Sunday, 28 January 2018

बर्फ को आग के हवाले कर जाड़े की विदाई

यूं तो वसंत का स्वागत दुनिया के हर कोने में अपने-अपने तरीके से किया जाता है मगर ठंडे देशों में इसका महत्व इसलिए जरा अलग है कि इसके साथ ही भीषण जाड़े की विदाई भी हो जाती है। विदाई और स्वागत के ये उत्सव विविध रंगों से भरपूर होते हैं।
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सर्दियों में सुस्त, जड़वत पड़ी प्रकृति जब ठंड की विदाई के साथ नवजीवन से निखर उठती है, तो संसार भर में वसंत का उल्लास छा जाता है। अमूमन हर संस्कृति में वसंत के आगमन को प्रकृति के पुनर्जीवन से जोड़ा जाता आया है। इसके साथ ही जुड़े हैं अनेक रोचक मिथक। मसलन, ग्रीस में कहते हैं कि जब कृषि व वनस्पति की देवी डिमीटर की बेटी परसेफनी को पाताल लोक का राजा हेडीज उठा ले गया, तो डिमीटर ने धरती पर सारी वनस्पति को जड़वत कर दिया। न कहीं कोई फूल खिला, न कोई फल पका। खेत सूख गए, अकाल पड़ गया। तब देवराज ज़्युस, जोकि परसेफनी के पिता भी थे, ने हेडीज को परसेफनी को लौटाने का आदेश दिया। हेडीज इस आदेश को मानने के लिए बाध्य था मगर इससे पहले उसने चालाकी से परसेफनी को अनार के कुछ दाने खाने को दिए, जिन्हें परसेफनी ने खा लिया। चूंकि उसने पाताल लोक का फल खाया था, सो उसके लिए हर साल कुछ समय पाताल लोक में गुजारना अनिवार्य हो गया। इसीलिए प्रति वर्ष जब वह पाताल लोक चली जाती है, तो धरती पर सर्दियां पड़ती हैं और प्रकृति सुप्तावस्था में चली जाती है। परसेफनी के पाताल लोक से लौटने पर वसंत ऋतु आती है और प्रकृति पुनर्जीवन को प्राप्त होती है।
एक दिलचस्प बात यह है कि मिस्र से लेकर चीन तक और फारस से लेकर रोम तक अंडे को पुनर्जीवन या नवजीवन के प्रतीक के रूप में देखा और अपनाया गया। इसके पीछे संभवत: फीनिक्स नामक मिथकीय पक्षी की कथा है। माना जाता है कि इस पक्षी ने ईडन (अदनवाटिका) के वर्जित वृक्ष का फल खाने से इनकार कर दिया था, जबकि आदम-हव्वा ने इस वर्जना को तोड़ा था। इसके चलते फीनिक्स को वरदान प्राप्त हुआ। हर 500 साल बाद वह विशेष जड़ी-बूटियों से अपने लिए घोंसला बनाता है, कुछ देर उसमें विश्राम करता है और फिर खुद को भस्म कर लेता है। जब उसकी आग बुझती है, तो उसकी राख में एक अंडा पाया जाता है, जिसमें से फीनिक्स पुन: प्रकट हो उठता है। कुछ वैसे ही, जैसे प्रकृति वसंत के आगमन के साथ फिर से जी उठती है।

वसंत के आगमन व सर्दियों की विदाई के लिए दुनिया के कोने-कोने में अलग-अलग तरह से उत्सव मनाए जाते हैं। बोस्निया के जेनिका नामक शहर में वसंत का आगमन सामूहिक रूप से अंडे की भुर्जी बनाकर किया जाता है। शहर भर के लोग नदी किनारे इकट्ठा होते हैं और बड़े-बड़े बर्तनों में अंडे की भुर्जी बनाते हैं, जिसे लोगों में बांट दिया जाता है। स्विट्जरलैंड के ज्युरिख में वसंत ऋतु के फूलों का खिलना आरंभ होने के साथ ही जाड़े के प्रतीक स्वरूप बर्फ के पुतले को होली-नुमा लकड़ी के ढेर पर खड़ा कर, धूमधाम से आग के हवाले कर दिया जाता है। कभी-कभी धूम-धड़ाके के लिए पुतले में पटाखे भी भरे जाते हैं। पोलैंड में जाड़ों के प्रतीक रूप में सूखी घास से 'मरजाना" नामक लड़की का पुतला बनाया जाता है। फिर इसे जुलूस के साथ गांव-शहर भर में घुमाकर अंत में या तो आग के हवाले कर दिया जाता है या फिर नदी में बहा दिया जाता है। इसके साथ ही वसंत के आगमन का उत्सव शुरू हो जाता है।

Sunday, 14 January 2018

राजा की बूटी से जन्मता बिच्छू!

तुलसी के पश्चिमी रिश्तेदार को राजा के योग्य बूटी कहा गया। इसे पवित्र भी माना गया लेकिन साथ ही, बिच्छुओं से इसका अनोखा संबंध बताया गया...
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भारतीय संस्कृति में तुलसी का महत्व सर्वविदित है। दिलचस्प बात यह है कि इसी गुणी पौधे का रिश्तेदार, जिसे पश्चिमी जगत बेसिल के नाम से जानता है, भी सांस्कृतिक परंपराओं की समृद्ध विरासत लिए हुए है। इसे पवित्र भी माना गया है, राजसी भी। इसके लिए ग्रीक भाषा में जो शब्द है, उसका शाब्दिक अर्थ है 'राजा के योग्य बूटी"। मगर विरोधाभास यह है कि ग्रीस और रोम में ही प्राचीन काल में माना जाता था कि बेसिल का पौधा तभी पनपेगा, जब इसके बीज बोते समय धरती को खूब अपशब्द कहे जाएं!
एक समय पश्चिमी योरप में बेसिल को इस कदर पवित्र माना जाता था कि इसकी कटाई करने से पहले व्यक्ति को विशेष नियमों का पालन करना पड़ता था। उसे तीन पवित्र जल स्रोतों के पानी में हाथ धोने होते थे, फिर स्वच्छ सफेद सूती कपड़े धारण कर, 'अपवित्र" लोगों के स्पर्श से बचते हुए, बिना धातु के औजार इस्तेमाल किए, कटाई करनी होती थी। क्रीट (ग्रीस का एक द्वीप) में लोग घर की खिड़कियों पर बेसिल लगाते थे। उनका विश्वास था कि इससे घर शैतान के दुष्प्रभाव से बचा रहेगा। इसी प्रकार अलग-अलग समय पर योरप के अलग-अलग भागों में ये धारणाएं भी चल पड़ी थीं कि दुकान के द्वार पर बेसिल लगाने से बिक्री बढ़ जाती है, जेब में इसकी टहनी लेकर चलने से धन प्राप्ति होती है तथा फर्श पर इसके पत्ते बिखेरने से अपशकुन दूर होता है।
रोम के ख्यात प्रकृतिविद प्लिनी को विश्वास था कि बेसिल के बीजों में यौन क्षमता बढ़ाने का गुण होता है। मोलदेविया (आधुनिक रोमानिया का हिस्सा) में ऐसी मान्यता थी कि यदि कोई युवक किसी युवती के दिए बेसिल के पत्ते ग्रहण कर ले, तो उसे उस युवती से प्रेम हो जाता है। योरप में एक समय दुल्हनों की 'पवित्रता" आंकने के लिए बेसिल का उपयोग किया जाता था। दुल्हन को एक बेसिल की टहनी कुछ देर के लिए थामने को दी जाती। अगर वह कुम्हला न जाए, तो माना जाता था कि दुल्हन पाक-साफ है। और कुम्हला जाए, तो समझ लीजिए शादी कैंसल...!
चौदहवीं सदी में इतालवी लेखक जियोवादी बोकाचियो ने अपने एक दुखांत लघु उपन्यास में बेसिल का अनूठा चित्रण किया। इसमें नायिका के भाई उसके प्रेमी की हत्या कर उसे दफना देते हैं। प्रेमी उसके सपने में आकर बताता है कि वह कहां दफन है। तब नायिका रात के अंधेरे में उस स्थान पर जाकर, कब्र खोदकर, प्रेमी के शव से सिर काट लाती है और अपने घर में बेसिल की गमले में उसे छुपा देती है। फिर वह प्रतिदिन अपने आंसुओं से इस पौधे को सींचती है। एक दिन उसके भाइयों को पता चल जाता है और वे उससे वह गमला छीनकर दूर ले जाते हैं। तब नायिका भी प्राण त्याग देती है।

बेसिल को लेकर कुछ धारणाएं तो बिल्कुल ही हैरत में डालने वाली रही हैं। मध्यकाल में एक अंगरेज वैज्ञानिक ने दावा किया था कि अगर बेसिल के पत्तों को किसी नम स्थान पर पत्थर के नीचे दबाकर रखा जाए, तो दो दिन बाद वहां एक बिच्छू जन्म ले लेता है! हद तो तब हो गई, जब लोग इस बात को और आगे ले गए और कहा जाने लगा कि अगर कोई बेसिल के पत्तों को अधिक देर तक सूंघता रहे, तो उसके मस्तिष्क में ही बिच्छू आकार ले लेता है...!

Sunday, 24 December 2017

दोधारी तलवार से कम नहीं छुरी!

छुरी खतरे, डर व दर्द से रक्षा करती है, तो अपशकुन होने, दोस्ती टूटने व किसी खूनी के जन्म की चेतावनी भी देती है...!
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कभी-कभी हम रोजमर्रा के जीवन में जो वस्तुएं इस्तेमाल करते हैं, उनके अतीत व उन्हें लेकर लोक संस्कृति में व्याप्त धारणाओं की ओर हमारा ध्यान नहीं रहता। अब छुरी को ही लें। रसोई में इस्तेमाल होने वाली साधारण-सी छुरी में भी इंसान ने ऐसी विलक्षण शक्तियां देखीं, कि इसे लेकर कल्पनाओं का विस्तृत संसार रच डाला। मसलन, क्या आप जानते हैं कि पश्चिमी देशों में ऐसा माना जाता रहा है कि मुख्य द्वार में एक छुरी घोंपकर रखने से घर सुरक्षित रहता है? यही नहीं, शिशुओं के पालने के सिरहाने भी एक छरी घोंपी जाती थी, ताकि शिशु की हर खतरे से रक्षा हो सके! इसी प्रकार एक मान्यता यह थी कि प्रसव के दौरान महिला के बिस्तर के नीचे एक छुरी रख देने से उसकी प्रसव पीड़ा कम हो जाती है। यूनान के लोग मानते रहे हैं कि अगर आप काले हैंडल वाली छुरी अपने तकिए के नीचे रखकर सोएंगे, तो आपको बुरे सपने नहीं आएंगे। कुल मिलाकर, छुरी में खतरों से, दर्द से व डर से रक्षा करने की ताकत देखी गई! तार्किक मन को ये बातें हास्यास्पद लग सकती हैं मगर कल्पनाशील मस्तिष्क ऐसे ही तो काम करते हैं।
छुरी किसी दोधारी तलवार से कम नहीं होती। इसकी धार अगर अप्रिय, अनचाहे को काट सकती है, तो प्रिय व चहीते को भी क्षति पहुंचा सकती है। यही ध्यान में रखते हुए कई संस्कृतियों में आगाह किया जाता है कि अपने किसी मित्र को कभी तोहफे में छुरी नहीं देना चाहिए। अगर दी, तो दोस्ती का बंधन 'कट" सकता है, यानी दोस्ती टूट सकती है। अब यदि शंका है, तो समाधान भी है। तो दोस्ती टूटने की शंका का समाधान यह निकाला गया कि जब कोई दोस्त आपको छुरी भेंट करे, तब आप उसे प्रतीकात्मक भुगतान के तौर पर एक सिक्का दे दें। जब भुगतान चुकाया, तो फिर यह तोहफा थोड़े ही हुआ! अब यह तो अच्छा नहीं लगता कि आप किसी को कोई तोहफा भी दें और यह भी उम्मीद करें कि वह आपको इसकी कीमत चुकाएगा। तो इसके आगे रास्ता यह निकाला गया कि तोहफा देने वाला ही छुरी के ऊपर एक सिक्का चिपकाकर भेंट करे। प्राप्तकर्ता बस, वह सिक्का निकाले और तोहफा देने वाले को प्रतीकात्मक भुगतान कर दे।
एक सलाह यह भी दी जाती आई है कि दो छुरियों को कभी भी साथ में, एक-दूसरे की विपरीत दिशा में आड़ी नहीं रखना चाहिए। ऐसा करने से आपका किसी से झगड़ा हो सकता है। कई नाविक समुद्री सफर के दौरान छुरी का नाम लेना अपशकुन मानते हैं। वहीं कुछ देशों में छुरी का जमीन पर गिरना अपशकुन माना जाता है, तो कुछ देशों में इस बात का संकेत कि आपके घर कोई मेहमान आने वाला है। आइसलैंड में यदि मछली साफ करते वक्त किसी मछुआरे के हाथ से छुरी गिर जाए और उसकी नोक समुद्र की ओर हो जाए, तो वह खुश हो जाता है। यह इस बात का संकेत माना जाता है कि अगली बार जब वह समुद्र में जाएगा, तो उसे बड़ी संख्या में मछलियां मिलेंगीं। उधर रूस में कहते हैं कि छुरी की तेज धार ऊपर की ओर करके रखने से कहीं कोई हत्यारा जन्म लेता है।

कुछ देशों में छुरी के स्वामित्व को लेकर भी बड़ी दिलचस्प बात कही जाती है। वह यह कि कोई सही मायने में किसी छुरी की मालिक तभी बनता है जब छुरी उसका खून पिए! यानी छुरी ने आपका हाथ काटकर आपका खून बहाया, तब वह वास्तव में आपकी हुई। इसके बाद यह आपका कर्तव्य बनता है कि आप किसी और को, 'आपकी" हो चुकी यह छुरी इस्तेमाल न करने दें।

Sunday, 10 December 2017

आफत की नन्ही पुड़िया

क्या नन्ही-सी गिलहरी इतने बड़े कारनामे कर सकती है कि सूरज को ही निगल ले या विभिन्ना लोकों को आपस में लड़वा दे? विश्व की कुछ पौराणिक मान्यताएं तो ऐसा ही कहती हैं...
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अमेरिका के एक आदिवासी समुदाय में ऐसा माना जाता आया है कि सूर्य ग्रहण के लिए काली गिलहरी जिम्मेदार है। उस इलाके में पाई जाने वाली यह काली गिलहरी अपनी शरारतों के लिए ख्यात, या कहें कुख्यात है। अपने शरारती स्वभाव के चलते ही यह समय-समय पर सूर्य को निगलने की कोशिश करती है और इसी से सूर्य ग्रहण होता है। जाहिर है, आदि काल में लोगों के लिए सूर्य का यूं अंधकार की ओट में चले जाना भयाक्रांत करने वाला अनुभव था। तो इस 'आपदा" को दूर करने के प्रयास करना भी लाजिमी था। ये आदिवासी मानते थे कि यदि गिलहरी को डरा दिया जाए, तो वह सूर्य को खाने का प्रयास करना छोड़ सकती है। तो जैसे ही सूर्य ग्रहण शुरू होता और किसी की उस पर निगाह पड़ती, चारों ओर मुनादी कर दी जाती कि काली गिलहरी सूर्य को निगल रही है। बस, सारे लोग अपने-अपने घर से निकल आते और गिलहरी को डराने के लिए ज्यादा से ज्यादा शोर मचाने में जुट जाते। बर्तन-भांडे, घंटे-घड़ियाल बजाए जाते। साथ ही चीखने-चिल्लाने के स्वर भी इनमें मिला दिए जाते। अक्सर इनके पालतू श्वान भी इस शोरगुल में अपना सुर मिला देते। फिर, जैसे-जैसे ग्रहण समाप्त होने लगता, लोग खुशी के मारे झूम उठते। फिर से मुनादी होती कि काली गिलहरी डर गई है। ग्रहण समाप्त होते ही चारों ओर खुशियां फैल जातीं। लोगों को यकीन हो जाता कि उनके शोर-गुल के कारण ही काली गिलहरी ने डर के मारे सूरज को खाने का इरादा त्याग दिया।
यूं गिलहरी को बड़ा मासूम व निरीह प्राणी माना जाता है। ऐसे में यह दिलचस्प है कि कहीं इसे इतनी बड़ी 'शरारत" के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए। एक अन्य अमेरिकी समुदाय में लाल गिलहरी की ख्याति भी बदमिजाजी के लिए है। कहा जाता है कि बहुत पहले यह गिलहरी भालू जितनी बड़ी हुआ करती थी और किसी पर भी हमला बोल दिया करती थी। तब ईश्वर ने उसका आकार छोटा कर दिया, ताकि वह दूसरों को नुकसान न पहुंचा सके। मगर ईश्वर उसका स्वभाव बदलना भूल गए। इसीलिए आकार छोटा होने के बावजूद लाल गिलहरी की बदमिजाजी नहीं गई। अब चूंकि वह किसी को शारीरिक नुकसान तो पहुंचा नहीं सकती, सो यूं ही चिल्ला-पुकार करती फिरती है। यही नहीं, वह विभिन्ना प्राणियों के कान भरकर उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ भड़काती है, ताकि वे आपस में लड़ मरें!
स्कैंडिनेवियाई देशों की पौराणिक मान्यताओं में रैटाटॉस्कर नामक गिलहरी का जिक्र आता है। यह उस महावृक्ष पर रहती है, जो नौ लोकों को जोड़ता है। रहती ही नहीं है, यह वृक्ष के सबसे निचले भाग, यानी सबसे निचले लोक से लेकर सबसे ऊंचे भाग, यानी सबसे ऊंचे लोक तक आती-जाती है व संदेशवाहक का काम करती है। हालांकि यहां भी अक्सर वह शरारत पर उतर आती है और एक से दूसरे लोक को भेजे जाने वाले संदेशों में अपनी ओर से मिर्च-मसाला मिला देती है, जिससे लोकों के बीच ठन जाती है!

पश्चिमी देशों में गिलहरी के सपनों को लेकर भी दिलचस्प धारणाएं चली आई हैं। कोई कहता है कि सपने में गिलहरी को देखने का मतलब है कि आपको व्यक्तिगत संबंधों में प्रेम का और व्यवसाय में मुनाफे का अभाव है। वहीं कोई कहता है कि अगर सपने में आप गिलहरी को भोजन इकट्ठा करते हुए देखें, तो इसका मतलब है कि आपको धनलाभ होने वाला है। यदि सपने में आप गिलहरी को खाना खिला रहे हैं, तो इसका मतलब हुआ कि आपके पास धन-धान्य की कमी नहीं है। यानी बहुत कुछ कहती है गिलहरी...!

Saturday, 25 November 2017

पेड़ के तनों में किसकी अनंत तलाश?

आखिर पेड़ों पर अपनी चोंच पटक-पटककर कठफोड़वा क्या तलाशता रहता है? अपने लिए भोजन या भोजन की तलाश में निकले अपने बच्चे...?
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यूं विभिन्ना पक्षियों को हम उनकी आवाज से पहचानते हैं। कहीं चीं-चीं, तो कहीं कांव-कांव, कहीं कूऽऽ, तो कहीं सीटी जैसी कोई आवाज।...। मगर शायद एक ही पक्षी है, जिसकी अपनी आवाज के बजाए उसकी कारगुजारी की आवाज ही उसकी पहचान बन गई है। आसपास लगातार ठक-ठक-ठक की आवाज आ रही हो, तो हम समझ जाते हैं कि कठफोड़वा किसी पेड़ पर सक्रिय है। लकड़ी पर अपनी चोंच से वार करने की उसकी यह क्रिया उसे पक्षी जगत में विलक्षण बनाती है। यह पेड़ों के तने व शाखाओं पर मौजूद कीड़ों को खाता है और तने को कुरेद-कुरेदकर, उसमें कोटर बनाकर अपना आशियाना बसाता है।
वैज्ञानिकों ने गणना कर बताया है कि कठफोड़वा 24 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से अपना सिर पेड़ के तने में दे मारता है, वह भी एक-एक मिनट में सौ-सौ बार तक! अगर उसकी जगह कोई मनुष्य हो, तो पहली बार सिर दे मारने के बाद ही अस्पताल पहुंच जाए मगर कठफोड़वे के शरीर की बनावट उसका बाल भी बांका नहीं होने देती। ऐसे में इस अनोखे पंछी को लेकर विस्मय होना स्वाभाविक है।
अमेरिका के मूल निवासियों में कठफोड़वे की उत्पत्ति को लेकर रोचक दंतकथाएं सुनाई जाती हैं। इनमें से एक के अनुसार, एक बार परमात्मा धरती पर विचरण करने आए और आम इंसान की तरह लोगों से मिलने लगे। एक दिन उन्होंने एक कंजूस महिला का द्वार खटखटाया और कहा, 'मैं कई दिनों से भूखा हूं। क्या आप मुझे खाने को कुछ देंगीं?" महिला ने अनमने ढंग से उसे भीतर बुलाया और थोड़ा-सा आटा अपनी भट्टी में डालते हुए बोली, 'जब यह रोटी पक जाए, तो तुम इसे खा सकते हो।" मगर जब रोटी पकी, तो महिला को लगा कि यह तो बहुत बड़ी बन गई, यह इसे क्यों खिलाऊं? इसके लिए मैं और छोटी रोटी बनाती हूं। मगर इस बार रोटी और भी बड़ी बनी। यह सिलसिला चलता रहा। दरअसल परमात्मा अपनी शक्तियों से हर बार भट्टी में रोटी को पहले से बड़ा बनाते जा रहे थे। उधर महिला ने आखिरकार अपने अजनबी मेहमान से आकर कह दिया कि मेरे पास तुम्हें खिलाने के लिए कुछ नहीं है, जंगल में जाकर तलाश लो, शायद पेड़ों के तनों में तुम्हें कुछ खाने को मिल जाए। यह सुनकर परमात्मा कुपित हो गए। उन्होंने अपना वास्तविक रूप महिला को दिखाया और उसे श्राप दिया कि अब तुम जीवन भर जंगलों में भटकोगी और पेड़ों के तनों में ही खाना तलाशोगी। अगले ही क्षण वह कठफोड़वा बन गई।
एक अन्य अमेरिकी दंतकथा कहती है कि बहुत पहले रेगिस्तान में एक नशीला पौधा उगता था। उस पर उगने वाली गांठनुमा आकृति को खाने से तिलस्मी सपने आते थे, जिसमें देवता आकर मनुष्यों से बातें करते थे और बताते थे कि भविष्य में क्या होने वाला है। मगर इन्हें खाने की अनुमति केवल ओझाओं को थी। एक बार एक लड़के ने चुपके से यह वर्जित गांठ खा ली। उसे खाते ही उसने खुद को एक अनूठे स्वप्नलोक में पाया, जहां हवा में रंगों कर समंदर तैर रहा था और देवताओं जैसी दिखने वाली आकृतियां चल-फिर रही थीं। फिर वह 'सो" गया। अगले दिन जब वह जागा, तो अपने अनुभव से रोमांचित था। उसने गांव में अपने दोस्तों को यह बात बताई, तो दोस्त भी जादुई गांठ को आजमाने जा पहुंचे। देखते ही देखते गांव के सभी लोग इस नशे में डूबने लगे। नतीजा यह हुआ कि वे अपना काम-धंधा ही नहीं, अपने नन्हे बच्चों तक को उपेक्षित करने लगे। वे दिन भर नशे में पड़े रहते और बच्चे खाने की तलाश में इधर-उधर भटकते रहते।

आखिर मानीटोउ देवता को बच्चों पर दया आ गई। उन्होंने बच्चों को भोजन दिया और उन्हें पेड़ों के खोखले तनों में छिपा दिया, जहां वे झुलसाती धूप और खतरनाक जानवरों से सुरक्षित रह सकते थे। जब गांववालों ने अपने बच्चों को गायब पाया, तो उन्हें ढूंढने निकल पड़े। तब मानीटोउ देवता उनके सामने प्रकट हुए और कहा कि मैंने तुम्हारे बच्चों को पेड़ों के तनों में छिपा दिया है। लोगों ने पूछा, हमें बच्चे वापस कैसे मिलेंगे? तो देवता बोले, मैं तुम लोगों को पक्षी बना देता हूं, तुम एक-एक पेड़ पर जाकर उसके तने को ठोक-ठोककर अपने बच्चे तलाश लो। बस, वे सारे लोग कठफोड़वे बन गए और आज भी अपने खोए हुए बच्चों की तलाश में पेड़ों पर ठक-ठक करते रहते हैं।

Sunday, 5 November 2017

पुण्य के बाजार में पाप की आउटसोर्सिंग!

क्या पाप करने के बाद अपनी आत्मा की मुक्ति का सौदा किया जा सकता है? अपने पापों की सजा से बचने के लिए क्या इन्हें किसी और के सिर हस्तांतरित करना संभव है? इंसान ने इसके भी रास्ते तलाश किए हैं और उन पर चला है।
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पुरानी फिल्मों में एक दृश्य बहुत आम हुआ करता था। कोई अमीरजादा कहीं खून कर आता और फिर वह या उसका पिता किसी गरीब, मजबूर के आगे रुपयों का लालच देकर उसे यह खून अपने सिर लेने के लिए तैयार कर लेता। गरीब पुलिस/ अदालत के सामने खुद को दोषी बता देता और जेल चला जाता। कहानी बड़ी फिल्मी होती। मगर ऐसे किस्से यदा-कदा हकीकत में भी सामने आते रहे हैं। यह तो हुई अपराध की सजा से बच निकलने के लिए कानून की आंखों में धूल झोंकने की बात। लेकिन क्या किसी पाप की सजा से बचने के लिए ऐसा ही बलि का बकरा आगे कर साक्षात ईश्वर को धोखा दिया जा सकता है? बात सुनने में अटपटी लग सकती है लेकिन इंसानी दिमाग की खुराफातों की कोई सीमा नहीं।
पाप और पुण्य की अवधारणा हर समाज-संस्कृति में रहती आई है। मृत्यु होने पर गुनाहों की सजा का सिद्धांत इंसान सदा मानता आया है। वह यह भी जानता आया है कि दुनिया में ऐसा कोई नहीं जिसने कभी कोई पाप न किया हो, तो भला वह कैसे अपवाद हो सकता है! इसलिए मृत्यु उपरांत अपने पापों का अंजाम भुगतने का भय उस पर व्याप्त रहा है। इसी अंजाम से बचने की जुगत में उसने पाप मुक्ति की अनूठी तरकीब निकाल ली। वह यह कि कुछ सिक्कों के बदले में अपने पाप का ठीकरा किसी गरीब के सिर फोड़ दिया जाए और 'पापमुक्त" का लेबल लगवाकर परलोक रवाना हुआ जाए! आज की कॉर्पोरेट भाषा में कहें, तो खुद पाप कर उसके अंजाम की 'आउटसोर्सिंग" कर दी जाए। गोया पाप भी फोन नंबर की तर्ज पर पोर्ट होकर एक आत्मा छोड़ दूसरी आत्मा से नत्थी हो जाए!
ब्रिटेन के ग्रामीण इलाकों में लंबे समय तक एक प्रथा प्रचलित थी, जिसे 'सिन ईटिंग" यानी पाप भक्षण कहा जाता था। इसमें होता यह था कि घर में किसी की मृत्यु होने पर परिजन उसके शव पर कुछ देर के लिए ब्रेड का टुकड़ा रख देते या उसे शव के ऊपर से गुजारते। उनका विश्वास था कि ऐसा करने से दिवंगत के सारे पाप ब्रेड सोख लेती है। फिर किसी पेशेवर पाप भक्षक को बुलाया जाता, जो यह ब्रेड खा लेता। इसके साथ उसे कुछ मदिरा भी पिला दी जाती। दिवंगत के पाप सोख चुकी ब्रेड खाने से उसके पाप उस पेशेवर पाप भक्षक में स्थानांतरित हो जाते। कभी-कभी पाप भक्षक अंत्येष्टि के समय बाकायदा घोषणा करता कि उसने दिवंगत के पाप अपने ऊपर ले लिए हैं और दिवंगत आत्मा पाप के बोझ से मुक्त होकर परलोक के लिए रवाना हो सकती है। इस सबके बदले उस गरीब को चंद सिक्के दे दिए जाते। जाहिर है, इस पेशे में वे ही आते, जो नितांत निर्धन व निरुपाय होते। समाज उन्हें हिकारत से देखता, क्योंकि वे इतने-इतने पापों का बोझ जो लेकर जी रहे होते थे। उनकी बस्ती गांव के बाहर होती। उन्हें केवल पाप परोसने के लिए गांव में बुलाया जाता।
इंग्लैंड की यह प्रथा किस प्रकार शुरू हुई, इस बारे में ठीक-ठीक कुछ कह पाना मुश्किल है। वैसे यह माना जाता है कि पहले धनी वर्ग में किसी की मृत्यु होने पर गरीबों को बुलाकर भोजन कराया जाता और उनसे आग्रह किया जाता कि वे दिवंगत आत्मा की मुक्ति/ शांति के लिए प्रार्थना करें। यही रिवाज आगे चलकर पाप भक्षण प्रथा में बदल गया।

ऐसा भी नहीं है कि पाप के हस्तांतरण की ऐसी प्रथा केवल इंग्लैंड में ही रही हो। प्राचीन मेक्सिको में त्लेजलत्येतल नामक देवी को पाप मुक्ति की देवी कहा जाता था। ऐसा विश्वास था कि यदि अंतिम घड़ी में कोई इस देवी के समक्ष अपने सारे पापों का स्वीकार कर ले, तो देवी उसके पापों का भक्षण कर लेती हैं और उस व्यक्ति की आत्मा पाप के बोझ से मुक्त होकर परलोक सिधार सकती है। मिस्र व यूनान में भी इससे मिलती-जुलती प्रथा हुआ करती थी। इसराइल में एक खास पर्व पर एक बकरे के समक्ष पापों का स्वीकार किया जाता और फिर उसे पहाड़ से नीचे फेंककर बकरे व पाप दोनों से मुक्ति पा ली जाती थी...!

Sunday, 15 October 2017

चाय के प्याले में टपका रेशम

नर्म, मुलायम रेशम का इतिहास गोपनीयता व षड़यंत्र के कई उतार-चढ़ावों से भरा हुआ है। जहां चीन ने इससे खूब कमाई की, वहीं एक समय रोमन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था पर इसके कारण संकट के बादल मंडराने लगे थे।
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रेशम के मुलायम स्पर्श की मुरीद दुनिया सदियों से है। तमाम वस्त्रों के बीच इसका विशिष्ट स्थान रहता आया है। एक समय बहुत ही सीमित लोगों तक इसकी पहुंच थी। रेशम की जन्मस्थली चीन में इसके निर्माण के राज की रक्षा इस कदर की जाती थी कि सीमाओं पर देश से बाहर जा रहे लोगों की तलाशी ली जाती थी। यदि किसी के पास रेशम के कीड़े, कोये (ककून) आदि पाए जाते, तो उसे तत्काल मौत के घाट उतार दिया जाता था। बताते हैं कि इस प्रकार चीन ने लगभग 30 सदियों तक रेशम पर अपना एकाधिकार बनाए रखा था!
रेशम की खोज को लेकर चली आई चीनी कथा बड़ी मजेदार है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में चीनी सम्राट शुआनयुआन की पत्नी ली जू एक दिन शहतूत के पेड़ के नीचे बैठकर चाय पी रही थी कि अचानक उसके प्याले में कुछ जंगली कोये गिर गए। उसने कोये निकालने की कोशिश की, तो पाया कि उनमें से रेशे निकलते जा रहे हैं। इस प्रकार रेशम की खोज हुई। इस खोज के सम्मान में ली जू को लोगों ने रेशम की देवी का दर्जा दे डाला। आज भी चीन के हुझोऊ शहर में प्रति वर्ष अप्रैल में मनाए जाने वाले एक उत्सव में ली जू देवी की विशेष तौर पर पूजा की जाती है और रेशम की खोज करने के लिए उनका धन्यवाद दिया जाता है। चीनी लोगों को रेशम पर अपना एकाधिकार इस कदर प्यारा था कि लंबे समय तक उन्होंने इसे देश से बाहर ले जाने पर पाबंदी लगाए रखी। आखिरकार जब एक राजकुमारी दूसरे देश में ब्याही गई और उसने अपने प्रिय रेशमी परिधानों के बगैर ससुराल जाने से इनकार कर दिया, तब रेशम ने पहली बार देश की सरहद पार की। मगर इसके बाद भी सदियों तक इसे बनाने की विधि को गुप्त रखा गया।
खैर, रेशम ही नहीं, इसके उत्पादन की विधि भी अंतत: दूसरे देशों में फैली। यह जहां भी गया, पहले-पहल इसका उपयोग राजघरानों तक ही सीमित रहा। बताया जाता है कि एक बार रोमन सम्राट जूलियस सीजर रेशमी परिधान धारण कर एक नाटक देखने गए। उनके द्वारा पहना गया रेशमी कपड़ा इतना आकर्षक था कि लोग नाटक को भूलकर उनके कपड़ों को ही देखते रहे! एक समय ऐसा भी आया, जब रोम के रईसों में रेशम का चस्का इस कदर बढ़ा कि इससे साम्राज्य की अर्थव्यवस्था गड़बड़ाने का अंदेशा होने लगा। कारण यह कि बेहद महंगे दामों पर रेशम खरीदे जाने के चलते रोम के सोने के भंडार घटने लगे। तब संसद ने कभी अर्थव्यवस्था, तो कभी नैतिकता का हवाला देकर रेशम के उपभोग को हतोत्साहित करने का प्रयास किया। उधर चीन ने रेशम के व्यापार से जमकर कमाई की और इस व्यापार की ही गरज से 6 हजार मील लंबा रेशम मार्ग अस्तित्व में आया।
रेशम निर्माण की विधि जिस किसी के भी हाथ लगी, उसने इसे गुप्त रखने के भरसक प्रयास किए। इसके कारण छल-प्रपंच व षड़यंत्रों का लंबा दौर चला। माना जाता है कि आधुनिक तुर्की में रेशम निर्माण तब शुरू हुआ, जब सम्राट के कहने पर कुछ साधु अपनी बांस की खोखली लाठियों में रेशम के कीड़े के अंडे छुपाकर चीन से ले आए!

चीनी लोक साहित्य में रेशम से जुड़ी कहानियों की भरमार है। ऐसी ही एक कहानी में शहतूत के पेड़ के जन्म के बारे में बताया गया है। इसके अनुसार, एक आदमी अपनी बेटी तथा घोड़े के साथ रहता था। एक बार उसे काम के सिलसिले में दूर देश जाना पड़ा। कुछ दिन बाद उसकी बेटी को पिता की याद सताने लगी और उसने घोड़े से कह दिया, 'जाओ, जाकर मेरे पिताजी को ढूंढ लाओ। यदि तुम उन्हें ले आए, तो मैं तुमसे शादी कर लूंगी।" घोड़ा गया व अपने मालिक को खोज लाया। पिता को पाकर बेटी की खुशी का ठिकाना न रहा मगर वह घोड़े से किया गया वादा भूल गई। घोड़ा अनमना रहने लगा। उसके व्यवहार से मालिक को कुछ शक हुआ। उसने बेटी से पूछा कि क्या मेरी अनुपस्थिति में तुमने घोड़े से कोई बात की थी? बेटी ने शादी के वादे के बारे में बताया। इस पर पिता ने घोड़े को मार डाला ताकि बेटी को उससे ब्याह न करना पड़े। मगर एक दिन जब वह लड़की घर से बाहर निकली, तो घोड़े की आत्मा ने तिलस्मी लबादा ओढ़ाकर उसे एक कोया बना दिया, जिसमें से कुछ समय बाद शहतूत का पेड़ उग आया...