की के पीछे भागता है। लड़की थैले में से नमक निकालकर पीछे फेंकती है, तो उससे समंदर बन जाता है। मगर राक्षस समंदर को पार कर फिर उसके पीछे हो लेता है। तब वह थैले में से मिर्ची निकालकर फेंकती है। मिर्ची ऊंचे, कंटीले पेड़ों वाले जंगल का रूप ले लेती है। राक्षस उसे भी पार कर जाता है। अब लड़की थैले में से ककड़ी के बीज निकालकर फेंकती है। ये ककड़ी के खेत का रूप ले लेते हैं। थका-हारा राक्षस ककड़ी खाने बैठ जाता है व फिर सो जाता है। मगर कुछ देर बाद वह फिर दौड़ते हुए लड़की के पीछे हो लेता है। अब लड़की थैले में से झींगे की चटनी निकालकर फेंकती है। यह दलदल का रूप ले लेता है और राक्षस उसमें डूब मरता है। लड़की माता-पिता के पास लौट आती है और सब खुशी-खुशी रहने लगते हैं।

Sunday, 15 April 2018

संसार की सबसे बेशकीमती चीज


गेहूं के अपमान ने एक फलते-फूलते नगर को तबाह कर दिया। और जब ईश्वर की एक सेविका जुल्म से बचने के लिए भागी, तो यही गेहूं उसे बचाने को आगे आया...
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कहते हैं कि नीदरलैंड में कभी स्टेवोरेन नामक बड़ा तटीय नगर हुआ करता था। यहां के बंदरगाह पर विशाल जहाज दूर देशों से आकर लंगर डालते थे और इस व्यापार की बदौलत शहर खूब फल-फूल रहा था। यहां के रईस व्यापारियों में एक महिला शामिल थी, जो अपने दिवंगत पति का व्यापार बढ़ाते हुए अकूत धन-दौलत की मालकिन बन चुकी थी। साथ ही उसे लालच व अहंकार का रोग भी लग चुका था। एक दिन एक जहाज के कप्तान ने उसे सम्मान स्वरूप माणिक की अंगूठी भेंट की, तो महिला ने फरमाइश की कि काश तुम मेरे लिए दुनिया की सबसे बेशकीमती चीज ले आओ! कप्तान ने पूछा कि वह क्या है, तो वह बोल पड़ी, 'मैं नहीं जानती। तुम उसे ढूंढ लाओ, मैं तुम्हें उसकी मुंहमांगी कीमत दूंगी।"
इस पर कप्तान अपना जहाज लेकर चल दिया। कई महीनों बाद जब वह लौटा तो दौलत के नशे में चूर महिला ही नहीं, पूरे शहर को यह जानने की उत्सुकता थी कि वह कौन-सी चीज लेकर आया है, जो दुनिया की सबसे बेशकीमती चीज है। कप्तान ने बताया कि उसने कई-कई देशों की यात्रा की, बहुत तलाशा और अंत में उसे सबसे बेशकीमती चीज मिल ही गई। वह चीज और कुछ नहीं, गेहूं था! पूरा जहाज गेहूं से भरा हुआ था। यह देख महिला का पारा चढ़ गया। कप्तान ने उसे समझाने की कोशिश की कि गेहूं से मिलने वाली रोटी की बदौलत ही हम सब जिंदा हैं, यह न होता तो दुनिया की सारी धन-दौलत बेकार थी! मगर महिला मानने को तैयार न थी। उसने कप्तान को खूब बुरा-भला कहा और आदेश दिया कि सारा गेहूं समंदर में फेंक दिया जाए। तब कप्तान ने कहा, 'यह अन्ना है, इसे फेंक कैसे दें? हो सकता है कि किसी दिन आपको ही इसकी जरूरत पड़ जाए!" इस पर महिला ने अपनी माणिक की अंगूठी समंदर में फेंकते हुए कहा, 'मेरे इस गेहूं का मोहताज होने की उतनी ही संभावना है, जितनी इस बात की कि यह अंगूठी मेरे पास वापस आ जाएगी।"
गेहूं समंदर में उड़ेल दिया गया। अगले ही दिन एक दावत में उस महिला को जो मछली परोसी गई, उसे काटने पर उसने मछली के पेट में अपनी माणिक की अंगूठी पाई! वह सकते में आ गई। उधर समुद्र में फेंका गया गेहूं अंकुरित होने लगा और पौधे बढ़ने लगे। इनके बीच रेत के कण फंसकर जमा होने लगे और देखते ही देखते समंदर में रेत की पट्टी उभर आई। इसके कारण जहाजों का बंदरगाह तक आना असंभव हो गया। व्यापार ठप पड़ने लगा। शहर के बाकी व्यापारियों के साथ ही वह नकचढ़ी महिला भी पाई-पाई को मोहताज हो गई। अन्ना के अपमान की भारी कीमत उसके साथ-साथ पूरे शहर को चुकानी पड़ी।
यह डच लोककथा अन्ना की अहमियत को बड़े नसीहत भरे अंदाज में रेखांकित करती है। साथ ही, दुनिया भर में प्राथमिक आहार के रूप में गेहूं की अहमियत भी दर्शाती है। गेहूं के इर्द-गिर्द इतनी परंपराएं, इतने विश्वास व इतने किस्से घूमते हैं कि उन्हें एक जगह समेटना संभव नहीं है। पश्चिम में संत बारबरा के साथ गेहूं का किस्सा जुड़ा है। बताया जाता है कि फ्रांस के एक व्यापारी की सुंदर बेटी बारबरा के कई चाहने वाले थे। व्यापारी चाहता था कि बारबरा किसी धनवान से ब्याह रचा ले लेकिन बारबरा धार्मिक वृत्ति की थी और अपना जीवन ईश्वर को समर्पित करने का मन बना चुकी थी। इस पर पिता ने उसे घर में कैद कर लिया व उस पर तरह-तरह के जुल्म किए जाने लगे। एक बार वह किसी तरह भाग निकली। वह एक खेत से होकर गुजरी, जहां हाल ही में गेहूं बोया गया था। उसके गुजरते ही गेहूं के पौधे तत्काल बड़े हो गए ताकि खेत में उसके पैरों के निशान न दिखें और पीछा करने वाले उस तक न पहुंच सकें। अंतत: बारबरा का सर कलम किया गया व बाद में उन्हें संत का दर्जा भी मिला। आज कई स्थानों पर उनकी याद में क्रिसमस से इक्कीस दिन पहले लोग अपने घरों में तीन बर्तनों में गेहूं बोते हैं। उनका मानना है कि यदि क्रिसमस तक इस गेहूं से जवारे अच्छी तरह निकल आएं, तो आने वाला साल धन-धान्य से भरपूर रहेगा। वे कहते हैं, 'अगर गेहूं चंगा रहा, तो सब कुछ चंगा रहेगा।"

Sunday, 8 April 2018

कौतूहल जगाता 'अदृश्य" का दर्शन


कोई हमारे सामने होते हुए भी दिखाई न दे, इससे ज्यादा रोमांचक क्या हो सकता है? इस रोमांच ने जनश्रुतियों में भी खूब जगह पाई है।
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अदृश्यता की अवधारणा अपने आप में बड़ी रोमांचक है। कोई जीता-जागता शख्स हमारे बीच है, हमारी ही तरह उठ-बैठ रहा है, खा-पी रहा है, यहां तक कि हंस-बोल भी रहा है मगर नजर नहीं आ रहा...! यह खयाल मात्र कौतूहल उत्पन्ना कर देता है। किसी का अस्तित्व हम उसके दिखने से ही पहचानते हैं। इसलिए जब कोई होते हुए भी दिखाई न दे, तो यह आला दर्जे के अजूबे से कम नहीं होता। मजेदार बात यह है कि अदृश्यता के इस रोमांच में लगभग पूरी मानवता शामिल रही है। विश्व के हर कोने में इससे जुड़ी कोई किंवदंति, कोई मान्यता, कोई पौराणिक कथा मिल जाती है।
अदृश्यता का रोमांच इसलिए भी है क्योंकि प्रकट-अप्रकट तौर पर यह माना जाता है कि मृत्यु के बाद मनुष्य एक किस्म की अदृश्यता को प्राप्त हो जाता है। यानी मृत्यु के बाद भी उसका अस्तित्व समाप्त नहीं माना जाता, बल्कि कहा जाता है कि वह अब भी है बस नजर नहीं आ रहा। भूत-प्रेतों की अवधारणा में भी उनके अदृश्य होने का विश्वास आम है।
ग्रीक पौराणिक कथाओं में पाताल लोक के देवता हेडीज के पास एक तिलस्मी शिरस्त्राण (लोहे का टोप) होने का उल्लेख आता है। यह सिर्फ युद्ध में सिर की हिफाजत करने तक सीमित नहीं था। इसे धारण करने पर पहनने वाला अदृश्य हो जाता था। अनेक जनश्रुतियों में ऐसी वस्तुओं का जिक्र आता है, जिन्हें धारण करने वाला नजर से ओझल हो जाता है। कभी कोई लबादा, तो कभी जूते या फिर कोई तावीज आदि। यूं देवी-देवताओं में अपनी इच्छानुसार अदृश्य होने व फिर प्रकट हो जाने का शक्ति का उल्लेख तो तमाम प्राचीन संस्कृतियों में आता ही है। इसलिए किसी मनुष्य में यह शक्ति होना उसे दिव्यता से लैस करता है। जादूगरों द्वारा 'गायब" होने का करतब दिखाना न जाने कब से चला आया है और देखने वाला यह जानते हुए भी हैरत में पड़ जाता है कि यह नजर का धोखा मात्र है।
अमेरिकी जनजातियों में अदृश्यता को लेकर एक रोचक जनश्रुति चली आई है। एक झील के किनारे एक शिकारी अपनी बहन के साथ रहता था। वह कुशल शिकारी तो था ही, उसकी एक और खासियत यह थी कि वह अपनी बहन के अलावा किसी को नजर नहीं आता था। कहा जाता था कि जो भी विवाह योग्य युवती इस अदृश्य शिकारी को देख पाएगी, वही उसकी दुल्हन बनेगी। आसपास के गांवों की युवतियां बारी-बारी से अपनी किस्मत आजमाने झील के किनारे जातीं। वहां शिकारी की बहन उनसे पूछती, 'वह आ रहा है मेरा भाई! तुम्हें दिख रहा है?" यदि युवती हां में जवाब देती, तो वह कहती, 'बताओ उसके कंधे पर पट्टा कौन-सा है?" अब विवाहाकांक्षी युवती का झूठ पकड़ा जाता और उसे वहां से रवाना कर दिया जाता। पास ही के गांव में दो बहनें अपने पिता के साथ रहती थीं। पिता दिन भर शिकार करने घर से बाहर रहते और बड़ी बहन छोटी पर जुल्म करती। उसे पीटती, यहां तक कि उसे जलती लकड़ी से दागती। इससे छोटी बहन के चेहरे व बदन पर जगह-जगह जले के निशान पड़ गए थे। पिता के पूछने पर बड़ी बहन यही कहती कि छोटी अपनी ही लापरवाही से खुद को चोट लगाती रहती है।
खैर, एक दिन बड़ी बहन ने झील का रुख किया ताकि अदृश्य शिकारी से ब्याह कर सके। मगर अन्य युवतियों की तरह विफल रही और झूठ बोलने पर शिकारी की बहन की झिड़की सुनकर मुंह लटकाए लौट आई। दूसरे दिन छोटी बहन ने कहा कि वह भी अपनी किस्मत आजमाकर देखेगी। इस पर बड़ी हंस दी कि जहां मैं नाकाम हुई, वहां तुम भला क्या कामयाब हो जाओगी! गांव के लोग भी हंसने लगे कि उस जैसी बदसूरत लड़की को अगर शिकारी दिख भी गया तो वह उससे ब्याह नहीं करेगा। मगर सबको हैरत में डालते हुए छोटी वास्तव में शिकारी को देखने में कामयाब रही। शिकारी ने उससे कहा, 'बरसों से मैं ऐसी लड़की की प्रतीक्षा कर रहा था, जिसका हृदय पूर्ण रूप से निर्मल हो। तुम्हीं हो वह..."

Sunday, 25 March 2018

प्रेम का दिलदार फल


कहते हैं कि स्त्री-पुरुष की पहली अनबन को दूर करने के लिए ईश्वर ने अपने उद्यान का फल धरती पर भेजा। तभी से दिल के आकार वाली स्ट्रॉबेरी यहां फल-फूल रही है।
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रक्त के रंग और दिल के आकार का फल होने के नाते स्ट्रॉबेरी के प्रति एक खास आकर्षण मनुष्य में रहता आया है। यहां तक कि इसके इस रंग-रूप के चलते इसे किसी अलौकिक शक्ति से भी जोड़ा गया है और इसमें चमत्कारी शक्तियां भी तलाशी गई हैं। मसलन, योरप में इसका संबंध उर्वरता से जोड़ा गया। लोग प्रजनन क्षमता बढ़ाने के लिए इसका सेवन करते थे। इसे प्रेम की देवी के प्रिय फल का दर्जा भी दिया गया। यह भी कहा जाता था कि यदि गर्भवती महिला अपने पास स्ट्रॉबेरी के पत्ते रखे, तो उसे प्रसव पीड़ा से राहत मिल सकती है।
उर्वरता के अलावा स्ट्रॉबेरी के एक और गुण के चर्चे इतिहास में खूब हुए हैं। यह है शरीर से विषैले तत्वों को निकाल बाहर करने का गुण। बताया जाता है कि चीन के सम्राट हुआंगडी स्ट्रॉबेरी के पत्तों की चाय बनवाकर पीते थे। उन्हें विश्वास था कि इससे न केवल उनके शरीर में मौजूद विषैले तत्व दूर होते हैं, बल्कि उन पर बुढ़ापे का प्रभाव भी कम पड़ता है। उधर फ्रांस में बताया जाता है कि सम्राट नेपोलियन के दरबार की प्रमुख सदस्य मदाम तेलियन स्ट्रॉबेरी के ताजा रस में स्नान किया करती थीं! संभवत: वे इसे सौंदर्य का नुस्खा मानती थीं। यूं प्राचीन रोम में स्ट्रॉबेरी को ढेर सारी बीमारियों के रामबाण इलाज के तौर पर देखा जाता था, मसलन बुखार, पथरी, डिप्रेशन, गले में खराश, लिवर रोग आदि!
स्ट्रॉबेरी को लेकर कुछ रोचक रिवाज अलग-अलग स्थानों पर देखे जाते हैं। मसलन, जर्मनी के बवेरिया प्रांत में किसान स्ट्रॉबेरी इकट्ठा कर नन्ही टोकरियों में रखकर अपने मवेशियों के सींगों पर टांग देते हैं। उनका मानना है कि इससे दिव्य आत्माएं प्रसन्न् हो जाती हैं और उनके मवेशी स्वस्थ रहते हुए अपनी नस्ल बढ़ाते हैं।
योरप में यह मान्यता रही है कि अगर आप स्ट्रॉबेरी के एक फल को दो भागों में तोड़ें व एक भाग स्वयं खाकर दूसरा भाग विपरीत लिंग के व्यक्ति को खिला दें, तो आप दोनों को एक-दूसरे से प्रेम होते देर नहीं लगेगी! मजे की बात यह है कि योरप से हजारों मील दूर अमेरिका की चेरोकी जनजाति में स्ट्रॉबरी की उत्पत्ति की जो कहानी सुनाई जाती है, उसमें भी इस फल के कुछ ऐसे ही गुण का उल्लेख है। इसके अनुसार, एक बार आदि पुरुष व आदि स्त्री का आपस में झगड़ा हो गया। आदि स्त्री रूठकर चल दी। वह कुछ दूर गई, तो आदि पुरुष को ग्लानि हुई और वह उससे क्षमा मांगकर उसे मनाने के लिए दौड़ा। मगर आदि स्त्री अत्यंत तेज रफ्तार से चली जा रही थी और आदि पुरुष उससे लगातार पिछड़ रहा था। तब आदि पुरुष ने ईश्वर से प्रार्थना की कि वे किसी तरह आदि स्त्री को रोकें ताकि वह जाकर उससे क्षमा मांगकर उसे वापस ला सके। ईश्वर को उस पर दया आ गई और उन्होंने आदि स्त्री को रोकने के लिए उसकी राह में एक के बाद एक कई फलों के पेड़ खड़े कर दिए। लेकिन वह एक भी फल के लालच में न आई और उसी रफ्तार से, गुस्से में भरी हुई चलती चली गई।
तब ईश्वर ने स्वयं अपने उद्यान के फल स्ट्रॉबेरी का पेड़ उसकी राह में खड़ा कर दिया। यह लालम-लाल फल देख आदि स्त्री ठिठककर रुक गई। वह इस फल को चखने से स्वयं को रोक न सकी। उसे यह इतना रास आया कि वह एक के बाद एक स्ट्रॉबेरी खाती गई और जल्द ही प्रेम के फल ने अपना असर भी दिखा दिया। आदि स्त्री का गुस्सा फुर्र हो गया और उसे अपने साथी की याद सताने लगी। तब तक आदि पुरुष भी भागता हुआ वहां पहुंच गया। गिले-शिकवे माफ हुए और दोनों स्ट्रॉबेरी खाते हुए अपने घर लौटे। तभी से स्वर्ग का यह फल धरती पर उगता रहा है और प्रेम फैलाता रहा है...

Sunday, 11 March 2018

'जन्म वृक्ष", जो बनता है विवाह का साक्षी


बच्चे के जन्म पर उसके नाम का पौधा रोपने से लेकर वैवाहिक जीवन का आरंभ पौधा रोपकर करने तक अनेक परंपराएं चली आई हैं। मृत्यु के बाद यही पेड़ हमारी स्मृति को जीवित बनाए रखते हैं।
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क्या आप वृक्षों के बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना कर सकते हैं? नहीं ना? ये हमारे अस्तित्व मात्र में इस कदर रच-बस गए हैं कि हमारी कई परंपराओं में भी ये शामिल हैं। इसराइल में प्राचीन काल से एक परंपरा चली आ रही है। जब भी घर में बच्चे का जन्म होता है, तो उसके नाम का एक पौधा रोपा जाता है। इसे बर्थ ट्री या जन्म वृक्ष भी कहा जाता है। आम तौर पर लड़का होने पर देवदार और लड़की होने पर सरू वृक्ष लगाया जाता है। ये पौधे भी बच्चे के साथ-साथ बड़े होते हैं। बड़े होने पर बच्चे खुद 'अपने" पेड़ की देखभाल करते हैं। जब शादी होती है, तब दूल्हे व दुल्हन दोनों ही के जन्म वृक्ष की टहनियों से विवाह मंडप सजाया जाता है। इस प्रकार जन्म से लेकर विवाह तक यह पेड़ मनुष्य का साथी बनता है। कहने की जरूरत नहीं कि जब इंसान इस दुनिया से विदा हो जाता है, तब भी उसका यह वृक्ष उसकी याद को जीवित रखता है।
जन्म वृक्ष की परंपरा जमैका में भी प्रचलित रही है। इसमें बच्चे का जन्म होने पर उसकी गर्भनाल जमीन में गाड़ दी जाती है और उस स्थान पर एक पौधा रोप दिया जाता है। यह पौधा बच्चे का उसकी मिट्टी से अटूट संबंध स्थापित करता है। कुछ हद तक इससे मिलता-जुलता रिवाज चीन के पश्चिमी भाग में भी रहा है, हालांकि इसके अंत में एक 'टि्वस्ट" है। इसके अनुसार, बेटी का जन्म होने पर एक खास प्रजाति का पौधा लगाया जाता है, जिसे बोलचाल की भाषा में महारानी वृक्ष या राजकुमारी वृक्ष कहा जाता है। यह पेड़ करीब-करीब उसी गति से बढ़ता है, जिस गति से मानव शिशु बढ़ता है। जब बच्ची युवा हो जाती है, तो यह पेड़ भी अपना पूरा आकार पाकर परिपक्व हो जाता है। फिर, जब लड़की की शादी तय होती है, तो इस पेड़ को काट दिया जाता है! इसी की लकड़ी से लड़की के दहेज के लिए सामान तैयार किया जाता है!
अनेक संस्कृतियों में विवाह के अवसर पर दूल्हा-दुल्हन द्वारा पौधा रोपने का भी रिवाज है। यह वर-वधु द्वारा एक नया जीवन शुरू करने का प्रतीक भी है। अब उन्हें ही इस वैवाहिक जीवन रूपी पौधे को सींचकर बढ़ाना है। जैसे-जैसे नव-विवाहितों का प्रेम गाढ़ा होता जाता है, वैसे-वैसे इस पौधे की जड़ें गहरी होती जाती हैं। चेक गणराज्य के मोराविया प्रांत में विवाह के अवसर पर दुल्हन की सखियां उसके आंगन में एक पौधा लगाती हैं व उसे रंग-बिरंगी रिबिन और रंग से सजे अंडे के छिलकों से सजाती हैं। ऐसा माना जाता है कि दुल्हन को इस पौधे की (लंबी) उम्र लग जाती है और जब तक पौधा फलता-फूलता रहेगा, दुल्हन अपने नए घर में खुशहाल रहेगी।
पारसी विवाह में भी शादी से चार दिन पहले होने वाली एक रस्म में वर-वधु दोनों के घर की दहलीज पर एक गमले में उर्वरता के प्रतीक के तौर पर आम का पौधा विधि-विधानपूर्वक रोपा जाता है। शादी के बाद आठवें दिन तक यह पौधा यहीं रहता है व इसे रोज पानी दिया जाता है। इसके बाद इसे अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया जाता है। यह कामना की जाती है कि जिस प्रकार यह पौधा बड़ा व मजबूत होगा तथा मीठे फल देगा, उसी प्रकार नव-दंपति का प्रेम भी बढ़े, मजबूत हो व फले-फूले।
जन्म और विवाह ही नहीं, व्यक्ति की मृत्यु होने पर भी उसकी स्मृति में पौधा रोपने की परंपरा कई स्थानों पर रहती आई है। किसी प्रियजन की याद में जीता-जागता पौधा रोपकर उसकी स्मृति को जीवित रखा जाता है। जीवन के हर पड़ाव पर साथ देने के बाद पेड़ मृत्यु में भी हमें नया जीवन दे जाते हैं।

Sunday, 25 February 2018

अमरत्व के फल की तलाश में भटकता इंसान


कोई आड़ू में, तो कोई सेब में और कोई समुद्र की गहराई में उगे पौधे में अमर होने का वरदान तलाशता है। मगर क्या अमर होने की चाह जीवन को ही व्यर्थ नहीं बना देती? जिस जीवन का अंत नहीं, उसे जीने में कैसा रस?
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अमरत्व के प्रति आसक्ति शायद तभी से शुरू हो गई थी, जब से इंसान को जीवन और मृत्यु का भान हुआ। मृत्यु को पराजित करने के जुनून ने उसे अपनी कल्पनाओं के घोड़े बेलगाम दौड़ाने व अपनी खोजी वृत्ति को भरपूर आजमाने का मौका दिया। तमाम प्राचीन आख्यानों में किसी--किसी ऐसे नुस्खे का उल्लेख मिला है, जिससे अमरत्व की प्राप्ति होती हो। अमूमन अमरत्व के इस नुस्खे पर केवल देवताओं का अधिकार बताया गया है। साथ ही, मनुष्यों द्वारा उसे हासिल करने के प्रयासों के दिलचस्प किस्से भी सुनाए जाते आए हैं।
चीन में अमरत्व का राज खास प्रकार के आड़ू (पीच) में माना गया है। पश्चिमी चीन में प्रचलित किंवदंतियों के अनुसार, शी वांगमू (पश्चिम की राजमाता) कुनलुन पहाड़ों के बीच स्थित हरित कुंड के किनारे रहती थीं। उनके पास सृजन व संहार की शक्तियां थीं। जीवन, मृत्यु, रोग व उपचार उनकी इच्छा से संचालित होते थे। उन्होंने अपने बाग में तिलस्मी आड़ू के 3600 पेड़ लगा रखे थे। इन पेड़ों पर हर 3000, 6000 या 9000 वर्ष बाद फल पकते थे। हर 500 साल में एक बार शी वांगमू देवताओं को इन फलों की दावत के लिए आमंत्रित करती थीं। इनके सेवन से ही देवताओं का अमरत्व कायम रहता था। एक बार ऐसी ही एक दावत में वानर राज सुन वुकांग आ धमके और तिलस्मी फल चुराकर खा लिया। इससे उन्हें भी अमरत्व प्राप्त हो गया। अब देवता इस गुस्ताखी के लिए वानर राज को चाहकर भी मृत्युदंड नहीं दे सकते थे!
चीन से हजारों मील दूर उत्तरी योरप के मिथकों में तिलस्मी आड़ू की जगह स्वर्णिम सेब को अमरत्व का स्रोत कहा गया है। यहां इन सेबों की रखवाली का जिम्मा वसंत व उर्वरता की देवी इडुना पर था। एक बार चालबाज देवता लोकी ने इडुना का स्वर्णिम सेबों सहित अपहरण कर उन्हें राक्षस थियासी को सौंप दिया। स्वर्णिम सेबों की नियमित खुराक न मिलने के कारण देवताओं का चिर यौवन जाता रहा। बड़ी मुश्किल से उन्होंने लोकी पर दबाव बनाकर इडुना व सेबों को वापस प्राप्त किया, तब जाकर उनका अमरत्व कायम रह पाया।
सुमेरिया में सम्राट गिलगमेश के किस्से प्रचलित हैं। इनमें एक किस्सा बताता है कि अपने मित्र एंडीकू की मृत्यु से व्यथित गिलगमेश को स्वयं की मृत्यु की चिंता सताने लगती है। वह उतनापिश्तिम नामक व्यक्ति की तलाश में निकल पड़ता है, जिसे अमरत्व का वरदान प्राप्त है। उससे मिलने पर गिलगमेश उसे उसके अमरत्व का राज पूछता है। इस पर उतनापिश्तिम हंसकर उसे समझाता है कि अमरत्व की तलाश करने का मतलब है जीवन को व्यर्थ गंवाना। उतनापिश्तिम व उसके परिवार को अमरत्व विशिष्ट परिस्थितियों में प्राप्त हुआ था, क्योंकि उसने प्रलय के बाद पृथ्वी पर जीवन सुनिश्चित करने के लिए ईश्वर के आदेश पर एक विशेष नौका बनाई थी व उसमें विभिन्न् प्रजातियों के एक-एक जोड़े पशु-पक्षी को स्थान दिया था। उधर उतनापिश्तिम की पत्नी गिलगमेश को बता देती है कि समुद्र के तल में एक खास पौधा उगता है, जिसका सेवन करने से अमरत्व पाया जा सकता है। गिलगमेश समुद्र की गहराई में जाकर पौधा ले आता है और तय करता है कि वह अपने राज्य लौटकर किसी बुजुर्ग पर इसे आजमाकर देखेगा, फिर स्वयं इसका सेवन करेगा। मगर रास्ते में एक सांप उस पौधे को चुरा ले जाता है। हारकर गिलगमेश अपनी नश्वरता को स्वीकार कर लेता है। ठीक भी है। जीवन का रोमांच तो इसकी नश्वरता में ही है। अगर आप इसके खत्म न होने के प्रति आश्वस्त हो गए, तो फिर इसमें स्पंदन ही कहां बचेगा...?

Sunday, 18 February 2018

उत्सव के चिराग तले छिपी पहेलियां


पहेलियां केवल मनोरंजन या टाइम-पास का जरिया ही नहीं, इनका लंबा व समृद्ध इतिहास रहा है। खुशी के उत्सव से लेकर मातम के मौकों तक पर ये खास स्थान रखती हैं।
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मानव इस बात का दंभ भरता है कि वह संसार का सबसे बुद्धिमान प्राणी है। पता नहीं शेष प्राणियों की इस बारे में क्या राय है मगर चलो, मान लेते हैं कि यही सच है क्योंकि शेष प्राणियों की राय जानने का फिलहाल हमारे पास कोई माध्यम नहीं है। अब जब बुद्धि भी है और उसकी तीक्ष्णता का आभास भी, तो इस बुद्धि के इर्द-गिर्द खेल रचने का कर्म भी होना ही था। सो मानव पहेलियां रच बैठा। दिमागी कसरत का यह अनूठा खेल न जाने कितनी सदियों से चला आया है। यहां बात सिर्फ घुमा-फिराकर कोई सवाल पूछने तक सीमित नहीं है। कहीं पहेलियों में साहित्य की नफासत है, तो कहीं खांटी गंवई प्रज्ञा और कहीं दार्शनिक गूढ़ता भी।
पहेली किसी एक देश या समाज या संस्कृति की मिल्कियत नहीं। संसार की पहली पहेली कहां, कब और किसके द्वारा रची गई, यह भी दावे से नहीं कहा जा सकता। वैसे ठोस रूप में संरक्षित सबसे पुरानी पहेलियां मेसोपोटामिया (वर्तमान में इराक) की प्राचीन सुमेरियाई सभ्यता से संबंधित बताई जाती हैं। ये 25 पहेलियां 2350 ईसा पूर्व के एक फलक पर दर्ज हैं। इनमें से संभवत: सबसे मशहूर पहेली कुछ इस प्रकार है- 'एक घर है, जिसमें लोग दृष्टिहीन प्रवेश करते हैं और दृष्टिवान होकर निकलते हैं। क्या है वह?" इसका उत्तर है 'विद्यालय"
संसार भर के प्राचीन साहित्य में पहेलियां किसी--किसी रूप में प्रकट होती हैं। मसलन, महाभारत में यक्ष प्रश्न। ऋग्वेद में भी पहेलियों का समावेश है। मध्यकालीन अरबी-फारसी संस्कृति में भी पहेलियोें की प्रचुरता पाई जाती है। योरप के पुरातन साहित्य में भी ये शामिल हैं। हां, प्राचीन चीनी साहित्य में यह कम ही पाई जाती हैं क्योंकि इन्हें स्तरीय साहित्य का हिस्सा नहीं माना जाता था। हालांकि पहेलियों का अस्तित्व वहां भी रहा है। मसलन यह कि 'क्या है वह चीज, जो धोने पर गंदी हो जाती है और न धोने पर स्वच्छ रहती है?" (पानी)। या फिर, 'जब इस्तेमाल करो तो फेंक देते हो और जब इस्तेमाल न करना हो तो वापस ले आते हो!" (जहाज का लंगर)
पहेलियां लोक संस्कृति का भी अभिन्न् हिस्सा रही हैं। कितनी ही लोक कथाओं में हमें इनकी झलक मिलती है। इसके अलावा, ये पर्वों आदि में भी शामिल की जाती हैं। मसलन, चीन में वसंत ऋतु में मनाए जाने वाले लैंटर्न फेस्टिवल या दीप उत्सव में पहेलियों की परंपरा का भी समावेश है। लोेग अपने घरों के बाहर जो चिराग टांगते हैं, उन पर एक कागज नत्थी कर उस पर कोई पहेली लिख देते हैं। घर के सामने से गुजरने वाले लोग, खासकर बच्चे इन पहेलियों को हल करने की कोशिश करते हैं। अगर किसी को हल सूझ जाए तो वह पर्ची हटाकर, द्वार खटखटाकर गृहस्वामी को पर्ची पकड़ाते हुए हल बता सकता है। अगर उसने सही हल बताया, तो उसे गृहस्वामी की ओर से कोई उपहार दिया जाता है।
जहां चीन में खुशी के उत्सव में पहेलियों को शामिल किया गया है, वहीं फिलिपीन्स में गमी के मौके पर पहेलियां बुझाई जाती हैं! वहां के कुछ ग्रामीण इलाकों में यह रिवाज है कि किसी की मृत्यु होने पर मित्र, रिश्तेदार आदि जब उसे अंतिम बिदाई देने आते हैं, तो आपस में पहेलियां भी बुझाते हैं। तो वाकई अजीब है पहेलियों की पहेली, जो खुशी और गम दोनों ही में दिमागी कसरत करवाने आ धमकती हैं।