Sunday, 12 June 2016

कुछ लुभाता, कुछ डराता गोरिल्ला

गोरिल्ला जैसा कोई प्राणी होता भी है या नहीं, इसे लेकर सदियों तक ना-नुकुर चलती रही। लोग इसे देखने का दावा करते रहे लेकिन आखिरकार, कोई डेढ़ सौ साल पहले ही वैज्ञानिकों ने माना कि गोरिल्ला होते हैं...।
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बीते दिनों अमेरिका के सिनसिनाटी शहर के चिड़ियाघर में एक 4 वर्षीय बच्चा गोरिल्ला के बाड़े में गिर पड़ा। गोरिल्ला ने बच्चे को झपट लिया और इससे पहले कि वह बच्चे को क्षति पहुंचाए, उसे गोली मार दी गई। बच्चा बच गया, गोरिल्ला मारा गया। अमेरिका में और बाहर भी काफी बवाल मचा कि क्या बच्चे को बचाने के लिए गोरिल्ला को मारना जरूरी था! एक तर्क यह दिया जा रहा है कि गोरिल्ला डरावने दिखने के बावजूद नर्म-दिल होते हैं और चिड़ियाघर वाला गोरिल्ला भी बच्चे को नुकसान नहीं पहुंचाता। दूसरा तर्क यह दिया जा रहा है कि नर्म-दिल होने के बावजूद अपने विशाल आकार व जबरदस्त शारीरिक ताकत के चलते गोरिल्ला न चाहते हुए भी बच्चे को और यहां तक कि वयस्क मनुष्य को भी खासा नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसलिए उस चिड़ियाघर वाले गोरिल्ले को मारना जायज था।
मनुष्य के बेहद करीबी 'रिश्तेदार" होने के नाते गोरिल्लों के प्रति हममें एक खास तरह का आकर्षण रहता आया है। बताते हैं कि मनुष्य और गोरिल्ला का डीएनए लगभग 98 प्रतिशत मेल खाता है। केवल चिम्पांजी और बोनोबो ही 99 प्रतिशत मेल खाते डीएनए के साथ मनुष्य के ज्यादा करीबी हैं। जहां मनुष्यों से मिलते-जुलते डील-डौल व हावभाव के कारण गोरिल्ला लुभाता है, वहीं विशाल आकार और ताकत के चलते यह डराता भी है। एक खास तरह का रहस्य इसके साथ जुड़ा हुआ महसूस होता है। मजे की बात यह है कि इस अनोखे प्राणी के बारे में प्रामाणिक जानकारी बहुत हालिया अतीत में ही मिली है। इससे पहले सदियों तक गोरिल्लों को कपोल कल्पना माना जाता था। यूं ईसा पूर्व पांचवीं सदी में हैनो नामक ग्रीक नाविक ने अफ्रीका से लौटकर दावा किया था कि वहां एक द्वीप पर उसने बर्बर लोगों की बसाहट देखी, जिनके पूरे शरीर पर लंबे-लंबे बाल थे! संभवत: वह गोरिल्लों का ही जिक्र कर रहा था। इसके बाद भी लंबे समय तक, अफ्रीका होकर आने वाले खोजी यह दावा करते रहे कि वहां उन्होंने विराट डील-डौल वाले, बेहद शक्तिशाली और गुस्सैल 'आदि-मानव" देखे हैं। मगर वैज्ञानिक इन दावों को खारिज करते रहे क्योंकि उनके पास कोई ठोस प्रमाण नहीं था। सन् 1625 में ब्रिटिश खोजी एंड्रयू बैटेल ने चेहरे और हथेलियों के अलावा पूरे शरीर पर बाल धारण करने वाले 'राक्षस" देखने का दावा किया, जो पेड़ों पर सोते हैं और फल खाते हैं। मगर तब भी इस बात पर विश्वास नहीं किया गया कि वाकई ऐसा कोई प्राणी अस्तित्व में है। आखिरकार 1847 में थॉमस सैवेज नामक अमेरिका प्रकृतिविद ने लाइबीरिया के जंगलों से गोरिल्ला की खोपड़ी व हड्डियां बरामद कीं, तब जाकर यह प्रामाणिक रूप से स्थापित हुआ कि ऐसी कोई प्रजाति होती है। पहाड़ी गोरिल्लों का अस्तित्व तो और भी बाद में, सन् 1902 में साबित हो सका।
मानव, 'दानव" और वानर के मिले-जुले रूप वाला प्राणी दिखने के दावों के बीच लंबे समय तक इसे लेकर तरह-तरह के किस्से-कहानियां गढ़ने का क्रम भी चलता रहा। ग्रीक शासक व योद्धा सिकंदर के जीवन पर आधारित एक दंतकथा-नुमा पुस्तक में बताया गया है कि कैसे एक बार सिकंदर 'वानरों की भूमि" पर जा पहुंचा था। वहां दो प्रकार के वन-मानुष रहते थे: एक तो विशाल, खौफनाक और नरभक्षी तथा दूसरे छोटे व मित्रवत। इधर येती, बिग फुट आदि जैसे विशाल, रहस्यमय वानर-नुमा प्राणियों के किस्से भी लंबे समय से पढ़े-सुना जाते रहे हैं, हालांकि इन प्राणियों का अस्तित्व अभी सिद्ध नहीं हो पाया है। क्या पता, जैसे सदियों तक गोरिल्ला को कपोल-कल्पना माना गया और फिर एक दिन वह सचमुच पाया गया, उसी तरह येती, बिग फुट आदि भी एक दिन साक्षात हमारे सामने आ खड़े हों!

गोरिल्ला की बात करें, तो जिन इलाकों में ये पाए जाते हैं, वहां के जनजीवन में तथा विश्वासों-अंधविश्वासों में भी इन्होंने अपना स्थान बना लिया है। कॉन्गो, कैमरून आदि अफ्रीकी देशों में कई लोगों के बीच ऐसी मान्यता रही है कि यदि किसी गर्भवती महिला या उसके पति की नजर किसी गोरिल्ला पर पड़ जाए, तो वह मानव के बजाए गोरिल्ला शिशु को जन्म देगी! यूं तो उन इलाकों में गोरिल्ला का मांस भी खाया जाता है लेकिन कॉन्गो गणराज्य के एक प्रांत में महिलाएं इसे नहीं खातीं। उन्हें भय रहता है कि यदि उन्होंने गोरिल्ला का मांस खाया, तो उनके पति गोरिल्ला की ही तरह खूंख्वार हो जाएंगे...! 

Sunday, 22 May 2016

कहीं चोरी न हो जाएं सांसें...!

जब बोतलबंद हवा के रूप मंे सांसें बेचने की तैयारी हो रही है, तो यह जानना दिलचस्प होगा कि हवाओं और सांसों को लेकर इंसान क्या-क्या विश्वास पालता आया है...।
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हवाएं 'मुक्त" भले ही हों मगर लगता है उनके 'मुफ्त" होने के दिन लदने वाले हैं। कम से कम शुद्ध हवा के...। प्रदूषित हवा के दौर में व्यवसाय का मौका पाकर एक कनाडाई फर्म ने भारत में, खास तौर पर दिल्ली में शुद्ध हवा बेचने का इरादा जताया है। इससे पहले यह कंपनी चीन में अपनी बोतलबंद हवा बेचकर अच्छा-खासा मुनाफा कमा चुकी है। यह परफ्यूम या डियो की शीशी की तरह होता है, जिसमें से स्प्रे के रूप में हवा निकलती है और मास्क के माध्यम से इस हवा में सांस ली जा सकती है। बोतलबंद हवा खरीदकर सांस लेने का विचार आज हमें भले ही अटपटा और यहां तक कि आपत्तिजनक भी लगे मगर कौन जाने, दूर-निकट के भविष्य में यह एक आम चलन ही हो जाए...! आखिर बोतलबंद पानी की कल्पना भी तो कभी इंसान को इतनी ही अटपटी और आपत्तिजनक लगी होगी...!
वायु भले ही अदृश्य हो लेकिन जीवन के लिए आवश्यक तत्व के रूप में इसका महत्व मनुष्य शुरू से ही पहचान गया था। इसीलिए उसने पृथ्वी, जल, अग्नि के साथ-साथ वायु को भी पूजना शुरू कर दिया था। वायु को किसी देवता या देवी के रूप में पूजे जाने का इतिहास हर प्राचीन संस्कृति में मिलता है। कई जगह तो अलग-अलग दिशा से चलने वाली हवाओं को अलग-अलग नाम से और अलग-अलग रूप में भी पूजा गया। मसलन, ग्रीस में उत्तरी हवा को बोरियस के नाम से जाना जाता था और इसे जाड़े का वाहक माना गया। इसी तरह जेफिरस (पश्चिमी हवा) को वसंत का वाहक, नोटोस (दक्षिणी हवा) को तूफानों का वाहक और यूरस (पूर्वी हवा) को वर्षा का वाहक माना गया। इन चारों को रात्रिकालीन आकाश के देवता तथा भोर की देवी की संतान माना जाता था। इन हवाओं को कभी पंख वाले देवताओं के रूप में चित्रित किया जाता था, तो कभी अश्वों के रूप में। कहा जाता था कि ये अश्व आंधियों के देवता एओलस के अस्तबल में रहते हैं। ये तो हुई पृथ्वी पर चलने वाली हवाएं, जिनसे हम मनुष्यों का वास्ता पड़ता है और जिन्हें हम अपनी सांसों के माध्यम से भीतर लेते हैं। ग्रीस में 'ईथर" नामक ऊपरी, शुद्ध हवा की अवधारणा भी थी, जिसमें देवता सांसें लेते हैं। इस हवा को भी देवता रूप में चित्रित किया जाता था। मिस्र में ऐसा विश्वास था कि अग्नि देवता की सांस से वायु की उत्पत्ति हुई।
सांस के रूप में जब हवा शरीर में प्रवेश करती है, तो इसे प्राण बख्शती है। इसका यही गुण इसे जीवनदायी बनाता है। प्राचीन मिस्र में कहा जाता था कि देवी-देवता मिट्टी की निर्जीव देह की नाक व मुंह के पास जीवन की कुंजी ले जाते हैं, तब देह को पहली सांस प्राप्त होती है और वह जीवंत हो उठती है। कई अन्य संस्कृतियों मंे भी इससे मिलते-जुलते अंदाज में प्रथम श्वास की प्राप्ति से निर्जीव देह में प्राण का संचार होने का वर्णन मिलता है। अब, जबकि सांस के देह में प्रवेश करने से ही उसमें प्राण का संचार होता है, तो जाहिर है कि सांस छिन जाने से वह पुन: निष्प्राण हो जाती है। सांस के यूं छिन जाने के बारे में भी कुछ रोचक मान्यताएं चली आई हैं। पूर्वी चीन में कहा जाता है कि चूहे मनुष्य की सांस चुराने की क्षमता रखते हैं! मानव श्वास पाकर चूहे ताकतवर बन जाते हैं, यहां तक कि मनुष्य का रूप भी धारण कर सकते हैं! इसलिए रात को, जब मनुष्य सोते हैं, तब चूहे उनकी नाक के पास आसन जमाकर उनकी सांस चुरा लेते हैं...! चीन में यदि चूहा 'सांस चोर" माना जाता है, तो कुछ पश्चिमी देशों में बिल्ली इसी गुनाह के लिए बदनाम है। इन देशों में यह अंधविश्वास चला आया है कि बिल्लियां मानव शिशुओं के पास जाकर उनकी सांसें चुरा लेती हैं। सन् 1791 में इंग्लैंड में एक शिशु की रहस्यमय मृत्यु की जांच कर रहे अधिकारी ने तो बाकायदा छानबीन करके यह निष्कर्ष दिया कि एक बिल्ली ने शिशु की सांसें चुरा लीं, जिससे उसकी मृत्यु हो गई!

इसी प्रकार अमेरिका लाए गए अफ्रीकी गुलामों के वंशज 'बू हैग" नामक दुष्ट आत्माओं को मानते आए हैं, जो मनुष्यों की सांसें चुराती हैं। बू हैग के पास न तो अपनी चमड़ी होती है और न ही अपनी सांसें। अपनी पहचान गुप्त बनाए रखने के लिए वे मनुष्य की चमड़ी छीनकर धारण कर लेती हैं। ऊर्जा प्राप्त करने के लिए वे सोते मनुष्यों की सांस चुराती हैं। मगर ऐसा करते वक्त वे इस बात का ध्यान रखती हैं कि मनुष्य जीवित रहे क्योंकि ऊर्जा का अगला 'रिचार्ज" लेने के लिए भी तो उन्हें वापस आना पड़ेगा। सो वे एक बार में बस इतनी सांस चुराती हैं कि सो रहा इंसान बेहद गहरी नींद में चला जाए। जागने पर उसे अपनी सांस कुछ उखड़ी हुई-सी लगेगी और थकान महसूस होगी। हां, यदि मनुष्य ने बू हैग के साथ संघर्ष करने की कोशिश की, तो बू हैग उसकी चमड़ी ही उड़ा ले जाएगी...! जो भी हो, सांस चुराने का यह कार्यक्रम बू हैग को रात में ही निपटाना होता है। कारण यह कि सांस चुराने के लिए उसे अपनी वस्त्रनुमा चमड़ी घर छोड़कर आना होता है और यदि पौ फटने से पहले उसने घर लौटकर फिर से चमड़ी धारण नहीं कर ली, तो उसे सदा के लिए बिना चमड़ी के ही रहना होगा। लोगों ने बू हैग के हाथों अपनी सांसों की चोरी की रोकथाम के लिए भी बड़ा ही मजेदार उपाय खोज निकाला। ऐसा कहा जाता है कि यदि आप अपने बिस्तर के पास एक मोटी झाड़ू रख दें, तो सुरक्षित रह सकते हैं। सांस चुराने आई बू हैग का ध्यान इससे बंट जाएगा और वह झाड़ू के तिनके गिनने बैठ जाएगी। इस गिनती के चक्कर में रात बीत जाएगी और आपकी सांसें महफूज रहेंगीं...! 

Sunday, 3 April 2016

क्योंकि मच्छर भी कभी राक्षस था!

मानव और मच्छर की जंग में मच्छर ही हर बार सेर का सवा सेर होकर सामने आता है। ऐसे में इंसान करे तो क्या करे...? वह खुद को दिलासा ही दे सकता है कि उसे परास्त करने वाला मच्छर दरअसल कोई मामूली, तुच्छ प्राणी नहीं, बल्कि इससे बढ़कर कोई शक्ति है...।
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आप चैन की नींद सो रहे हैं और तभी कान में एक अप्रिय 'गुनगुन" की ध्वनि आपको जगा देती है। मच्छर ने आप पर और आपकी नींद पर एक साथ हमला बोल दिया है...। अब शुरू होती है जंग प्रकृति के 'सबसे विकसित" प्राणी (यानी कि आप) और एक तुच्छ, अदना प्राणी (मच्छर) के बीच। यह वह जंग है, जिसमें डील-डौल या बुद्धि से विजेता का फैसला हो, यह कतई जरूरी नहीं है। छोटी-छोटी बलाएं अक्सर बड़ी बलाओं के मुकाबले कहीं अधिक पीड़ादायक सिद्ध होती हैं और मच्छर भी इससे अलग नहीं है। मच्छर और मानव की जंग में भी तमाम इंसानी जधेजहद के बावजूद पलड़ा ले-देकर मच्छर के ही पक्ष में झुका नजर आता है। मनुष्य उसे मारने-भगाने के उपाय-दर-उपाय करता जाता है और वह है कि हर बार सेर का सवा सेर होकर सामने आ धमकता है। ऐसे में इंसान करे तो क्या करे...? बहुत आसान है। वह खुद को यह दिलासा तो दे ही सकता है कि उसे परास्त करने वाला मच्छर दरअसल कोई मामूली, तुच्छ प्राणी नहीं, बल्कि इससे बढ़कर कोई शक्ति है...। जी हां, मच्छरों से परेशान इंसान ने इनकी उत्पत्ति को लेकर जो मिथक गढ़े हैं, वे बड़े ही रोचक हैं।
अमेरिका के एक आदिवासी समुदाय के लोग बताते हैं कि सैंकड़ों साल पहले एक राक्षस हुआ करता था, जो मानव के मांस और रक्त का शौकीन था। वह रोज किसी-न-किसी का शिकार करता। लोग उससे आक्रांत थे। आखिर एक दिन पंचायत बैठी और इस बात पर विचार-विमर्श होने लगा कि राक्षस के आतंक से कैसे निपटा जाए। एक वीर आदमी आगे आया और उसने दावा किया कि उसके पास राक्षस को मारने की योजना है। वह जाकर उस स्थान पर लेट गया, जहां राक्षस अक्सर आता था। जब राक्षस आया, तो उसने मृत होने का नाटक किया। राक्षस खुश हो गया कि आज तो हट्टा-कट्टा शिकार तैयार ही पड़ा मिल गया। वह उसे उठाकर अपनी गुफा में ले गया। उसे गुफा में पटककर राक्षस चूल्हे के लिए लकड़ी लाने बाहर चला गया। इस बीच वह वीर उठा और उसने राक्षस का विशाल छुरा उठा लिया। कुछ ही देर में राक्षस का बेटा गुफा में आया, तो उसने उस नन्हे राक्षस को दबोच लिया और छुरा उसकी गर्दन पर रखकर पूछा, 'सच-सच बताओ, तुम्हारे पिता का दिल कहां है, वर्ना मैं तुम्हारी गर्दन काट दूंगा।" डरा हुआ नन्हा राक्षस बोल उठा, 'पिताजी का हृदय उनकी बायीं एड़ी में है।" तभी राक्षस लकड़ी लेकर लौटा। जैसे ही उसने गुफा में अपना बायां पैर रखा, वीर मानव ने छुरे से उसकी एड़ी काटकर अलग कर दी। राक्षस वहीं ढेर हो गया। ...मगर मरते-मरते वह बोला, 'तुमने भले ही मुझे मार दिया हो लेकिन मैं तुम मनुष्यों का खून पीना नहीं छोड़ूंगा।" वीर मानव हंस पड़ा और बोला, 'देखता हूं तुम कैसे हमारा खून पीते हो!" उसने राक्षस के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और हर टुकड़े को अलग से जला दिया। फिर सारी राख एकत्रित कर हवा में उड़ा दी मगर यह क्या...! राख का एक-एक कण एक उड़ते हुए जंतु में बदल गया। देखते ही देखते हवा में राख के बजाय मच्छरों की फौज उड़ रही थी। इस प्रकार मच्छर अस्तित्व में आए और आज भी अपने मूल स्वरूप 'राक्षस" की मौत का बदला हम मनुष्यों से ले रहे हैं...!
मच्छर की उत्पत्ति से जुड़ी वियतनामी कहानी में कोई राक्षस-वाक्षस नहीं है, बल्कि प्रेम और धोखा है। इसके अनुसार, एक व्यक्ति अपनी पत्नी से बेहद प्रेम करता था लेकिन भरी जवानी में पत्नी चल बसी। वह उसके बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता था, सो मृत्यु के देवता से गुजारिश की कि वे उसकी पत्नी को फिर जिंदा कर दें। देवता ने कहा कि यदि तुम अपने खून की तीन बूंदें अपनी पत्नी के होंठों पर डालोगे, तो वह जी उठेगी। पति ने खुशी-खुशी अपना खून बहाया और तीन बूंदें पत्नी के होठों पर डाल दीं। पत्नी की मृत देह में जान आ गई। पति की खुशी का ठिकाना न रहा। ... मगर उसकी यह खुशी ज्यादा दिन नहीं ठहरी। पत्नी को प्रेम से अधिक पैसा प्यारा था। एक दिन वह एक अमीर जहाजी के साथ भाग गई! पति ने उसे रोकना चाहा लेकिन वह नहीं रुकी। तब पति ने कहा, 'जाना है तो जाओ लेकिन पहले मेरे खून की वे तीन बूंदें मुझे लौटा दो, जो तुम्हें जिंदा करने के लिए मैंने दी थीं।" पति से पीछा छुड़ाने के लिए पत्नी ने अपनी उंगली में सुई चुभोई और तीन बूंद खून निकाल लिया। जैसे ही उसने ऐसा किया, वह ढेर होकर गिर पड़ी और फिर से मर गई! कहा जाता है कि उसी की आत्मा मच्छर के रूप में लौट आई और फिर से अपना मानव रूप पाने के लिए पति के खून की तीन बूंदें तलाशने लगी। उन्हीं तीन बूंदों की तलाश में आज भी मच्छर हमारा खून चूसते हैं।

यह तो हुआ मच्छरों के खून चूसने का मिथकीय राज लेकिन उनके द्वारा हमारे कान के पास आकर गुनगुनाने का क्या कारण है? अफ्रीका का एक मिथक इसका भी जवाब देता है। इसके अनुसार, मच्छर शुरूआत से ही बहुत शैतान था। वह जा-जाकर जंगल के सारे प्राणियों के कान में कुछ-न-कुछ उल्टी-सीधी बात करता रहता था। उसकी बकवास से तंग आकर एक दिन जंगली छिपकली ने अपने कानों में पेड़ की टहनियां लगा लीं। उसे इस तरह देखकर जंगल के कुछ अन्य पशु डर गए। डर के मारे वे अजीब हरकतें करने लगे। इन हरकतों के कारण कुछ और प्राणी डर गए। डर की श्र्ाृंखला आगे बढ़ती गई। जंगल का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। इसी ऊहापोह में बंदर के हाथों उल्लू के बच्चे की हत्या हो गई। बच्चे की मौत का विलाप करती मादा उल्लू सुबह सूरज को नींद से जगाने की अपनी ड्यूटी नहीं निभा पाई और भोर नहीं हुई! इस सारे गड़बड़-घोटाले से तंग आकर जंगल के प्राणियों ने सभा कर पता लगाने की कोशिश की कि इसका जिम्मेदार आखिर कौन है। छानबीन का निष्कर्ष निकला कि मच्छर ही दोषी है। जब मच्छर ने यह सुना, तो वह वहां से भाग खड़ा हुआ और छिप गया। आज भी वह छिपा रहता है और रात में हमारे कान के पास आ-आकर पूछता है, 'क्या तुम अब भी मुझसे नाराज हो...?" 

Sunday, 27 March 2016

नन्हे-से कंकड़ के बड़े-से अफसाने

कहने को इस विराट संसार में हल्के-फुल्के, नन्हे-से कंकड़ की कोई खास बखत नहीं होनी चाहिए मगर ऐसा है नहीं...।
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नदी या समुद्र किनारे घूमकर लौटने वाले लोग अक्सर वहां से खूबसूरत कंकड़ ले आते हैं। सुंदर वस्तुओं का संग्रह करना वैसे भी एक लोकप्रिय शौक है। फिर ये कंकड़ यात्रा की यादगार का भी काम करते हैं। मगर अति तो हर चीज की बुरी ही होती है न! कुछ लोकप्रिय पर्यटन स्थलों से लोग इतनी बड़ी संख्या में कंकड़ ले जाते हैं कि वहां की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंच सकता है। हाल ही में ताईवान ने इस मामले में सख्ती दिखाई। ताइपेई विमानतल पर बाहर जाती उड़ानें पकड़ने वाले यात्रियों के सामान से ऐसे ही कंकड़ जब्त किए जाने लगे। दो महीने में कुल 100 किलो कंकड़ जमा हो गए, जिन्हें वापस समुद्री किनारों पर बिखेर दिया गया। अधिकारियों का कहना है कि जो एक-दो कंकड़ उठा ले जाता है, उसे लगता है कि इससे भला क्या फर्क पड़ेगा मगर सभी ऐसा करने लगेंगे, तो पारिस्थितिकी का क्या होगा!
ताईवान की यह घटना छोटे-छोटे कंकड़ों के बड़े 'प्रभाव" का रूपक भी प्रस्तुत करती है। कहने को इस विराट संसार में हल्के-फुल्के, नन्हे-से कंकड़ की कोई खास बखत नहीं होनी चाहिए मगर ऐसा है नहीं। जब छोटी-छोटी बूंदों से घड़ा भरता है, तो छोटे-छोटे कंकड़ों से भी बड़े-बड़े काम होते हैं। वह कहानी तो आपको याद होगी ही, जिसमें एक प्यासा कौआ पानी के घड़े तक तो पहुंचा मगर उसमें थोड़ा ही पानी था, जिस तक उसकी चोंच नहीं पहुंच सकती थी। सो उसने पानी को ही चोंच तक लाने का उपाय किया। एक-एक कंकड़ घड़े में डालकर उसने पानी का स्तर ऊंचा उठा दिया और अपनी प्यास बुझा ली।
कंकड़ पानी की ही नहीं, ज्ञान की प्यास भी बुझा सकते हैं, खास तौर पर यदि यह ज्ञान भविष्य में होने वाली किसी घटना से जुड़ा हो...। ग्रीक पौराणिक कथाओं में तीन देवियों का उल्लेख आता है, जिन्हें संयुक्त रूप से 'थ्रियाई" कहा जाता है। उनका शरीर आधा मानव का और आधा मधुमक्खी का था। हालांकि वे देवियों की 'उच्च श्रेणी" में नहीं आती थीं, मगर उन्हें भविष्यकथन का ज्ञान प्राप्त था। यह भविष्यकथन वे कंकड़ों की मदद से करती थीं। वे कंकड़ों को उछालतीं और उनके जमीन पर गिरने पर बनने वाले पैटर्न के आधार पर बतातीं कि भविष्य में क्या होने वाला है! दरअसल 'थ्रियाई" का अर्थ ही होता है कंकड़। यानी इन्हें 'कंकड़ देवियां" भी कह सकते हैं, जो कंकड़ द्वारा भविष्य बताती थीं।
ग्रीस की ही एक अन्य पौराणिक कथा में कंकड़ों का अनूठा प्रयोग सामने आता है। हर्मिज देवराज ज़्यूस के पुत्र और देवताओं के संदेशवाहक थे। ज़्यूस की पत्नी तो हेरा थीं मगर उनके संबंध कई अन्य स्त्रियों से भी थे। हर्मिज भी ऐसी ही एक अन्य स्त्री की संतान थे। उधर ज़्यूस का दिल आईओ नामक एक और स्त्री पर आ गया, जिसे हेरा ने अपनी गिरफ्त में लेकर अपने विश्वस्त सेवक, सौ आंखों वाले दानव आरगस की निगरानी में रखा। उसकी सभी आंखें एक साथ बंद नहीं होती थीं, सो वह सदा जागता रहता था। ज़्यूस ने आईओ को हेरा की कैद से छुड़ाने में हर्मिज की मदद मांगी और हर्मिज तैयार हो गया। वह एक बातूनी चरवाहा बनकर आरगस के पास गया और उसे भांति-भांति के किस्से सुनाने लगा। सभी किस्से एक से बढ़कर एक उबाऊ थे और ऊब के कारण आरगस को नींद आने लगी। उसकी आंखें एक-एक कर बंद होने लगीं। आखिरकार वह हुआ, जो पहले कभी नहीं हुआ था। आरगस की सभी सौ आंखें बंद हो गईं और वह ऊंघने लगा। मौका पाकर हर्मिज ने उसकी हत्या कर दी और आईओ को छुड़ाकर ज़्यूस के पास ले गया। इस धोखे से और इससे भी बढ़कर अपने वफादार सेवक की हत्या से हेरा आगबबूला हो गईं। उन्होंने हर्मिज को देवताओं की अदालत में ला खड़ा किया। हर्मिज पर हत्या का मुकदमा चला। वाकपटुता के चलते अपने पक्ष में उन्होंने ऐसी दलीलें दीं कि सभी देवता उनके कायल हो गए। फैसले के लिए हर देवता के हाथ में एक कंकड़ दिया गया। उनसे कहा गया कि वे जिसके पक्ष में फैसला देना चाहते हैं, अपना कंकड़ उसके कदमों में फेंक दें। सभी ने अपने कंकड़ हर्मिज के कदमों में फेंके। कंकड़ों के ढेर में हर्मिज दब गए और देवताओं की अदालत से बरी हो गए!

चलते-चलते कंकड़ों के एक और उपयोग पर गौर करें। बताया जाता है कि पेंग्विनों की एक प्रजाति के लिए कंकड़ रोमांटिक गिफ्ट का काम भी करते हैं! प्रजनन काल में नर पेंग्विन घूम-घूमकर सुंदर, चिकने कंकड़ तलाशते हैं और फिर सर्वश्रेष्ठ कंकड़ मिलने पर उसे ले जाकर अपनी पसंद की मादा के सामने पेश करते हैं। मादा विभिन्ना नर पेंग्विनों द्वारा लाए गए कंकड़ों में से एक को चुनती है और इसे लाने वाला नर उसका साथी बन जाता है...! 

Sunday, 13 March 2016

एक घाट पर शेर और बकरी...?

विभिन्न प्रजातियों के पशुओं के बीच मित्रता के किस्से हम पंचतंत्र आदि की नीति-कथाओं में पढ़ते-सुनते आए हैं। इन कथाओं से हम चाहे कितने ही आनंदित हों मगर हम यही मानकर चलते हैं कि पशुओं के बीच ऐसे संबंध वास्तविक जीवन में नहीं होते। ... पर कभी-कभी नीति-कथाओं के आदर्श साक्षात रूप में सामने आ जाते हैं...!
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संकट में पड़े पशुओं के लिए अमेरिका में बनाई गई एक पनाहगाह में बाघ, सिंह और भालू की दोस्ती की खूब चर्चा है। इन तीनों की अस्वाभाविक मित्रता दर्शकों को लुभा रही है। प्राकृतिक रूप से इन तीनों पशुओं में सौहार्द्रपूर्ण संबंध नहीं होते। बाघ और सिंह अमूमन एक ही जंगल मंे रहते भी नहीं। मगर ये तीनों मित्र तब से साथ हैं, जब मात्र कुछ माह की उम्र में इन्हें एक ड्रग डीलर के यहां से बरामद कर इधर लाया गया था। तीनों कमजोर, बीमार और घायल थे। ऐसे में उनके बीच ऐसा सखा भाव जागा, जो आज पंद्रह साल बाद भी कायम है। तीनों हमेशा साथ ही रहते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि अलग-अलग प्रजातियों के पशुओं के बीच छुटपन में मित्रता होना अजूबा नहीं है मगर परिपक्वता आने के बाद यह मित्रता अक्सर टूट जाती है। इसलिए बाघ, सिंह और भालू की यह दोस्ती अपवाद ही कही जाएगी।
विभिन्ना प्रजातियों के पशुओं के बीच मित्रता के किस्से हम पंचतंत्र आदि की नीति-कथाओं में पढ़ते-सुनते आए हैं। इन कथाओं से हम चाहे कितने ही आनंदित हों मगर हम यही मानकर चलते हैं कि पशुओं के बीच ऐसे संबंध वास्तविक जीवन में नहीं होते। फिर भी, ऐसे किस्से जीवन का कोई सबक देने के अपने उद्देश्य में सफल हो ही जाते हैं। फिलिपीन्स की ऐसी ही एक कथा शेर और खरगोश की दोस्ती के बारे में है। इसके अनुसार, इन दोनों की दोस्ती अटूट थी। खरगोश अपने दोस्त को शिकार करने में मदद किया करता था। वह शिकार को लुभाकर शेर की दिशा में ले जाता और शेर बड़े इत्मीनान से शिकार कर लेता। बदले में खरगोश को यह फायदा था कि अपने ताकतवर दोस्त के चलते उसे अन्य खतरनाक जानवरों से कोई डर न था। फिर एक बार जंगल में ऐसी बीमारी फैली कि सारे पशु एक-एक कर मरने लगे। आखिर में नदी के मगरमच्छों के अलावा बस, यह शेर और खरगोश ही जिंदा बचे। खरगोश तो घास-फूस खाकर गुजारा कर लेता मगर शेर का मारे भूख के बुरा हाल होने लगा। आखिर भूख के चलते वह अपने दोस्त को ललचाई नजरों से देखने लगा। खरगोश उसके इरादों को भांप गया और उससे दूर-दूर रहने लगा। मगर शेर उसके पीछे आ ही जाता। आखिर एक रात खरगोश ने मरने का नाटक किया। जब शेर उसे मरा हुआ मानकर चला गया, तो खरगोश ने नदी में तैर रहे एक मगरमच्छ को बुलाकर पूछा, 'आप लोग संख्या में कितने हो?" मगरमच्छ ने जवाब दिया, 'बहुत सारे।" इस पर खरगोश बोला, 'मैं कैसे मानूं? आप सब नदी के इस किनारे से उस किनारे तक कतार लगा लो, मैं एक-एक को गिनूंगा।" मगरमच्छ ने अपने सारे साथियों को बुला लिया। सबने कतार बना ली। तब खरगोश बारी-बारी से एक-एक मगरमच्छ की पीठ पर कूदता हुआ गिनने लगा, 'एक, दो, तीन, चार....।" और यूं गिनते-गिनते वह नदी के उस पार पहुंच गया, जहां उसे अपने अब 'भूतपूर्व" हो चुके दोस्त से कोई खतरा नहीं था...! इस कहानी का संदेश यही है कि स्वार्थ के चलते दोस्ती का रिश्ता कभी भी टूट सकता है और ऐसी स्थिति आने पर यथाशीघ्र इस रिश्ते को समाप्त कर देना ही ठीक होता है।
यूं शेर और खरगोश की दोस्ती होना असंभव लगता है और हमारी तर्कशक्ति यही कहती है कि अगर ऐसी दोस्ती हो भी जाए, तो उसका हश्र इस फिलिपीनी कहानी की तरह ही होगा। यानी शेर आखिर में 'अपनी वाली" पर आ ही जाएगा। आखिर हर पशु की अपनी प्रकृति होती है। हम मनुष्य हिंसा को त्याज और सहचर्य को वांछनीय मानते हैं। मगर पशु जगत में इस प्रकार की नैतिक संहिता काम नहीं करती। इसके बावजूद हम एक ऐसे आदर्श संसार की कामना करते हैं, जहां ऐसे नैतिक आदर्श पशु जगत पर भी लागू हों। याद है न, आदर्श संसार की वह प्राचीन भारतीय परिकल्पना, जिसमें शेर और बकरी एक ही घाट का पानी पिएंगे/ पीते थे...? बाइबल में भी ऐसे आदर्श संसार का उल्लेख है, जिसमें भेड़िया और भेड़, तेंदुआ और मेमना, शेर और बछड़ा साथ रहेंगे। इसे शब्दश: न भी लें, तो कुल मिलाकर यह आदर्श है एक ऐसे विश्व का, जिसमें कोई क्लेश, कोई हिंसा, कोई स्वार्थ, कोई भय नहीं होगा।

हम स्वयं को ऐसे किसी आदर्श संसार में पाएंगे, इसकी निकट भविष्य में तो कोई संभावना फिलहाल नजर नहीं आती। मगर पशु जगत की असंभव, अस्वाभाविक मित्रताओं के उदाहरण जब-तब हमारे सामने आते रहते हैं और हमें गुदगुदाते हैं। ... और शायद हमारे दिल में कहीं यह आस भी जगाते हैं, कि एक दिन ऐसी दुनिया वास्तव में होगी, जिसमें शेर और बकरी एक ही घाट से पानी पिएंगे...। 

Sunday, 14 February 2016

गहराइयों का ज्ञात और अज्ञात

जलमग्न शहरों ने हमें हमेशा से रोमांचित किया है। जलमग्न संसार में रहने वाले तिस्लमी जीवों को भी हम मानते आए हैं। विज्ञान जैसे-जैसे समुद्र के राज उजागर कर रहा है, वैसे-वैसे मिथकीय किस्से वास्तवकिता के दायरे में आने को तत्पर हो रहे हैं।
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जो रोजमर्रा के दायरे से बाहर की चीज होती है, वह हमेशा एक कौतुहल भरा आकर्षण रखती है। यूं सभ्यताएं हमेशा से जल-स्रोतों के किनारे पनपती आई हैं मगर इन जल-स्रोतों की गहराइयां लंबे समय तक मनुष्य की पहुंच से बाहर ही रहीं। नतीजा यह हुआ कि इन गहराइयों का अज्ञात संसार कई तरह के मिथकीय किस्से-कहानियों का केंद्र बना। सदियों बाद, जब विज्ञान ने नदियों, झीलों, सागरों और महासागरों की गहन गहराइयों में जाने की सुविधा दे दी, तो यह हमारे लिए रोमांचक खेलों का सबब भी बना और खोज का भी। शौकिया तौर पर डीप-सी डाइविंग करने से हुई शुरूआत पानी के नीचे शादी करने, पानी के नीचे होटल-रेस्तरां चलाने तक जा पहुंची। इसके साथ ही पानी की सतह से नीचे, बहुत नीचे मिले कई रहस्यमयी अवशेषों ने उन पुराने किस्सों और विश्वासों को एक प्रकार से नया जीवन दे डाला।
ज्ञात, अज्ञात और अर्द्धज्ञात जलमग्न शहरों-सभ्यताओं के किस्से-कहानियों ने कई पीढ़ियों को रोमांचित किया है। संभवत: ऐसा सबसे प्रसिद्ध किस्सा एटलांटिस शहर का है, जिसका वर्णन ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने ईसा पूर्व 360 में किया था। इसके अनुसार, एक विशाल द्वीप पर स्थित इस शहर का अस्तित्व प्लेटो के काल से 9,000 साल पहले था। यहां के लोग अत्यंत गुणी, आध्यात्मिक और सैन्य रूप से शक्तिशाली थे मगर अंतत: वे लोभ और नैतिक पतन के शिकार हो गए और एथेन्स पर हमला कर बैठे। वे इस युद्ध को तो हार ही गए, जल्द ही एक भीषण भूकंप की वजह से महज एक दिन और एक रात में यह विशाल द्वीप समुद्र की गहराइयों में समा गया। माना जाता है कि यहां के लोगों के नैतिक पतन के कुपित होकर देवताओं ने उन्हें यह सजा दी थी। एटलंटिस की कहानी को सच्ची मानने वाला एक वर्ग लंबे समय से अटलांटिक महासागर में इसकी खोज करता आया है।
इधर कई जगहों पर प्राचीन जलमग्न बसाहटों के पाए जाने से ऐतिहासिक घटनाओं और पौराणिक कथाओं को नई रोशनी में देखा जाने लगा है। खंबात की खाड़ी में इस सदी की शुरूआत में पाए गए अवशेषों को भगवान कृष्ण की द्वारिका के अवशेष माना गया है। इसी तरह, प्राचीन मिस्र की महारानी क्लियोपेट्रा की राजधानी एलिक्जेंड्रिया के जलमग्न अवशेष 1998 में पाए गए। माना जाता है कि यह शहर करीब डेढ़ हजार साल पहले डूब गया था। यहां कई पुरावशेष लगभग साबुत हालत में मिले हैं। ग्रीस में समुद्र के नीचे 5,000 साल पुराने पावलोपेट्री शहर के अवशेष मिले हैं।

यह तो हुई कभी सतह से ऊपर रहे और फिर किसी कारण पानी में समा गए शहरों की बात। अनेक संस्कृतियों में ऐसे मनुष्य-सदृश प्राणियों का उल्लेख आता है, जो पानी के भीतर ही रहते हैं। मसलन, जापान में कप्पा नामक जल-जीवों के बारे में बताया जाता है, जो बड़े शरारती होते हैं। वे पानी के किनारे पर आने वालों को डराते हैं और कभी-कभी डुबोकर उनका खून भी पी लेते हैं। नॉर्वे और आइसलैंड के समुद्र में क्रेकन नामक जल-दानव के बारे में बताया जाता है, जो आते-जाते जहाजों पर हमला कर देता है। स्कॉटलैंड में ऐशरे नामक जल-जीवों के होने की मान्यता है, जो पूरी तरह पारदर्शी होते हैं और केवल रात में ही विचरते हैं। यदि इन्हें पकड़कर रोशनी में लाया जाए, तो ये पिघल जाते हैं। स्कॉटलैंड में ही फिनफोक नामक समुद्रवासी जीवों के बारे में बड़ी ही दिलचस्प मान्यता है। फिनफोक नर और मादा एक-दूसरे से ब्याह नहीं कर सकते क्योंकि यदि ऐसा किया, तो मादा अपना सौंदर्य और तिलस्मी शक्तियां खो देगी तथा हर एक साल में सात-सात साल बुढ़ाती जाएगी। इसलिए फिनफोक नर जहां मानव बस्तियों में घुसकर महिलाओं को उठा ले जाते हैं और उनसे ब्याह करते हैं, वहीं मादाएं पुरुषों का अपहरण कर उनसे शादी करती हैं। स्त्री हो या पुरुष, फिनफोक से शादी के बाद मानव को एक तरह से गुलाम बनकर ही रहना होता है, वह भी पानी की सतह के नीचे...! 

Sunday, 24 January 2016

मदिरा के नए-पुराने देव!

एक देवी द्वारा मनुष्य से शादी करने पर नाराज देवता तब संतुष्ट हुए, जब मदिरा से परिचित होकर मनुष्य देवों के 'समकक्ष" हो गए...!
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उत्तर कोरिया के सर्वेसर्वा किम जोंग उन निरंतर मानव मात्र के कल्याण हेतु जुटे हुए हैं। अपने सभी देशवासियों के लिए अपनी व अपनी धर्मपत्नी की हेयरस्टाइल को अनिवार्य करने और अमेरिका को नेस्तनाबूद करने में सक्षम हाइड्रोजन बम बनाने (का दावा करने) के बाद उन्होंने एक और क्रांतिकारी उपलब्धि का ऐलान करवाया है। दावा है कि उत्तर कोरिया के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी शराब का आविष्कार किया है, जिसे पीने के बाद हैंगओवर नहीं होगा। खबर में स्पष्ट किया गया है कि इस शराब से नशा तो जरूर होगा, बस हैंगओवर नहीं होगा। किम साहब की प्राथमिकताओं की दाद देनी होगी। उत्तर कोरिया लगातार खाद्यान्ना की कमी से जूझता आया है। वर्तमान में भी वहां सूखे की वजह से हालात गंभीर हैं और खुद सरकारी मीडिया ने इसे पिछले 100 वर्षों का सबसे भयावह सूखा बताया है। ऐसे में किम महोदय के नेतृत्व में उनके यशस्वी वैज्ञानिकों ने हैंगओवर-मुक्त मदिरा के निर्माण में अपना समय, ऊर्जा और प्रतिभा उड़ेल दी, इसे आप क्या कहेंगे...! खैर, अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने का अधिकार हर देश को है, सो उत्तर कोरिया भी निश्चित ही गौरवान्वित है। वहां धर्म का चलन बहुत अधिक नहीं है मगर यदि होता, तो शायद व्यक्ति-पूजा के लिए कुख्यात इस देश में किम जोंग उन को बाकी तमाम उपाधियों के अलावा मदिरा के देवता का तमगा भी मिल गया होता...!
यदि ऐसा हो जाए, तो किम मदिरा के देवता/देवियों की लंबी फेहरिस्त के नवीनतम सदस्य बन जाएंगे। शराब का निर्माण पहले-पहल कहां और किसने किया, यह ठीक-ठीक बताना मुश्किल है मगर इतना तय है कि सभी प्राचीन सभ्यताओं में किसी-न-किसी रूप में इसका निर्माण और सेवन होता था। इसके गुणों का महिमामंडन भी किया जाता था और इसके दुष्प्रभावों के प्रति आगाह भी। मजेदार बात यह है कि अन्ना के देवी-देवताओं की तर्ज पर अनेक संस्कृतियों में मदिरा के देवी-देवता भी हुए हैं। अफ्रीका में जुलु जनजाति मबाबा मवाना वरेसा नामक देवी को मानता आया है, जो वर्षा, कृषि और उर्वरता की देवी होने के साथ-साथ मदिरा की देवी भी हैं क्योंकि उन्हीं ने मनुष्यों को मदिरा बनाना सिखाया। इसके पीछे एक बड़ी रूमानी कहानी बताई जाती है। इसके अनुसार, मबाबा को स्वर्गलोक में अपने लिए कोई योग्य वर नहीं मिला, तो वे उसकी तलाश में पृथ्वीलोक पर पधारीं। यहां उनकी भेंट एक चरवाहे से हुई और वे उसे दिल दे बैठीं। दोनों ने शादी कर ली और सुख से रहने लगे। मगर स्वर्गलोक में इस रिश्ते को लेकर बड़ी नाराजगी थी। देवता मनुष्यों को हेय समझते थे और इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि एक देवी ने एक साधारण मनुष्य से विवाह किया है। तब मबाबा ने मनुष्यों के लिए मदिरा बनाई और इसे बनाने की विधि भी उनसे साझा की। अब तक देवताओं का विशेषाधिकार रही मदिरा को पीकर मनुष्य भी एक प्रकार से देवताओं के समकक्ष आ गए और फिर देवताओं को इस रिश्ते पर नाराजगी नहीं रही...!
ग्रीस में डायोनाइसस और रोम में बैकस को मदिरा के देवता का खिताब मिला हुआ है। डायोनाइसस को ऐसे लोगों का रक्षक भी माना जाता है, जो परंपरागत समाज के नहीं हैं या कहें कि बहिष्कृत हैं। उन्हें अक्सर एक भव्य जुलूस में जाता हुआ चित्रित किया जाता है, जिसमें उनके स्त्री व पुरुष भक्त सुध-बुध खोकर नृत्य करते चल रहे हैं। लोमड़ी की खाल धारण किए बैठे डायोनाइसस के रथ को शेर खींच रहे हैं। उधर प्राचीन सुमेरिया में निनकासी को मदिरा की देवी का रुतबा मिला हुआ है। कहा जाता है कि देवलोक में मदिरा का निर्माण उन्हीं के जिम्मे था। इसी लीक पर चलते हुए सुमेरिया में लंबे समय तक शराब बनाना महिलाओं का ही काम माना जाता था। निनकासी के लिए जो स्तुति गाई जाती थी, वह एक तरह से मदिरा निर्माण की विधि ही थी! प्राचीन योरप में ही केल्टिक समुदाय सुकेलस को खेतों, जंगलों और मदिरा का देवता मानता था। इन्हें मुख्य रूप से ग्रामीणों और गुलामों का इष्ट देव कहा जाता था और हमेशा हाथ में मदिरा का पात्र लिए दर्शाया जाता था। दक्षिण अमेरिका की माया सभ्यता में शराब के देवता अकेन थे, जिनके नाम का शब्दिक अर्थ 'डकार" या 'कराह" था! शायद वे उत्तर कोरियाइयों जितने खुशनसीब नहीं थे और हैंगओवर से बच नहीं पाते थे...!