Sunday, 5 March 2017

मुस्कान के तोहफे लाते पंछी

इस दुनिया को जो चीजें रहने लायक और हंसी-खुशी रहने लायक बनाती हैं, उनमें कुछ भोले-से, कुछ खब्ती-से, कुछ नटखट तो कुछ सयाने ये पंछी भी शामिल हैं।

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आप कहीं बैठे हों और अचानक कोई नन्ही-सी चिड़िया फुर्र से उड़कर या हौले-हौले फुदकते हुए आपके पास आ जाए, तो आपकी प्रतिक्रिया क्या रहेगी? मन पुलकित हो उठेगा। चेहरे पर बरबस मुस्कान खिल उठेगी। कुछ पलों के लिए ही सही, चिंताएं मानो गायब हो जाएंगी...। अब ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के कुछ शोधकर्ताओं ने पाया है कि जो लोग चहचहाते पंछियों के बीच रहते हैं, उनके अवसाद, तनाव व व्यग्रता से ग्रस्त होने की संभावना घट जाती है। दूसरे शब्दों में, प्रकृति और खास तौर पर पक्षियों का सान्निाध्य हमारे मानसिक कुशलक्षेम पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
देखा जाए, तो यह कोई बहुत अनोखी बात नहीं है। मनुष्य और पक्षियों के मध्य एक अनूठा रिश्ता सदा से रहता आया है। इस रिश्ते में नैसर्गिक वात्सल्य का भी पुट है और पारस्परिक सहयोग व आदान-प्रदान का भी। इस दुनिया को जो चीजें रहने लायक और हंसी-खुशी रहने लायक बनाती हैं, उनमें कुछ भोले-से, कुछ खब्ती-से, कुछ नटखट तो कुछ सयाने ये पंछी भी शामिल हैं।
वापस ब्रिटिश-ऑस्ट्रेलियाई शोध पर लौटें, तो पक्षियों के हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की अनेक मिसालें सामने आती रही हैं। मसलन, अमेरिका में 1970 के दशक में सारस की एक प्रजाति विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई थी। उसके संरक्षण के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास चल रहे थे। संरक्षणकर्ता चाहते थे कि ये सारस मनुष्यों से जितना दूर रह सकें, दूर ही रहें क्योंकि मनुष्य इन्हें नुकसान पहुंचाते हैं और यदि ये मनुष्यों के सान्निाध्य के आदी हो गए, तो अनजाने में अपनी व अपनी प्रजाति की मौत को बुलावा देंगे। उधर क्लैरिस नामक महिला अपने आंगन में पक्षियों के लिए खूब दाना डालकर रखा करती थी। सारसों के एक समूह की नजर यहां पड़ी और वे नियमित रूप से क्लैरिस के आंगन में आने लगे। देखते ही देखते उन्होंने इस आंगन को मानो अपना घर ही बना लिया। मगर संरक्षणकर्ता तो इन्हें मनुष्यों से दूर रखना चाहते थे। सो उन्होंने क्लैरिस से आग्रह किया कि वे अपने आंगन में दाना डालना बंद कर दें। मगर क्लैरिस ने साफ इनकार कर दिया। कारण यह कि उनके पति अलजाइमर रोग से पीड़ित थे। वे अपने में सिमटे, गुमसुम रहते थे मगर जैसे ही आंगन में ये खूबसूरत सारस दिखाई देते, उनके चेहरे पर मुस्कान दौड़ जाती। खुशी मानो कुछ पलों के लिए उनके जीवन में लौट आती। जो काम कोई दवा न कर पाई थी, वह इन पंछियों ने कर दिखाया था...
अफ्रीका के तंजानिया व मोजांबिक में 'हनीगाइड" नामक पक्षी पाए जाते हैं। इनका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि ये वाकई गाइड की तरह मुनष्यों को मधुमक्खियों के छत्तों तक ले जाते हैं। शहद निकालने वालों और इन वन्य पक्षियों के बीच एक बिल्कुल अनूठा संबंध पनप गया है। जंगलों के ऊंचे पेड़ों पर या पहाड़ियों में बने छत्ते, जो इंसान को नजर नहीं आ पाते, उन्हें ये पक्षी खोज निकालते हैं। फिर शहद निकालने वालों के पास जाकर एक खास तरह की ध्वनि निकालते हैं और यहां से वहां छोटी-छोटी उड़ान भरकर उस दिशा को इंगित करते हैं, जहां चलना है। उनके इंसानी मित्र उनके दिखाए रास्ते पर चल पड़ते हैं। छत्ते तक पहुंच जाने पर मनुष्य अपने 'हुनर" से धुआं वगैरह करके मधुमक्खियों को भगा देते हैं व शहद निकाल देते हैं। अब छत्ते में बचा मोम हनीबर्ड्स की दावत बनता है। दरअसल इसी दावत की प्राप्ति के लिए इन्होंने शहद निकालने वाले मनुष्यों के साथ यह रिश्ता बनाया है। मधुमक्खियों के हमले के डर से ये सीधे छत्तों तक नहीं पहुंच सकते, सो इंसानी मदद लेते हैं और बदले में इंसानों का भी भला करते हैं!

कुछ समय पहले गेबी नामक बच्ची के बारे में पढ़ा था, जिसकी इधर-उधर खाना गिराने की आदत ने उसे मोहल्ले के कौओं की दोस्त बना दिया। कौए रोज उसके आने-जाने का इंतजार करने लगे। फिर गेबी व उसकी मां बाकायदा कौओं के लिए आंगन में खाना डालने लगीं। अब एक अजीब-सी बात देखने में आई। कौए जब खाना चट कर लौट जाते, तो अपने पीछे गेबी के लिए लाए कुछ 'तोहफे" छोड़ जाते, जैसे कान की बाली, स्क्रू, शीशे का टुकड़ा आदि। मानो वे अपनी इस नन्ही अन्नापूर्णा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे हों! सच तो यह है कि पंछी हमारे लिए इन छोटे-छोटे भौतिक उपहारों से कहीं बढ़कर तोहफे लेकर आते हैं...

Saturday, 11 February 2017

"मेरे देश का कपड़ा...!"

कोई छः-सात साल का वह बालक शायद अपने पापा की बाइक को साफ करने का शौक पूरा करने एक हाथ में पानी स्प्रे करने वाली बोतल और दूसरे में कपड़ा लेकर बाहर निकला। मगर बाहर अपनी ही लगभग हमउम्र दोस्तों को देख उनके साथ खेलने लगा। खेल-खेल में शरारत सूझी और वह दोनों लड़कियों पर पानी स्प्रे करने लगा। लडकियां इधर-उधर भागने लगीं, वह पानी छिड़कता गया। बड़ी वाली लड़की डांटने लगी, "इतनी ठंड है और तू पानी डाल रहा है!" बालक को अपनी भूल का एहसास हुआ और वह दूसरे हाथ में थामे कपड़े से अपनी दोस्त के चेहरे पर लगा पानी पोछने लगा। मगर इस पर वह और भड़क गई। "तूने मेरे मुंह पर ये गन्दा कपड़ा लगाया!" बालक तपाक से बोल पड़ा, "ए भाई, ये कपड़ा गन्दा नईं है, हो!" मगर उसकी सफाईपसंद दोस्त संतुष्ट नहीं हुई और उसे चपत-पर-चपत मारने लगी और दोहराती रही, "तूने मुंह पर गंदा कपड़ा लगाया...।" थोड़ी और मार खा लेने के बाद बालक अचानक अपने कंधे चौड़े करके बोल पड़ा, "तो क्या? ये मेरे देश का कपड़ा है!"
अभी जीवन का एक दशक पूरा करने से दूर वह मासूम न जाने कैसे सीख चुका है कि अपनी गलत करतूतों पर पर्दा डालने की लिए देश (और देशभक्ति) की आड़ लेना मुफ़ीद रहता है...।
...(अपने ड्रॉइंग रूम की खिड़की से देखी सत्य घटना)।

Thursday, 2 February 2017

चार चोरों का रक्षा कवच

आखिर उन कुख्यात चोरों ने ऐसा कौन-सा रक्षा कवच ईजाद कर लिया था कि वे जानलेवा महामारी के बीच भी बेधड़क चोरियां किए जा रहे थे...?
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मध्ययुगीन योरप में प्लेग फैला हुआ था। फ्रांस भी इस महामारी से अछूता नहीं था। चारों ओर मौत का तांडव जारी था। शायद ही कोई घर हो जहां इस दर्दनाक मौत ने दस्तक न दी हो। इस सबके बीच, टुलुज शहर में लगातार चोरी की वारदातें हो रही थीं। दिन में इत्र बेचने वाले चार शख्स रात को बेधड़क घरों में घुस-घुसकर जो हाथ आता, चुरा ले जाते। किसी घर में कोई जीवित न होता, केवल लाशें पड़ी होतीं जिनका अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई न होता। तो किसी घर में मृत्यु के कगार पर पहुंच चुके प्लेग रोगी होते, जो चोरों को रोकने में असमर्थ होते। महामारी और मौत के हाहाकार के बीच ये चोरियां प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गई थीं। आखिरकार चोर पकड़े गए और अदालत में पेश किए गए। उन्होंने अपना अपराध कबूल भी कर लिया मगर जज साहब को एक सवाल लगातार परेशान कर रहा था। वह यह कि जो बीमारी महामारी बनकर चारों ओर फैली हुई थी, उससे ये चारों चोर कैसे बच गए! वह भी तब, जबकि वे रोज प्लेग पीड़ितों और इससे मरने वालों की लाशों के पास इतना-इतना समय बिताया करते थे! जज ने चोरों के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर तुम लोग प्लेग से बच निकलने का राज बताओ, तो तुम्हारी सजा माफ कर दी जाएगी।
तब चोरों ने अपनी सेहत का जो राज बताया, उसे सुनकर जज समेत सभी चौंक गए। उन्होंने बताया कि वे सेब के सिरके में लहसुन व कुछ जड़ी-बूटियां मिलाकर प्रतिदिन न केवल इसका सेवन करते थे, बल्कि प्लेग पीड़ितों के पास जाने से पहले अपने सिर से पांव तक यह सिरका लगा लेते थे। यही उनका रक्षा कवच था और इसी की बदौलत वे इतने दिनों से महामारी के बीच भी चोरियां करते फिर रहे थे। यह किंवदंति कितनी सच है और कितनी गप्प, यह विवाद का विषय है मगर प्लेग से बचाव का यह नुस्खा 'चार चोरों वाला सिरका" के नाम से मशहूर हो गया और आज भी है।
विभिन्ना रोगों में सिरके के उपयोग से होने वाले लाभों का बखान सदियों से होता आया है। आयुर्वेद में भी औषधि के रूप में इसके उपयोग का उल्लेख आता है। मिस्र में मिले 3000 ईसा पूर्व के कुछ मर्तबानों में सिरके के अंश मिले हैं, जिससे उस समय भी इसके इस्तेमाल का पता चलता है। वैसे कहा यह भी जाता है कि पहले-पहल सिरके का उपयोग महज सफाई के लिए किया जाता था। भोजन व चिकित्सा का हिस्सा यह बाद में बना। सिरके के गुणों को देखते हुए इसका विविध प्रकार से उपयोग किया गया और साथ ही इसे लेकर भांति-भांति के दावे किए गए, मिथक गढ़े गए। ऐसा ही एक किस्सा मिस्र की महारानी क्लियोपेट्रा को लेकर है। वह यह कि एक बार क्लियोपेट्रा ने अपने प्रेमी रोमन सेनापति मार्क एंथनी से शर्त लगाई कि वह संसार का सबसे महंगा भोजन परोस सकती है। फिर उसने सिरके से भरे दो ग्लास मंगवाए। उसने अपने कानों में दुनिया के दो सबसे बड़े मोतियों के झुमके पहन रखे थे। एक झुमके से मोती निकालकर उसने एक ग्लास में डाला, तो मोती सिरके में घुल गया। क्लियोपेट्रा उसे पी गई और फिर दूसरा मोती निकालकर अपने मेहमान के सिरके के ग्लास में डालने जा रही थी कि एंथनी के साथी प्लैंकस ने उसे रोक दिया और शर्त का विजेता घोषित कर दिया।

दूसरी-तीसरी सदी ईसा पूर्व हुए अफ्रीकी सेनापति हैनिबल द्वारा रोम कूच करने और हाथियों पर सवार हो आल्प्स पर्वत पार करने को लेकर कई किंवदंतियां हैं। इनमें से एक यह भी है कि रास्ते में आने वाली बड़ी चट्टानों पर हैनिबल ने सिरका डलवाकर उनके छोटे-छोटे टुकड़े करवाए ताकि उन टुकड़ों को आसानी से हटाकर सेना आगे बढ़ सके। सत्रहवीं सदी में फ्रांस के राजा लुई 13वें की सेना अपनी तोपों को इस्तेमाल के बाद ठंडा करने के लिए उन पर सिरका लगाया करती थी। जापान के समुराई लड़ाके अपनी ताकत बढ़ाने के लिए नियमित रूप से चावल के सिरके का सेवन किया करते थे। रोमन सैनिक भी ताकत और ताजगी के लिए सिरका पीते थे। वहीं अमेरिकी गृहयुद्ध से लेकर प्रथम विश्व युद्ध तक सेनाओं में इसका इस्तेमाल एंटीसेप्टिक के तौर पर घावों पर लगाने के लिए किया जाता था। 

Sunday, 22 January 2017

सिंहासन पर सूर्य की संतान

मानव सदा सूर्य के प्रताप का कायल रहा है और शासक अपना संबंध सूर्य से जोड़ते रहे हैं। अनेक देशों के शासक सूर्यवंशी होने का दावा करते आए हैं।
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सूर्य का हमारे जीवन, हमारी संस्कृति और हमारी आस्थाओं में क्या स्थान है, यह सर्वविदित है। पृथ्वी को जीवन ऊर्जा प्रदान करने वाले सूर्य की महत्ता लगभग हर युग में, हर कहीं स्वीकार की गई है। यही कारण है कि विभिन्ना रूपों में सूर्य की पूजा मानव सभ्यता का अभिन्ना अंग रही है। दक्षिण अमेरिका के इन्का साम्राज्य में सूर्य देवता इन्टी को सृष्टि निर्माता वीराकोचा का पुत्र माना गया। समुद्र की देवी उनकी मां थीं और पृथ्वी तथा चंद्रमा उसकी बहनें। चूंकि सूर्य की कृपा से ही फसलें उगती थीं, सो इन्का लोगों के मन में इन्टी देव के प्रति असीम श्रद्धा थी। मगर सदा अपनी कृपा बरसाने वाले इन्टी कभी-कभी अपने भक्तों से रुष्ट भी हो जाते थे। सूर्य ग्रहण को उनके क्रोध का परिणाम माना जाता था। तब रुष्ट सूर्यदेव को मनाने के लिए विशेष चढ़ावे चढ़ाए जाते थे।
इस दक्षिण अमेरिकी सभ्यता में सूर्य के प्रति श्र्ाृद्धा इस कदर व्याप्त थी कि शासक वंश स्वयं को इन्टी, यानी सूर्य का ही वंशज बताता था। कहा जाता था कि पृथ्वीवासियों की अराजकता व असभ्यता से इन्टी दुखी थे, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र मान्को कपाक से कहा कि वह पृथ्वी पर जाए और मनुष्यों को सही तरीके से जीना सिखाए। इस प्रकार मान्को कपाक ने धरती पर सभ्यता की स्थापना की और प्रथम इन्का सम्राट बने। यह कुछ वैसा ही है, जैसे भारत में सूर्यवंश की उत्पत्ति सूर्य से मानी गई है। इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया आदि की कुछ जनजातियां भी स्वयं को सूर्य देव की वंशज मानती आई हैं। मिस्र में सम्राट को चित्रों में अक्सर सिर पर सूर्य को धारण किए हुए दर्शाया जाता था।
सूर्य की शक्ति का कायल होने के लिए आदि काल से ही मनुष्य के पास अनेक कारण थे। ऊर्जा के इस अनंत स्रोत से ही समस्त सृष्टि जीवन पाती है। आसमान में विराजित सूर्य की नजर से समस्त संसार में कुछ भी छुपा नहीं रह सकता। फिर, यह भी है कि सूर्य प्रकाश का परम स्रोत है और प्रकाश को हमेशा से ज्ञान के साथ जोड़ा जाता आया है। सो सूर्य ज्ञानवान भी माना गया। वह अपना प्रकाश व अपनी ऊष्मा समूचे संसार को समान रूप से प्रदान करता है, इसलिए वह न्यायप्रिय भी हुआ। इस प्रकार सूर्य को उन गुणों से लैस पाया गया, जो शासक वर्ग स्वयं में दर्शाना चाहता है। यही कारण है कि हर दौर, हर काल में शासक अपना संबंध सूर्य से जोड़ते आए हैं। उधर मेसोपोटामिया में राजा को 'मेरे आका" की तर्ज पर 'मेरे सूर्य" कहकर संबोधित किया जाता था।
वापस इन्का सभ्यता की बात करें, तो वहां तीन नैतिक सिद्धांतों पर जोर दिया जाता था। ये थे- चोरी मत करोे, झूठ मत बोलो और आलस मत करो। मान्यता यह थी कि जो लोग इन सिद्धांतों का पालन करते हैं, वे मृत्यु के बाद सूर्य की ऊष्मा के बीच रहते हैं और जो इनका पालन नहीं करते, उन्हें मृत्यु उपरांत सर्द धरती पर ही सदा के लिए रहना होता है। जांबिया की जनजातियां मानती आई हैं कि आसमान के देवता सूर्य पर वास करते हैं। इसी प्रकार मिस्र में कहा जाता था कि सृष्टि का सृजन करने वाले अमुन देव सूर्य पर रहते हैं। घाना व माली जैसे अफ्रीकी देशों में भी सृष्टि निर्माता का वास सूर्य पर माना गया था।

धारणाएं व अस्थाएं अनेक हैं मगर ये सब यही दर्शाती हैं कि सूर्य हमेशा से मानव को विस्मित करता आया है। और यह तय है कि आसमान में टंगा यह आग का विराट गोला जब तक धधकता रहेगा, तब तक विस्मय का रिश्ता बना रहेगा।

Sunday, 8 January 2017

खुशी लाता बैंगनों का ख्वाब!

बैंगन को कभी प्रेम का फल कहा गया, तो कभी पागलपन का फल। इसे बीमारियों की जड़ भी माना गया और शुभत्व का प्रतीक भी।
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मध्य-पूर्वी देशों में एक कहावत है कि तीन बैंगनों का सपना देखना खुशी का प्रतीक होता है। बात सुनने में थोड़ी अजीब लग सकती है। जिस सब्जी (तकनीकी रूप से फल) के बारे में हमारे यहां अनेक लोगों की राय है कि यह 'बेगुण" है, उसे सपने में देखना भला खुशी का प्रतीक कैसे हुआ? और वह भी एक नहीं, तीन-तीन बैंगन! यह कहावत इतना तो जाहिर करती ही है कि मध्य-पूर्व में बैंगन किस कदर लोकप्रिय रहा है। सच भी यह है कि हालांकि बैंगन की उत्पत्ति भारत में हुई मानी जाती है लेकिन इसे सबसे ज्यादा प्यार व लोकप्रियता मिली मध्य-पूर्व में। तुर्की में यह इस कदर खाया जाता रहा है कि वहां दक्षिणी हवाओं का नाम ही 'बैंगन की हवा" रख दिया गया था। कारण यह कि ये हवाएं उन चूल्हों की आग भड़काती थीं, जिन पर गली-गली में बैंगन पकाया जा रहा होता। वैसे तुर्की में आज भी इसका उपयोग इतने व्यापक तौर पर होता है कि एक किस्सा यह भी है कि जब एक विदेशी अतिथि से भोजन के उपरांत पूछा गया कि और क्या लीजिएगा, तो बेचारे को कहना पड़ा, 'बस, एक ग्लास पानी ... और कृपया उसमें बैंगन मत डालिएगा!"
बैंगन की इतिहास देखें, तो हम पाते हैं कि यह जहां-जहां गया, वहां या तो जबर्दस्त रूप से लोकप्रिय हुआ या फिर उतने ही व्यापक तौर पर बदनाम। जब यह दक्षिण योरप पहुंचा, तो वहां के लोगों ने इसे 'प्रेम का फल" कहा क्योंकि उनका मानना था कि इसमें यौन शक्ति वर्द्धक गुण होते हैं। मगर जब यह अपनी यात्रा में थोड़ा आगे बढ़ा और उत्तरी योरप में गया, तो लोगों ने इसे 'पागलपन का फल" नाम दिया। उनका मानना था कि बैंगन खाने से दिमागी संतुलन जाता रहता है! यह भी बताया जाता है कि कुछ योरपीय देशों ने बैंगन को पहले-पहल भोज्य पदार्थ के बजाए दांतदर्द की दवा के तौर पर अपनाया था। कहते हैं कि सत्रहवीं सदी में फ्रांसीसी सम्राट लुईस सोलहवें को नए-नए फल-सब्जियों को आजमाने व अपने मेहमानों को परोसकर उनकी वाहवाही पाने का शौक था। इसी क्रम में उन्होंने बैंगन को भी अपनी शाही रसोई में स्थान दिया। मगर जब यह उनके मेहमानों को परोसा गया, तो उन्हें यह कोई खास रास नहीं आया।
उधर अमेरिका का बैंगन से परिचय कराने का श्रेय वहां के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन को जाता है। उन्हें काश्तकारी का शौक था और वे योरप से नए-नए पौधों के बीज मंगाकर अपने यहां उगाते थे। उन्हीं ने पहले-पहल अमेरिका में बैंगन उगाया। हालांकि उस समय तक अमेरिका में भी इसकी कुख्याति पहुंच चुकी थी। लोग इसे दिमागी असंतुलन के अलावा कुष्ठ रोग व कैंसर का कारक भी मानते थे। यही कारण है कि शुरुआत में अमेरिकियों ने इसे उगाया भी, तो सजावटी पौधे के तौर पर। कोई एक सदी के बाद ही उन्होंने इसे खाने की हिम्मत जुटाना शुरू किया!

एक समय बैंगन फारस (आधुनिक ईरान) में भी बदनाम था, जहां इसे मुंहासों से लेकर मिर्गी के दौरे तक के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता था! उधर चीन व जापान ने अपने यहां बैंगन के आगमन का दिल खोलकर स्वागत किया। जापान में तो यहां तक कहा जाता है कि नया साल शुरू होने पर सबसे पहले फुजी पर्वत, फिर बाज और उसके बाद तीसरे क्रम पर बैंगन के दर्शन होना शुभ होता है!

Thursday, 29 December 2016

राहों में बिखरे किस्से

इतिहास की राहें और राहों का इतिहास अनेकानेक दिलचस्प किस्सों से भरा पड़ा है...
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कभी सोचा है, यदि सड़कें न होतीं तो जीवन कैसा होता? कैसे होता सफर, कैसे होता पर्यटन, कैसे होता व्यापार और कैसे निभती सामाजिकता? सीमाओं तक किस प्रकार पहुंचते सैनिक और रोगी कैसे पहुंचते चिकित्सक के पास? कह सकते हैं कि सड़कें न होतीं तो सभ्यता भी न होती। कच्चे रास्तों ने जब पक्की सड़कों का रूप लेना शुरू किया, तो मनुष्य ने अपने विकासक्रम में एक लंबी छलांग लगाई। पहिए के आविष्कार की सार्थकता सिद्ध करने के लिए सड़कें जरूरी थीं।
सड़कें बनीं, तो लंबे-लंबे सफर शुरु हुए। ऐसा नहीं है कि इससे पहले सफर नहीं होते थे। होते थे, मगर सड़कों ने उन्हें गति दी, व्यवस्थित और सुगम बनाया। लंबे सफर की संभावनाओं के रोमांच के साथ ही इंसान के मन में अनजान राहों की अनिश्चितताओं का भय भी व्याप्त हुआ। तब उसने अपनी सुरक्षा के लिए और अपने सफर के उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी दिव्य शक्ति का आह्वान करना जरूरी समझा। प्राचीन रोम में जहां एबियोना जाते सफर की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली देवी के रूप में पूजी जाती थीं, वहीं एडियोना वापसी के सफर की देवी मानी जाती थीं। देश कोई भी हो, प्राचीन मार्गों के किनारों पर अक्सर किसी आराध्य के छोटे-बड़े देवालय बनाए जाते थे। इनकी उपस्थिति मात्र से और इनके समक्ष शीष नवाने से सफर के दौरान किसी परा शक्ति का सुरक्षा कवच प्राप्त होने का आभास होता था। यूनान में प्रकाश के देवता अपोलो को सुरक्षित यात्रा के लिए प्रसन्ना किया जाता था। इसका एक कारण तो यह था कि यात्रा दिन के प्रकाश में की जाती थी और दूसरा कारण यह कि सूर्य के रथ का सारथी होने के नाते अपोलो स्वयं एक दिव्य यात्री थे। सफर के लिए अच्छा मौसम अनिवार्य था, सो कई जगहों पर सुरक्षित सफर के लिए मौसम के देवताओं का आह्वान करने के प्रमाण भी मिलते हैं। यूनान में सफर के दौरान अच्छे मौसम के लिए आर्टिमिस देवी से प्रार्थना की जाती, तो मध्य पूर्व में बालशामिन देवता से। जापान में लोग रास्ते में भूत-पिशाचों से रक्षा के लिए याचीमाता हिमी और याचीमाता हिको नामक देवियों से आग्रह करते थे। मेसोपोटामिया के लोग मानते थे कि हासामेलिस देवता उन्हें अदृश्यता का चोगा ओढ़ाकर उनकी यात्रा सुरक्षित पूरी कराते हैं।
सड़कें बनीं, तो यात्राओं को दिशा मिली मगर जहां दो राहें आकर एक-दूसरे से मिल, आगे बढ़ जातीं, वहां भ्रम का जिन्ना उठ खड़ा होता। अब इस राह चलें या उस राह? दायें मुड़ें या बायें या फिर सीधे ही चलते जाएं? चौराहों और तिराहों ने आदि काल के यात्रियों को काफी आक्रांत किया। इतना, कि इनसे पार लगाने के लिए उन्हें किसी पृथक आराध्य की जरूरत महसूस हुई। रोम में तो तिराहों पर रक्षा करने के लिए एक पृथक देवी थीं, ट्रिविया। माना जाता था कि इनके तीन सिर हैं, जिनकी मदद से वे एक ही समय में तीन दिशाओं में देख सकती हैं। 'ट्रिविया" का शाब्दिक अर्थ ही 'तीन राहें" होता है। तिराहों पर ट्रिविया देवी की मूर्ति स्थापित की जाती थी, जहां यात्री उन्हें चढ़ावा चढ़ाते थे। यूनान में हेकटी देवी भी इसी तरह तिराहों की देवी के रूप में पूजी जाती थीं। उन्हें प्रसन्ना करने के लिए यात्री अपने भोजन का एक हिस्सा चढ़ावे के तौर पर तिराहे पर छोड़ जाते थे। अक्सर तिराहों पर एक खंभा खड़ा कर उस पर तीन दिशाओं में तीन मुखौटे लटका दिए जाते थे। ये देवी हेकटी के प्रतीक होते और इनके जरिये देवी का आह्वान किया जाता कि वे यात्रियों को सही राह चुनने में मदद करें।

जहां दो राहें आपस में मिलती हैं, उस स्थान को दो लोकों के मिलन-स्थल के रूप में भी देखा गया। ऐसी मान्यताएं रही हैं कि इस स्थान पर परालौकिक गतिविधियां होती हैं। इसलिए चौराहों पर तरह-तरह के टोने-टोटके करने के रिवाज अनेक संस्कृतियों में मिलते हैं। मध्य योरप के बोमरवॉल्ड पर्वतों में बसने वाली जनजातियों में यह विश्वास था कि 30 अप्रैल की रात को चौराहों पर चुड़ैलों की सभा होती है। सो इस रात जांबाज युवा चौराहों पर जाकर कोड़े फटकारते थे, जिससे ये चुड़ैलें भाग खड़ी हों। इसी प्रकार 23 जून को सेंट जॉन्स ईव के मौके पर चौराहों पर अलाव जलाकर दुष्टात्माओं को भगाने का यत्न किया जाता। एक समय इंग्लैंड में मृत्युदंड प्राप्त अपराधियों तथा आत्महत्या करने वाले लोगों को चौराहों पर दफनाया जाता था। इसके पीछे मान्यता यह थी कि इस तरह मरने वालों की आत्मा बेचैन रहती है और लोगों को परेशान करने के लिए आ सकती है। चौराहे पर दफन करने से आत्मा चकरा जाती है कि किस ओर जाए! इस प्रकार यह लोगों को परेशान करने के लिए बस्ती में नहीं आ पाती...। सन् 1823 में इसी प्रकार एक चौराहे पर हो रहे अंतिम संस्कार में जुटी भीड़ के कारण सम्राट जॉर्ज चतुर्थ का काफिला थम गया और वे विलंब से महल पहुंच सके। इस पर नाराज सम्राट ने ब्रिटिश संसद से आग्रह किया कि वह कानून बनाकर चौराहों पर दफन के इस रिवाज को समाप्त कराए। तब जाकर यह परंपरा बंद हुई। सच, इतिहास की राहें और राहों का इतिहास ऐसे ही अनेकानेक दिलचस्प किस्सों से भरा पड़ा है। 

Sunday, 4 December 2016

प्रकाश का प्राथमिक चमत्कार

हमारी पांच इंद्रियों में से केवल दृष्टि ही प्रकाश पर निर्भर है। इसके बावजूद यदि प्रकाश को बोध का, ज्ञान का प्रतीक कहा जाता है, तो स्पष्ट है कि हमारे पूर्वजों ने आरंभ से ही इसे अन्य संवेदों से ऊपर, एक खास दर्जा दिया है।
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प्रख्यात वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन के इस सिद्धांत को चुनौती दी जा रही है कि प्रकाश की गति हमेशा एक समान रहती है। बताया जा रहा है कि जल्द ही परीक्षण करके देखा जाएगा कि यह बात सही है या नहीं। चूंकि आधुनिक भौतिकशास्त्र बहुत हद तक प्रकाश की गति के स्थिर होने की मान्यता पर टिका हुआ है, इसलिए यदि यह मान्यता गलत साबित हो गई, तो विज्ञान के कई कथानकों का पुनर्लेखन करने की नौबत आ सकती है। खैर, परीक्षण का जो नतीजा आए सो आए, इस बहाने जरा इस बात पर भी गौर कर लिया जाए कि हमारे जीवन, हमारे अस्तित्व, हमारी संस्कृति और सभ्यता में प्रकाश का कैसा महत्व रहता आया है।
प्रकाश के प्रति मनुष्य मंे एक नैसर्गिक आकर्षण होता है। भोर की पहली किरण उसे उमंग से भर देती है। काले बादलों को चीरकर आती सूर्यकिरण उसे आशा का संदेश देती है। अंधकार उसे अनिश्चितता और भ्रम के भंवर में झोंकता है, वहीं प्रकाश उसे आश्वस्ती और ज्ञान का संबल देता है। सच तो यह है कि अंधकार के बीच से फूटते प्रकाश का नजारा मानव द्वारा अनुभूत सबसे प्राथमिक चमत्कार है। इस चमत्कार के पीछे किसी देवी शक्ति की भूमिका होने की बात मनुष्य के मन में आते देर नहीं लगी। ग्रीक आख्यानों के अनुसार, देवराज ज़्युस ने जब अपनी पुत्री आर्टिमिस से पूछा कि वह अपने तीसरे जन्मदिन पर क्या उपहार चाहेगी, तो आर्टिमिस ने जो छह उपहार मांगे, उनमें से एक था संसार में प्रकाश लाने की जिम्मेदारी। ज़्युस ने सहर्ष यह जिम्मेदारी आर्टिमिस को सौंप दी। इसलिए वन व शिकार की देवी के साथ-साथ उन्हें प्रकाश की देवी भी माना गया। दूसरी ओर चीन में माना जाता आया है कि जुन-दी नामक देवी सूर्य व चंद्रमा को आकाश में उठाए हुए हैं। इस प्रकार, रात हो या दिन, वे ही हम तक प्रकाश को पहुंचाती हैं। उनकी ही आभा ध्रुव तारे के रूप में भटके हुए राहगीरों को राह दिखाती है।
प्रकाश बोध का प्रतीक है। हमारी पांच इंद्रियों में से केवल दृष्टि ही प्रकाश पर निर्भर है। सुनने, सूंघने, स्वाद लेने या स्पर्श करने के लिए प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं होती। इसके बावजूद यदि प्रकाश को बोध का, ज्ञान का प्रतीक कहा जाता है, तो स्पष्ट है कि हमारे पूर्वजों ने आरंभ से ही इसे अन्य संवेदों से ऊपर, एक खास दर्जा दिया है। अनेक प्राचीन सभ्यताओं ने प्रकाश के प्रकट होने के साथ सृष्टि का आरंभ होना माना है। ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों का मानना है कि प्रकाश की किरण ही आत्मा को जागृत करती है। हमारे यहां भी आत्मा को प्रकाश माना गया है। शरीर जहां नश्वर है, वहीं आत्मा अखंड ज्योत है।

प्रकाश को पूजा भी गया है और आज भी अधिकांश धर्म-संस्कृतियों की पूजा पद्धतियों में प्रकाश की भूमिका अपरिहार्य है। कहीं दीयों के रूप में, तो कहीं मोमबत्तियों के रूप में यह पूजन विधियों में शामिल है। यहां तक कि प्रकाश का उत्सव भी विविध रूपों में अनेक स्थानों पर मनाया जाता है। भारत में दिवाली है, तो इसराइल में हनुका, जापान में ओबोन और थाईलैंड में यी पेंग व लोई क्रथोंग है। सच तो यह है कि मनुष्य ने प्रकाश के साथ अपने रिश्ते को ही एक उत्सव का रूप दे दिया है। जब तक मनुष्य है, यह संसार है, तब तक यह उत्सव जारी रहेगा। ...भौतिकशास्त्र के सिद्धांत भले ही आते-जाते रहें...!