Sunday, 8 July 2018

जब नाच उठा सूखे का भय और बह निकली नदी


बारिश कराने के लिए कोई नृत्य करता है, तो कोई देवताओं को दावत देता है। हर हाल में बरसात पाकर रहने के लिए हमारे पूर्वजों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है...
***

उत्तर अमेरिका के एक समुदाय में प्रचलित जनश्रुति के मुताबिक, एक बार ऐसा सूखा पड़ा कि कई महीनों तक बारिश ही नहीं हुई। मैदान सूख गए, नदी सूख गई, पशु मरने लगे। लोग आसमान ताकते रहते लेकिन कोई राहत नहीं मिलती। धीरे-धीरे पूरे इलाके में 'भय" का राज होने लगा। हर किसी पर यह हावी होने लगा। फैलते-फैलते चारों ओर भय फैल गया। बस, गांव के बाहरी छोर पर वह स्थान इससे बचा रह गया, जहां बच्चे खेलते थे और बुजुर्ग गपियाते थे। जब भय वहां जा पहुंचा, तो बच्चों ने उसे आश्चर्य से देखते हुए बुजुर्गों से पूछा कि यह कौन आया है? बुजुर्गों ने बताया कि यह भय है। जब बच्चों ने पूछा कि क्या यह हमारे साथ खेलने आया है, तो बुजुर्ग बोले, 'यह तो खेलना भूल चुका है।"
बच्चों ने सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए कि भय को फिर से खेलना आ जाए। तय हुआ कि वे नृत्य करेंगे, तो शायद भय फिर से खेलने लगे। बच्चों ने नृत्य करना शुरू किया। बुजुर्ग भी गीत गाते हुए उनका साथ देने लगे। जब इनके नृत्य व गीत की आवाज आसपास के गांवों तक पहुंची, तो लोग देखने आए कि क्या माजरा है। देखते ही देखते वे भी नृत्य में शामिल हो गए। इस प्रकार नृत्य का सिलसिला चलता रहा। आखिरकार भय भी खुद को रोक न सका और सबके साथ थिरकने लगा। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे और होंठों पर हंसी लौट आई। उसके साथ-साथ नृत्य करने वाले लोगों के भी आंसू बहने लगे। तभी हवा वहां आई और सारा नजारा देखकर न सिर्फ दूर-दूर से पशु-पक्षियों को बुला लाई, बल्कि खुद भी नृत्य में शामिल हो गई। सभी नाचे जा रहे थे और आंसू बहाए जा रहे थे। इन सबके आंसू धरती पर पड़ते गए और देखते ही देखते सूखी नदी फिर पानी से भर गई।
यह कहानी उत्तर अमेरिका के आदिवासी समुदायों में प्रचलित रही उस परंपरा से जोड़ी जाती है, जिसमें वर्षा का आह्वान करने के लिए विशेष नृत्य किया जाता है। दरअसल, जीवन के लिए वर्षा का महत्व तो मनुष्य काफी पहले ही जान चुका था लेकिन लंबे समय तक वह इससे अवगत नहीं था कि मौसम चक्र कैसे चलता है और बारिश कैसे होती है। सो जीवनदायी बरसात जब रूठी हुई लगे तो उसे मनाने के भांति-भांति के टोटके तलाशे गए। ऐसे ढेरों टोटके हमारे देश में अब भी अपनाए जाते देखे जा सकते हैं। अन्य देशों-संस्कृतियों में भी बारिश कराने के लिए विभिन्ना प्रकार के उपाय किए जाते रहे हैं। दक्षिण अमेरिका की माया सभ्यता में वर्षा के देवता चाक को प्रसन्ना करने के लिए आलीशान दावत का आयोजन किया जाता था। वहीं कई स्थानों पर इसके लिए बलि देने का चलन भी रहा है। कई देशों में ऐसे जादूगर/ ओझा होते थे, जो वर्षा करा सकने का दावा करते थे। समाज में इनका विशेष स्थान हुआ करता था। कुछ अफ्रीकी देशों में तो बारिश कराना खानदानी पेशा भी हुआ करता था!
थाइलैंड में एक अजीबोगरीब परंपरा रही है, जिस पर पशु क्रूरता के खिलाफ लड़ने वालों को आपत्ति भी हो सकती है। वहां जब लंबे समय तक बारिश नहीं होती है, तो एक बिल्ली को टोकरी में रखकर गांव भर में उसका जुलूस निकाला जाता है। जिन-जिन घरों के सामने से जुलूस निकलता है, वहां से बिल्ली पर पानी फेंका जाता है। लोग मानते हैं कि पानी पड़ने से चिढ़कर/ घबराकर बिल्ली जो 'म्याऊं-म्याऊं" करती है, उससे बारिश होने लगती है!

Sunday, 1 July 2018

जिसके बिना अधूरा है देवताओं का अस्तित्व


सोने को सदा चुनौती देती आई चांदी की कीमत उसकी प्रतीकात्मकता व धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व में निहित है। इसके बिना तो देवी-देवताओं का अस्तित्व भी अधूरा माना गया है।
***

अफगानिस्तान की एक बड़ी प्यारी-सी लोककथा है। एक गरीब किसान जी-तोड़ मेहनत करने के बाद भी तंगहाली से मुक्त नहीं हो पा रहा था। वह कल्पना किया करता था कि काश किसी दिन उसका घर धन-दौलत से भर जाए! एक दिन वह खेत में काम कर रहा था कि अचानक कंटीली झाड़ियों में उसके कपड़े फंसकर फट गए। उसने यह सोचकर झाड़ी उखाड़ना शुरू की कि कहीं दोबारा इसकी वजह से किसी के कपड़े न फट जाएं। जब झाड़ियों की जड़ों के साथ कुछ मिट्टी भी उखड़ आई, तो उसने देखा कि नीचे एक बड़ा-सा मर्तबान दफन है। मर्तबान निकालकर व खोलकर देखा, तो वह दंग रह गया। उसमें चांदी के सिक्के भरे पड़े थे। उसने सोचा, 'मैंने धन-दौलत चाही तो थी लेकिन अपने घर में। मैं कैसे मान लूं कि यह दौलत मेरे ही लिए है!" यह सोचकर वह मर्तबान वापस वहीं गाड़कर घर चला आया। बीवी को बताया, तो वह आग-बबूला हो गई कि कैसा अहमक है, हाथ लगी दौलत को घर लाने से इनकार कर रहा है! रात को वह पड़ोसी के पास गई और उसे खेत में दफन खजाने के बारे में बताते हुए कहा कि मेरा शौहर तो उसे ला नहीं रहा, तुम जाकर ले आओ और आधा खजाना मेरे साथ बांट लो।
पड़ोसी तुरंत खेत की ओर लपका। उसे वह मर्तबान मिल भी गया मगर जैसे ही उसने उसे खोलकर देखा, तो पाया कि वह जहरीले सांपों से भरा है। उसने तुरंत मर्तबान का ढक्कन लगा दिया और सोचने लगा कि पड़ोसन मेरी जान की दुश्मन है, तभी मुझे इस लालच में फंसाया। उसे सबक सिखाने के इरादे से वह मर्तबान उठा लाया और किसान के घर की छत पर चढ़कर उसकी चिमनी में मर्तबान खाली कर दिया। वह यह सोचकर संतुष्ट था कि जहरीले सांप किसान पति-पत्नी का काम तमाम कर देंगे। मगर अगली सुबह जब किसान की नींद खुली, तो उसने देखा कि उसका घर चांदी के सिक्कों से भर गया है- ठीक वैसे ही, जैसे कि उसने इच्छा की थी...
गौर करें, एक भोले, गरीब किसान को मालामाल होते दिखाने के लिए यहां सोना नहीं, चांदी को माध्यम बताया गया है। धातु जगत में धन-दौलत की चरम सीमा का प्रतीक होना सोने का एकाधिकार नहीं, इसमें चांदी की भी भागीदारी है। वैसे सोने के साम्राज्य के आगे चांदी की सल्तनत भी हमेशा पूरे ठस्से से खड़ी रहती ही आई है। प्राचीन मिस्र में तो कहा गया था कि देवी-देवताओं के शरीर का मांस सोने का और अस्थियां चांदी की होती हैं। यानी देवी-देवताओं के अस्तित्व के लिए भी सोने के साथ-साथ चांदी का होना अनिवार्य है।
अपने रंग-रूप के कारण अनेक स्थानों पर चांदी का संबंध चंद्रमा से जोड़ा गया। साथ ही, यह कई चीजों की प्रतीक भी रही है। इसका उपयोग आभूषण बनाने व सिक्के ढालने में तो होता ही रहा है मगर इसका वास्तविक मूल्य इससे कहीं बढ़कर होता आया है। वजह है, इससे जुड़ी प्रतीकात्मकता और धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व। अनेक स्थानों पर इसे प्रेम, सत्यनिष्ठा, विश्वास व बुद्धिमत्ता के प्रतीक के तौर पर किसी को भेंट करने की परंपरा रही है। लिथुएनिया में विवाह में आने वाले मेहमान चांदी के सिक्के लेकर आते हैं। जब नृत्य शुरू होता है, तो सभी मेहमान अपने-अपने सिक्के नृत्य स्थल पर बिखेर देते हैं। बाद में इन सिक्कों को एक पात्र में इकट्ठा कर दिया जाता है और इनमें एक खास सिक्का मिला दिया जाता है, जिस पर वर-वधु के नामों के पहले अक्षर दर्ज होते हैं। अब मेहमानों से कहा जाता है कि वे बारी-बारी से पात्र में से एक सिक्का निकालें। जिस मेहमान के हाथ वर-वधु के नाम वाला विशेष सिक्का आता है, उसे वर या वधु के साथ नृत्य करने का मौका मिलता है।

Sunday, 10 June 2018

आसमान में तनी सतरंगी कल्पनाएं


देवताओं का अग्नि-सेतु या प्यास बुझाने धरती पर उतरता सर्प? सतरंगी लबादे में दौड़ लगाती देवी या रोगों का वाहक? इंद्रधनुष को इंसान ने कई रंगों में देखा है।
***

बहुत पहले, जब संसार नया-नया ही बना था, एक दिन खुराफाती देवता नैनाबोजो ने देखा कि उनके निवास के आसपास सारे के सारे फूल सफेद थे। यह बात उन्हें रास नहीं आई। उन्होंने तय किया कि वे सारे फूलों में रंग भर देंगे। बस फिर क्या था, नैनाबोजो ने अपने रंग व कूची ली और चल पड़े फूलों को रंगने। उनका यह उपक्रम चल ही रहा था कि दो नन्हे पंछी खेलते-फुदकते वहां आ पहुंचे। पहले एक पंछी दूसरे का पीछा करते हुए जमीन की ओर गोता लगाता और फिर आकाश की ओर उड़ लेता, फिर दूसरा उस पहले पंछी का पीछा करने लगता। इधर नैनाबोजो फूलों को रंग रहे थे, उधर पंछियों का खेल जारी था। जब-जब पंछी गोता लगाकर नीचे आते, कभी उनका पंख तो कभी पैर नैनाबोजो के रंगों में डुबकी लगा जाता। कुछ ही देर में दोनों पंछी लाल, नारंगी, पीले, हरे, नीले रंगों में रंग गए। आखिर उनके व्यवधान से तंग आकर नैनाबोजो ने उन्हें भगा दिया। तब दोनों पंछी पास ही स्थित झरने की ओर उड़ गए। उन्होंने झरने के पानी से बनी धुंध के आर-पार अपना खेल जारी रखा। उनके तन पर लगे रंग अब धुंध की इस चादर कर चित्रकारी उकेरने लगे। कुछ देर बाद जब नैनाबोजो की निगाह झरने की ओर गई, तो उन्होंने वहां सात रंगों की अनूठी कलाकृति तनी हुई देखी। यह था दुनिया का पहला इंद्रधनुष।
एक उत्तर अमेरिकी आदिवासी समुदाय की यह लोकगाथा इंद्रधनुष की उत्पत्ति का बड़ा ही सुंदर चित्र खींचती है। बारिश के बाद प्रकृति का सतरंगी उत्सव मनाता इंद्रधनुष आदिकाल से लोगों में आश्चर्य, कौतुहल व आनंद का भाव उत्पन्ना करता आया है। दिलचस्प बात यह है कि विभिन्ना संस्कृतियों में इंद्रधनुष को लेकर धारणाएं भी विविधरंगी रहती आई हैं। प्रशांत महासागर स्थित पॉलीनेशिया में माना जाता है कि इंद्रधनुष एक दिव्य सीढ़ी है, जिसे चढ़कर शूरवीर स्वर्ग को जाते हैं। वहीं जापान में माना जाता है कि हमारे पूर्वज जब स्वर्ग से उतरकर धरती पर आते है, तो इंद्रधनुष पर से चलकर ही आते हैं। उत्तरी योरप में इसे धरती व देवलोक को जोड़ने वाले अग्नि-सेतु के रूप में देखा जाता है, जिस पर से गुजरने की अनुमति केवल देवताओं व शहीदों को है।
ग्रीक आख्यानों में तो इंद्रधनुष को बड़े ही अनोखे अंदाज में देखा गया है। इसके अनुसार पछुआ हवा के देवता जेफिरस की पत्नी आइरिस देवताओं व मनुष्यों के बीच संदेशवाहक की भूमिका निभाती हैं। जब वे अपने सतरंगी लबादे में आसमान से धरती और यहां से वापस आसमान की ओर दौड़ लगाती हैं, तो हमें इंद्रधनुष के रूप में नजर आती हैं।
अफ्रीका की जुलु जनजाति में इंद्रधनुष को जरा अलग तरह से देखा जाता है। ये लोग मानते हैं कि इंद्रधनुष आसमान में रहने वाला एक विशाल सर्प है, जो धरती के जलाशयों से पानी पीने आता है। मगर यह निरापद नहीं है। यदि कोई उस जलाशय में स्नान कर रहा हो, तो यह उसे तत्काल निगल लेता है! ऑस्ट्रेलिया की कई जनजातियां भी इंद्रधनुष को एक विशाल सर्प के रूप में देखती हैं, जिसने संसार को रचा है। म्यांमार के एक समुदाय में यह विश्वास रहा है कि इंद्रधनुष दानवी शक्ति होती है, जो मनुष्य की अकस्मात, हिंसक मृत्यु के लिए जिम्मेदार है। यह मानव आत्माओं का भक्षण करता है और फिर अपनी प्यास बुझाने धरती पर उतरता है। पेरू में तो इंद्रधनुष को कई तरह के रोगों, खास तौर पर त्वचा रोगों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। वहां बच्चों को सिखाया जाता है कि इंद्रधनुष दिखते ही वे अपना मुंह बंद कर दें ताकि कहीं बीमारी के जीवाणु उनके शरीर में प्रवेश न कर जाएं!
बुल्गारिया में कहा जाता है कि यदि कोई पुरुष इंद्रधुनष के नीचे से गुजरे, तो वह स्त्री की तरह सोचने लगता है और यदि कोई स्त्री इसके नीचे से गुजरे, तो वह पुरुष की तरह सोचने लगती है! उधर जर्मनी में मध्ययुग के दौरान यह मान्यता व्याप्त थी कि प्रलय आने से पहले चालीस साल तक किसी इंद्रधनुष के दर्शन नहीं होंगे। इसलिए, जब भी आसमान में इंद्रधनुष नजर आता, लोग यह सोचकर राहत की सांस लेते कि अभी कम से कम चालीस वर्ष तक तो प्रलय नहीं आने वाला...

Sunday, 3 June 2018

बदसूरत पंखों पर सवार आत्माएं!


चमगादड़ों को प्रकृति ने जैसा बनाया, उसके कारण उन्हें काफी बदनामी झेलनी पड़ी है। कभी इनका संबंध मृत्यु से जोड़ा गया, तो कभी शैतानी ताकतों से...
***

चमगादड़ इन दिनों चर्चा में हैं। घातक निपाह वायरस फैलाने के आरोप में ये कटघरे में हैं। वैसे इन बेचारों का जब से मनुष्य से पाला पड़ा है, ये ज्यादातर कटघरे में ही रहे हैं। अपने डील-डौल या कहें चेहरे-मोहरे के कारण ये अपने इर्द-गिर्द एक रहस्यात्मकता का आवरण लिए होते हैं, जो मनुष्य को असहज व भयभीत करता है। यह भय अतार्किकता की हद तक जाकर नकारात्मक कल्पनाएं गढ़ लेता है और चल पड़ते हैं भांति-भांति के मिथक। यह कहना गलत नहीं होगा कि शायद ही कोई प्राणी इस कदर मुफ्त बदनाम हुआ हो, जिस कदर चमगादड़ हुआ है। निपाह फैलाने में इसकी भूमिका वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध हुई है मगर अनेक कपोल-कल्पित आरोपों का बोझ भी यह ढोता रहा है।
चमगादड़ रात के अंधेरे में बाहर निकलता है। दिखने में आधा पशु, आधा पक्षी लगता है। यह मानव मस्तिष्क में संदेहों के बीज बोने व कल्पनाओं को खाद-पानी देने के लिए पर्याप्त है। दक्षिण अमेरिकी माया सभ्यता में चमगादड़ का संबंध मृत्यु व नरक से जोड़ा गया। मायन लोग कमाजोट्ज नामक देवता की पूजा करते थे, जिसका शरीर इंसान का और सिर व पंख चमगादड़ के थे। इंग्लैंड व स्कॉटलैंड में एक जमाने में लोग मानते थे कि चमगादड़ चुड़ैलों व शैतान के बीच संदेशवाहक का काम करते हैं। प्राचीन बेबीलोनिया में माना जाता था कि चमगादड़ दिवंगत आत्माओं के भौतिक रूप हैं। यानी व्यक्ति के मरने पर उसकी आत्मा चमगादड़ बनकर रहने लगती है! अफ्रीकी देश आइवरी कोस्ट में भी कुछ ऐसी ही मान्यता रही है। वहीं मैडागास्कर में चमगादड़ों को अपराधियों, काला जादू करने वालों व ऐसे लोगों की आत्मा माना जाता है, जिनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाया। ग्रीस में इन्हें पाताल लोक से संबंध रखने वाले शैतानी जीव माना जाता था।
चमगादड़ों की तथाकथित तिलस्मी ताकतों का जादू इंसानी दिमाग पर इस कदर छाया कि उसने कुछ अजीबो-गरीब और वीभत्स टोटके भी ईजाद कर डाले। ऑस्ट्रिया में एक समय माना जाता था कि यदि कोई चमगादड़ की बायीं आंख धारण कर ले, तो वह अदृश्य हो सकता है! वहीं पड़ोसी जर्मनी में लोग मानते थे कि यदि चमगादड़ का दिल लाल डोरे से बांह पर बांध दिया जाए, तो आप ताश के खेल में कभी हार नहीं सकते। पश्चिमी देशों में ही यह भी कहा जाता था कि चुड़ैलें चमगादड़ के खून से बने पदार्थ की मदद से हवा में उड़ने में सक्षम होती हैं।
मेक्सिको में चली आई किंवदंति के मुताबिक, एक समय चमगादड़ को पक्षियों के सुंदर पंखों से ईर्ष्या हो आई थी। इसके दंडस्वरूप उसे बदसूरत होने व रात में विचरण करने का श्राप मिला। एक अन्य किंवदंति के अनुसार, चमगादड़ स्वयं सुंदर पंखों वाला पंछी हुआ करता था। मगर जब उसे अपनी सुंदरता पर अत्यधिक घमंड हो गया, तो उसके रंग-बिरंगे, सुंदर पंख झड़ गए और शर्मिंदगी के मारे वह दिन में छुपने लगा और रात को ही बाहर निकलने लगा। नाइजीरिया में चमगादड़ की निशाचरी के पीछे एक अलग कारण बताया जाता है। यहां की लोककथा के अनुसार, चमगादड़ की चूहे से दोस्ती हुआ करती थी मगर वह चूहे से ईर्ष्या भी करता था। एक बार उसने बातों-बातों में भोले चूहे के गले यह बात उतार दी कि यदि उबलते पानी में स्नान किया जाए, तो उससे बना सूप बड़ा ही स्वादिष्ट होता है। चूहे ने घर जाकर यह नुस्खा आजमाया और उबलते पानी में कूदकर मर गया। चमगादड़ की कारस्तानी से नाराज राजा ने उसे गिरफ्तार करने के लिए सैनिक भेजे, तो चमगादड़ उड़नछू हो या। तभी से वह दिन में गुफाओं में छुपता है और केवल रात में बाहर निकलता है।
हर ओर से बदनामी झेल रहे चमगादड़ को यदि कहीं से राहत मिल सकती है, तो वह है चीन। यहां इसे सौभाग्य के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है और इसका संबंध खुशहाली व दीर्घायु से जोड़ा जाता है...!

Sunday, 20 May 2018

जूतों में शुभ, अशुभ... और मिठाई!


धूल, मिट्टी व गंदगी के संपर्क में आने के कारण जूते अशुद्ध व अपवित्र माने जाते हैं मगर ये ही जूते कहीं-कहीं अच्छे शगुन के भी काम आते हैं...!
***

अंतर-सांस्कृतिक मेल-मिलाप में कभी-कभी कोई बहुत बड़ी चूक भी हो जाती है। पिछले दिनों इसराइल के प्रधानमंत्री ने अपने देश आए जापान के प्रधानमंत्री व उनकी पत्नी के सम्मान में भोज दिया, तो ऐसी ही चूक ने रंग में भंग डाल दिया। भोजन तो बढ़िया रहा लेकिन अंत में जब मीठा परोसा गया, तो साधारण प्लेट में नहीं, दो जोड़ी जूतों के आकार के पात्रों में रखकर परोसा गया! प्रधानमंत्री महोदय के सेलिब्रिटी शेफ को लगा कि यह अनोखा आइडिया रहेगा मगर जापानी अतिथियों को यह सरासर वाहियात और अपमानजनक लगा। पूर्व के कई देशों-संस्कृतियों की ही तरह जापान में भी जूतों को लेकर बहुत सख्त निषेध हैं। जापानी किसी हालत में घर के भीतर जूते नहीं लाते। और यहां तो जूतों में रखकर खाद्य पदार्थ परोसा गया! अनजाने में ही सही, इसराइली प्रधानमंत्री महोदय अपने मेहमानों का अपमान कर बैठे।
जूतों को अशुद्ध मानते हुए इन्हें घर के बाहर छोड़कर प्रवेश करने का रिवाज भारत, जापान के अलावा चीन, कोरिया, ताईवान, वियतनाम तथा कुछ मध्य-पूर्वी देशों में भी है। दिलचस्प बात यह है कि इसराइल में भी जूतों को लेकर कुछ स्पष्ट निषेधों का पालन किया जाता है। मसलन, सिनेगॉग (धर्मस्थल) में श्रद्धालुओं को आशीर्वचन देने के लिए प्रवेश करने से पूर्व पुरोहित अपने जूते उतार देते हैं। इसके अलावा, घर में किसी की मृत्यु होने पर सात दिन की शोक अवधि में परिवार के सदस्यों के लिए चमड़े के जूते पहनना वर्जित होता है। प्राचीन काल में इसराइली लोग किसी शवयात्रा में नंगे पैर ही जाया करते थे।
जूते भले ही हमारे पैरों की रक्षा करने के काम आते हैं मगर अपना फर्ज निभाते हुए ये दुनिया भर की धूल-मिट्टी व गंदगी के संपर्क में आते हैं। यही कारण है कि इन्हें व्यापक तौर पर अशुद्ध, अपवित्र व घृणास्पद मानने का चलन है। इसी के चलते किसी को जूते से मारना या उस पर जूता फेंकना उसका घोर अपमान माना जाता है। मगर इंग्लैंड में, इसके ठीक विपरीत, अच्छे शगुन के लिए जूता फेंका जाता है! वहां पुरातन मान्यता रही है कि जब कोई लंबे सफर पर निकले, तो घर वाले पीछे से उसकी ओर जूता फेंकते हैं। इससे उसकी यात्रा सफल होती है, ऐसा विश्वास है। सफर पर निकल रहे समुद्री जहाज की ओर भी लोग जूता फेंका करते थे, इस कामना के साथ कि जहाज अपना सफर कुशलतापूर्वक पूरा कर लौट आए।
कुछ पश्चिमी देशों में शादी करके लौट रहे दूल्हा-दुल्हन के वाहन के पीछे एक जोड़ी जूते बांधने की परंपरा रही है। कहा जाता है कि इससे उनका दांपत्य जीवन खुशहाल रहता है और घर में जल्द किलकारियां गूंजने की संभावना बढ़ती है। घर में कोई बीमार हो और रात को बाहर कोई कुत्ता रो रहा हो, तो इसे अपशकुन माना जाता है। मगर दिलचस्प बात यह है कि इसका तोड़ भी उपलब्ध करा दिया गया है। ऐसा कहा जाता है कि यदि आप बीमार व्यक्ति के जूते को उल्टा कर दो, तो कुत्ते के रोने से होने वाला अपशकुन स्वत: निरस्त हो जाता है! हालांकि हमारे यहां कहा जाता है कि जूता-चप्पल उल्टा रखने से किसी के साथ झगड़ा होने की आशंका रहती है...
हमारी बात शुरू हुई थी टेबल पर जूतों में रखकर खाना परोसने की घटना से। तो यह भी जान लें कि पश्चिमी देशों में टेबल पर जूते रखने को लेकर भी विचित्र मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि अगर किसी पुरुष ने टेबल पर जूते रखे, तो रात होने से पहले उसका किसी से झगड़ा हो जाएगा। और यदि किसी महिला ने टेबल पर अपने जूते रख दिए, तो परिवार की कोई स्त्री गर्भवती हो जाएगी...!

Sunday, 13 May 2018

ककड़ी से रोग दूर और पिशाच प्रसन्न्!


शीतलता भरी ककड़ी किस्से-कहानियों व अनूठे विश्वासों का भी भंडार है। फिर बात चाहे रोगों से मुक्ति पाने की हो या नन्हे पिशाचों को खुश करने की...
***

गर्मियों के दिन हों और खीरा-ककड़ी का लुत्फ न लिया जाए, यह संभव नहीं। मगर क्या आप जानते हैं कि ककड़ी शीतलता व तरावट देने के साथ-साथ रोचक आस्थाओं व दंतकथाओं के रस से भी भरपूर है? मसलन, इसके औषधीय गुणों से तो सभी अवगत हैं मगर जापान में इसकी मदद से तमाम व्याधियों से छुटकारा पाने का विशेष उपक्रम किया जाता है। कुछ खास मंदिरों में साल के एक तयशुदा दिन लोग ककड़ियां लेकर आते हैं। हर व्यक्ति अपनी लाई ककड़ी पर कागज चिपकाकर अपना नाम, उम्र व व्याधि लिख देता है। फिर मंदिर में विशेष मंत्रोच्चार के बीच इस ककड़ी को शरीर के प्रभावित भाग पर रगड़ा जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से शरीर की व्याधि ककड़ी में चली जाती है। बाद में इस ककड़ी को जमीन में गाड़ दिया जाता है।
जापान की बात चली है, तो यह भी जान लें कि वहां 'कप्पा" नामक नन्हे, शरारती पिशाचों का अस्तित्व माना जाता है। ये दस साल के बच्चे के बराबर होते हैं, पानी में रहते हैं, इनका रंग हरा-पीला होता है, त्वचा कछुए के खोल के समान होती है और सिर पर कटोरे नुमा गड्ढा होता है, जिसमें पानी भरा रहता है। इनकी तिलस्मी शक्तियां तभी तक इनका साथ देती हैं, जब कि इनके सिर पर यह पानी सवार रहे। इसलिए सलाह दी जाती है कि यदि कप्पा से सामना हो जाए, तो उसे किसी भी बहाने झुकने पर मजबूर किया जाए, जिससे कि उसके सिर के कटोरे में भरा पानी ढुल जाए और उसकी शक्तियां जाती रहें। मगर कप्पा को सिर झुकाने के लिए मजबूर करने में काफी दिमागी मशक्कत करनी पड़ सकती है। तो एक आसान रास्ता भी सुझाया गया है। वह यह कि कप्पा महाशय को ककड़ी भेंट की जाए। उन्हें ककड़ी बेहद पसंद है और इसे पाने पर वे प्रसन्न् होे जाते हैं व आपका नुकसान नहीं करते।
इंडोनेशिया में स्वर्णिम ककड़ी की कहानी कही जाती है। इसमें एक निसंतान दंपति को एक राक्षस से बेटी का वरदान मिलता है मगर एक शर्त पर कि जब बेटी 17 साल की हो जाएगी, तो वह उसे अपने साथ ले जाएगा। पति-पत्नी राजी हो जाते हैं। राक्षस उन्हें ककड़ी के बीज देकर घर के पीछे बोने को कहता है। पति-पत्नी ऐसा ही करते हैं। कुछ समय बाद वहां ककड़ी का पौधा उग आता है। एक दिन उसमें एक सुनहरे रंग की ककड़ी लगती है। वह सामान्य ककड़ियों से कहीं बड़ी व भारी होती है। उसके पक जाने पर पति-पत्नी उसे तोड़ लाते हैं और सावधानी से काटते हैं। ककड़ी के भीतर से बच्ची प्राप्त होती है। दंपति की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। वे उसका नाम तिमुन मास यानी सुनहरी ककड़ी रखते हैं और उस पर अपनी ममता लुटाते हैं।
देखते ही देखते 17 साल बीत जाते हैं। राक्षस लड़की को ले जाने आ धमकता है। मगर माता-पिता उसे अपने से दूर नहीं करना चाहते। पिता उसे एक थैला देकर पिछले दरवाजे से भाग निकलने को कहते हैं। राक्षस समझ जाता है कि उसके साथ धोखा हो रहा है। वह लड़की के पीछे भागता है। लड़की थैले में से नमक निकालकर पीछे फेंकती है, तो उससे समंदर बन जाता है। मगर राक्षस समंदर को पार कर फिर उसके पीछे हो लेता है। तब वह थैले में से मिर्ची निकालकर फेंकती है। मिर्ची ऊंचे, कंटीले पेड़ों वाले जंगल का रूप ले लेती है। राक्षस उसे भी पार कर जाता है। अब लड़की थैले में से ककड़ी के बीज निकालकर फेंकती है। ये ककड़ी के खेत का रूप ले लेते हैं। थका-हारा राक्षस ककड़ी खाने बैठ जाता है व फिर सो जाता है। मगर कुछ देर बाद वह फिर दौड़ते हुए लड़की के पीछे हो लेता है। अब लड़की थैले में से झींगे की चटनी निकालकर फेंकती है। यह दलदल का रूप ले लेता है और राक्षस उसमें डूब मरता है। लड़की माता-पिता के पास लौट आती है और सब खुशी-खुशी रहने लगते हैं।

Sunday, 15 April 2018

संसार की सबसे बेशकीमती चीज


गेहूं के अपमान ने एक फलते-फूलते नगर को तबाह कर दिया। और जब ईश्वर की एक सेविका जुल्म से बचने के लिए भागी, तो यही गेहूं उसे बचाने को आगे आया...
***

कहते हैं कि नीदरलैंड में कभी स्टेवोरेन नामक बड़ा तटीय नगर हुआ करता था। यहां के बंदरगाह पर विशाल जहाज दूर देशों से आकर लंगर डालते थे और इस व्यापार की बदौलत शहर खूब फल-फूल रहा था। यहां के रईस व्यापारियों में एक महिला शामिल थी, जो अपने दिवंगत पति का व्यापार बढ़ाते हुए अकूत धन-दौलत की मालकिन बन चुकी थी। साथ ही उसे लालच व अहंकार का रोग भी लग चुका था। एक दिन एक जहाज के कप्तान ने उसे सम्मान स्वरूप माणिक की अंगूठी भेंट की, तो महिला ने फरमाइश की कि काश तुम मेरे लिए दुनिया की सबसे बेशकीमती चीज ले आओ! कप्तान ने पूछा कि वह क्या है, तो वह बोल पड़ी, 'मैं नहीं जानती। तुम उसे ढूंढ लाओ, मैं तुम्हें उसकी मुंहमांगी कीमत दूंगी।"
इस पर कप्तान अपना जहाज लेकर चल दिया। कई महीनों बाद जब वह लौटा तो दौलत के नशे में चूर महिला ही नहीं, पूरे शहर को यह जानने की उत्सुकता थी कि वह कौन-सी चीज लेकर आया है, जो दुनिया की सबसे बेशकीमती चीज है। कप्तान ने बताया कि उसने कई-कई देशों की यात्रा की, बहुत तलाशा और अंत में उसे सबसे बेशकीमती चीज मिल ही गई। वह चीज और कुछ नहीं, गेहूं था! पूरा जहाज गेहूं से भरा हुआ था। यह देख महिला का पारा चढ़ गया। कप्तान ने उसे समझाने की कोशिश की कि गेहूं से मिलने वाली रोटी की बदौलत ही हम सब जिंदा हैं, यह न होता तो दुनिया की सारी धन-दौलत बेकार थी! मगर महिला मानने को तैयार न थी। उसने कप्तान को खूब बुरा-भला कहा और आदेश दिया कि सारा गेहूं समंदर में फेंक दिया जाए। तब कप्तान ने कहा, 'यह अन्ना है, इसे फेंक कैसे दें? हो सकता है कि किसी दिन आपको ही इसकी जरूरत पड़ जाए!" इस पर महिला ने अपनी माणिक की अंगूठी समंदर में फेंकते हुए कहा, 'मेरे इस गेहूं का मोहताज होने की उतनी ही संभावना है, जितनी इस बात की कि यह अंगूठी मेरे पास वापस आ जाएगी।"
गेहूं समंदर में उड़ेल दिया गया। अगले ही दिन एक दावत में उस महिला को जो मछली परोसी गई, उसे काटने पर उसने मछली के पेट में अपनी माणिक की अंगूठी पाई! वह सकते में आ गई। उधर समुद्र में फेंका गया गेहूं अंकुरित होने लगा और पौधे बढ़ने लगे। इनके बीच रेत के कण फंसकर जमा होने लगे और देखते ही देखते समंदर में रेत की पट्टी उभर आई। इसके कारण जहाजों का बंदरगाह तक आना असंभव हो गया। व्यापार ठप पड़ने लगा। शहर के बाकी व्यापारियों के साथ ही वह नकचढ़ी महिला भी पाई-पाई को मोहताज हो गई। अन्ना के अपमान की भारी कीमत उसके साथ-साथ पूरे शहर को चुकानी पड़ी।
यह डच लोककथा अन्ना की अहमियत को बड़े नसीहत भरे अंदाज में रेखांकित करती है। साथ ही, दुनिया भर में प्राथमिक आहार के रूप में गेहूं की अहमियत भी दर्शाती है। गेहूं के इर्द-गिर्द इतनी परंपराएं, इतने विश्वास व इतने किस्से घूमते हैं कि उन्हें एक जगह समेटना संभव नहीं है। पश्चिम में संत बारबरा के साथ गेहूं का किस्सा जुड़ा है। बताया जाता है कि फ्रांस के एक व्यापारी की सुंदर बेटी बारबरा के कई चाहने वाले थे। व्यापारी चाहता था कि बारबरा किसी धनवान से ब्याह रचा ले लेकिन बारबरा धार्मिक वृत्ति की थी और अपना जीवन ईश्वर को समर्पित करने का मन बना चुकी थी। इस पर पिता ने उसे घर में कैद कर लिया व उस पर तरह-तरह के जुल्म किए जाने लगे। एक बार वह किसी तरह भाग निकली। वह एक खेत से होकर गुजरी, जहां हाल ही में गेहूं बोया गया था। उसके गुजरते ही गेहूं के पौधे तत्काल बड़े हो गए ताकि खेत में उसके पैरों के निशान न दिखें और पीछा करने वाले उस तक न पहुंच सकें। अंतत: बारबरा का सर कलम किया गया व बाद में उन्हें संत का दर्जा भी मिला। आज कई स्थानों पर उनकी याद में क्रिसमस से इक्कीस दिन पहले लोग अपने घरों में तीन बर्तनों में गेहूं बोते हैं। उनका मानना है कि यदि क्रिसमस तक इस गेहूं से जवारे अच्छी तरह निकल आएं, तो आने वाला साल धन-धान्य से भरपूर रहेगा। वे कहते हैं, 'अगर गेहूं चंगा रहा, तो सब कुछ चंगा रहेगा।"