Sunday, 18 June 2017

क्यों गरजता-चमकता है आसमान?

बादलों के गरजने व बिजली के चमकने को हम इस मौसम में सामान्य रूप में लेते हैं मगर जनश्रुतियों में इनके पीछे कुछ बड़े असामान्य-से कारण बताए गए हैं...
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बारिश का मौसम यानी बादलों के गरजने और आसमान में बिजली के कड़कने का मौसम। काले बादलों से आच्छादित आसमान में चमकती बिजली और कंपकपा देने वाली गर्जना प्रकृति के किसी महानाट्य को जीवंत कर देती है। तर्क और तथ्य के धरातल पर खड़े विज्ञान ने इस महानाट्य के पीछे जो कारण गिनाए सो गिनाए, मगर मानव की कल्पनाशक्ति ने भी इसमें अपने रंग भरे हैं।
नाइजीरिया की एक लोक कथा के अनुसार, बहुत पहले गर्जना एक भेड़ थी और विद्युत उसका पुत्र मेढ़ा था। दोनों धरती पर ही रहते थे लेकिन राजा के आदेशानुसार उन्हें शहर के बाहरी इलाके में रहना पड़ता था। इसका कारण था मेढ़े का गर्म स्वभाव। जब भी उसे गुस्सा आता, वह लोगों के घर जला डालता, पेड़ नष्ट कर देता और यहां तक कि कभी-कभी तो मनुष्यों को भी मार देता। उसकी मां भेड़ उसे रोकने का भरसक प्रयास करती। वह अपनी रौबदार आवाज में उससे शांत होने और वापस आने को कहती। आखिरकार जब मेढ़े की बदमिजाजी से लोग आजिज आ गए, तो उन्होंने राजा से शिकायत की और राजा ने मां-बेटे दोनों को जंगल में जाकर रहने का फरमान सुनाया। मगर मेढ़ा कहां सुधरने वाला था! गुस्सा आने पर वह यहां भी नुकसान करता फिरता। उसके कारण कई बार जंगल में आग लग जाती। तब राजा ने उन दोनों को धरती छोड़ आसमान में रहने का हुक्म सुनाया। आकाश में जा बसने के बाद भी विद्युत का मिजाज नहीं बदला। वह अब भी इधर-उधर आग गिराता रहता है और उसकी मां उसे रोकने के लिए गरजती है...
अमेरिकी आदिवासी समुदाय में बादलों की गर्जना का एक अन्य मजेदार कारण बताया गया है। ये लोग मानते हैं कि जंगलों में दूर कहीं गर्जन का गांव है। यहां रहने वाले तिलस्मी लोग ही आसमानी गर्जना कराते हैं। समय-समय पर इनका मुखिया इन्हें आदेश देता है कि इन्हें कहां जाकर कितनी देर तक गरजना है। तब ये सब अपने शरीर पर जादुई पंख धारण कर निकल पड़ते हैं गरजने को। दरसअल, इनके पंखों के फड़फड़ाने की आवाज ही गर्जन के रूप में सुनाई देती है। अक्सर ये अपने पंख धारण कर आसमान में गेंद से खेलते हैं। तब हमें बहुत देर तक इनकी आवाज सुनाई देती रहती है। ये चिलम पीने के भी शौकीन होते हैं और इनकी चिलम हमें आसमानी बिजली के रूप में नजर आती है!

एक अन्य अमेरिकी दंतकथा के अनुसार, एक बार दो नन्हे भाई-बहन राह भटककर अनजान गांव में पहुंच गए। वहां के लोगों ने उन्हें आश्रय दिया, भोजन-पानी दिया। साथ ही उन्हें बताया कि यह गांव अंधकार को अभिशप्त है। रोज सुबह एक क्रूर पक्षी यहां आकर अपना जादुई गीत गाता है, जिसके कारण गांव में सूरज नहीं उगता। यदि कोई इस पक्षी को भगाने का प्रयास करे, तो वह उसका सिर काटकर धड़ से अलग कर देता है। अगली सुबह बालक उस पक्षी को ललकारने जा पहुंचा और अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से उसे छकाकर, मौका पाते ही उसका सिर चाकू से काटकर अलग कर दिया। कृतज्ञ गांववालों ने उसे एक विशाल चमचमाती तलवार भेंट की और उसकी बहन के लिए विशाल गेंद ले आए। आज जब यह बालक अपनी तलवार लहराता है, तो वह हमें आसमानी बिजली के रूप में दिखाई देती है। और जब भाई-बहन अपनी विशाल गेंद को लुढ़काकर खेलते हैं, तो हमें उसकी गर्जना सुनाई देती है...

Sunday, 4 June 2017

जब प्रेतात्माएं बनें दूल्हा-दुल्हन!

यदि आपको किसी के मरणोपरांत विवाह में आमंत्रित किया जाए, तो कैसा लगेगा? चौंक गए ना? मगर कुछ देशों में ऐसे विवाह होते आए हैं और अब भी हो रहे हैं...!
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क्या प्रेतात्माएं भी शादी करती हैं? यह प्रश्न अजीब लग सकता है मगर अजूबों से भरी इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं। जी हां, कुछ देशों में ऐसे विवाहों की भी परंपरा है, जिनमें दूल्हा या दुल्हन या फिर दोनों ही अब इस संसार में नहीं रहे। चीन, जापान, कोरिया व सूदान जैसे देशों में ऐसी परंपरा रही है और फ्रांस में यह तुलनात्मक रूप से नई पहल है। संभवत: इस किस्म की सबसे प्राचीन परंपरा चीन में रही है, जहां यह करीब 2200 साल पहले शुरू हुई। चीनी समाज में विवाह परंपरा का महत्व इस कदर था कि किसी अविवाहित के मृत्यु को प्राप्त होने पर उसकी आत्मा को चैन न मिलने का अंदेशा लोगों को रहता था। यह भी माना जाता था कि दिवंगत के अविवाहित रह जाने पर उसके परिवार पर किसी--किसी प्रकार की विपदा आ सकती है। इसलिए उसका विवाह कराना जरूरी हो जाता है। अमूमन अविवाहित दिवंगत के लिए कोई अविवाहित दिवंगत जोड़ीदार ही ढूंढा जाता और पूरे रस्मो-रिवाज से विवाह संपन्ना कराया जाता। हैरत की बात तो यह है कि आज के दौर में भी इस परंपरा के पालन की घटनाएं सामने आती रहती हैं, हालांकि इसे कानूनन अवैध घोषित कर दिया गया है!
इस तरह का 'प्रेत विवाह" उस स्थिति में भी किया जाता है, जब किसी व्यक्ति की सगाई तो हो गई हो लेकिन शादी से पहले ही वह चल बसा हो। यदि पुरुष का देहांत हुआ हो, तो उसका मरणोपरांत विवाह कराने से न केवल उसकी आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि उसकी मंगेतर को उसकी ब्याहता होने के सारे अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। अक्सर ऐसे विवाह में दूल्हे के प्रतीक स्वरूप एक सफेद मुर्गा विवाह मंडप में बिठाया जाता है। इसी प्रकार यदि सगाई के बाद महिला की मृत्यु हो जाए, तो उसका विवाह करना जरूरी माना जाता है क्योंकि अंतिम संस्कार की रस्में ससुराल पक्ष द्वारा ही अदा की जाती हैं। ऐसे में जो रस्म निभाई जाती है, उसमें विवाह और शवयात्रा के मिले-जुले तत्व होते हैं। मरणोपरांत विवाह की रस्म चीन में इसलिए भी व्याप्त रही है क्योंकि छोटे भाई या बहन की शादी तब तक नहीं की जाती, जब तक कि बड़े की न हो जाए। फिर भले ही बड़े भाई या बहन की शादी मरणोपरांत क्यों न हो!
जापान में भी मरणोपरांत विवाह की रस्म होती है मगर वहां दिवंगत का विवाह किसी जीवित व्यक्ति से करने के बजाए गुड्डे या गुड़िया के साथ किया जाता है। कांच के आवरण के भीतर दिवंगत व्यक्ति का चित्र तथा उसकी पत्नी/ पति के प्रतीक स्वरूप गुड़िया/ गुड्डे को रखा जाता है।
अफ्रीकी देश सूदान के एक समुदाय में मरणोपरांत विवाह थोड़ा अलग होता है। वहां यदि कोई पुरुष बिना शादी के मृत्यु को प्राप्त होता है, तो उसके भाई या अन्य रिश्तेदार से ही उसकी मंगेतर की शादी कर दी जाती है। मगर यह भाई या अन्य रिश्तेदार यहां केवल दिवंगत का प्रतिनिधि भर होता है। महिला को उससे जो बच्चे होते हैं, उनका पिता उस दिवंगत व्यक्ति को ही माना जाता है।

फ्रांस यूं तो पश्चिमी विश्व के आधुनिकतम देशों में से एक है लेकिन एक तरह के मरणोपरांत विवाह का चलन वहां भी है और यह पूरी तरह वैध भी है। प्रथम विश्व युद्ध में बड़ी संख्या में शहीद हुए सैनिकों की मंगेतरों ने उनके मरणोपरांत उनसे विवाह रचाया था। फिर 1959 में एक बांध फूटने से 423 लोग मारे गए। जब तत्कालीन राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल घटनास्थल का मुआयना करने पहुंचे, तो एक महिला ने उनसे गुजारिश की कि उसे इस त्रासदी में मारे गए अपने मंगेतर से शादी करने की अनुमति दी जाए। राष्ट्रपति इस पर द्रवित हो उठे और कुछ ही दिन बाद संसद में कानून बनाकर ऐसे विवाह का रास्ता साफ कर दिया गया। हालांकि इसके लिए राष्ट्रपति से अनुमति लेनी पड़ती है और कई शर्तों पर खरा उतरना होता है। 

Sunday, 14 May 2017

बला से बचने को बलि की बुनियाद!

भवन निर्माण कला के शैशव काल में, जब हर कदम पर असफलता का डर सताता था, तब मकान, पुल आदि की सलामती के लिए तरह-तरह के अनुष्ठानों की परंपराएं शुरू हुईं, जो कुछ बदले हुए स्वरूप में आज भी बनी हुई हैं...
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जो मकान अपनी छत तले आश्रय देता है, अपनी दीवारों के बीच सुरक्षा देता है, क्या वह बलि भी ले सकता है? आज के दौर में यह बात सुनने में आश्चर्यजनक लग सकती है लेकिन एक समय ऐसा भी था जब बलि की बुनियाद पर ही भवन बना करते थे। भवन निर्माण के आरंभिक काल में यह स्वाभाविक ही था कि भवन निर्माता उसकी सुदृढ़ता व टिकाऊपन को लेकर चिंतित रहते। भूत-पिशाच, दुष्टात्माओं आदि में भी खासा विश्वास किया जाता था। ऐसे में नए बनाए जा रहे मकान की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वही उपाय आजमाया गया, जो परा शक्तियों को प्रसन्ना करने व एक किस्म का अभयदान प्राप्त करने के लिए अपनाया जाता था। यानी देवी-देवताओं को बलि देना। कहीं मनुष्य की बलि दी जाती, कहीं पशुओं की। यानी मनुष्यों या पशुओं को जिंदा दफन कर इमारत की नींव रखी जाती थी! योरप से लेकर न्यूजीलैंड तक इसके प्रमाण मिले हैं।
बलि का यह रिवाज केवल भवनों के निर्माण तक सीमित नहीं था। सड़क, पुल आदि भी इसकी जद मंे आते थे। यूनान के आर्टा नगर में अरखतोस नदी पर बने एक प्राचीन पुल के निर्माण को लेकर एक किंवदंति मशहूर है। कहा जाता है कि रोज दिन में पुल की नींव डाली जाती और रात को वह ढह जाती। सब हैरान-परेशान थे कि क्या किया जाए! फिर एक दिन एक तिलस्मी पक्षी प्रकट हुआ और निर्माण दल के मुखिया से बोला कि नींव की स्थिरता के लिए उसे अपनी पत्नी की बलि देनी होेगी। अपने कर्म और राष्ट्र को समर्पित निर्माण प्रमुख इसके लिए तैयार हो गया। उसकी पत्नी को लाया गया और जिंदा दफनाया जाने लगा। कुपित पत्नी ने श्राप दिया कि उसकी लाश पर जो पुल बनेगा, वह आंधी में पत्ते की तरह थर-थर कांपेगा और उस पर से गुजरने वाले लोग भी झड़ते पत्तों की तरह नदी में जा गिरेंगे। इस पर किसी ने उसे याद दिलाया कि उसका भाई विदेश गया हुआ है, संभव है कि वापसी में वह भी इसी पुल पर से गुजरे। तब उसने अपना श्राप कुछ इस तरह संशोधित किया कि वह आशीष बन गया। उसने कहा, 'यह पुल तभी कांपे, जब ऊंचे पहाड़ कांपें और इस पर से गुजरने वाले यात्री तभी गिरें, जब शिकारी पक्षी आसमान से गिरने लगें!" इसके बाद जाकर मजबूत नींव डली और पुल बन पाया। यह कहानी एक प्रसिद्ध लोक गीत के जरिये अमर हो गई है।
बाद के दौर में, जैसे-जैसे सभ्यता थोड़ी और 'सभ्य" होती गई, बलि का स्थान निर्जीव वस्तुओं के चढ़ावे ने ले लिया। भूमि पूजन, शिलान्यास आदि जैसी परंपराएं कुछ भिन्ना-भिन्ना और कुछ मिलते-जुलते रूपों में आज भी देश-विदेश में कायम हैं। दरअसल भूमि पूजन के माध्यम से एक तरह से धरती माता से भवन निर्माण की अनुमति ली जाती है। साथ ही भूमि का शुद्धिकरण करने का भी रिवाज है। निर्माण शुरू करने से पहले दुष्टात्माओं अथवा नकारात्मक ऊर्जा से भूमि को मुक्त करने के लिए अलग-अलग तरह के अनुष्ठान विश्व भर में किए जाते आए हैं और आज भी किए जाते हैं। देखा जाए, तो इन तमाम परंपराओं की जड़ मंे अज्ञात का वह भय है, जो किसी अनिष्ट की आशंका जगाता है। भवन निर्माण कला के शैशव काल में, जब हर कदम पर असफलता का डर सताता था, तब ये परंपराएं शुरू हुईं और आज तक बनी हुई हैं।

इन सबसे हटकर अफ्रीका में एक जनजाति है बटामलीबा। इस जनजाति में भवन निर्माण को लेकर बिल्कुल अनूठी मान्यता होती है। ये लोग मानते हैं कि निर्माण के दौरान मकान 'जीवित" होता है। जीवित मकान में रहना संभव नहीं, इसलिए इसे 'मारना" जरूरी होता है। सो निर्माण का अंतिम चरण पूरा होते ही एक विशेष अनुष्ठान कर मकान को 'मार" दिया जाता है। इसके बाद ही गृह प्रवेश किया जाता है!

Sunday, 7 May 2017

क्यों डरा जाते हैं दु:स्वप्नों के दैत्य?

हमें बुरे सपने क्यों आते हैं ? ...और इनसे बचने के लिए क्या किया जाए? ये शाश्वत प्रश्न हैं और इनके कुछ दिलचस्प उत्तर इंसान तलाशता आया है...
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ऐसा कोई नहीं जिसे कभी डर न लगा हो और ऐसा भी कोई नहीं जिसे डरावने सपने कभी न आए हों। दिन भर की आपाधापी से चूर इंसान दुनिया-जहान के तनावों से दूर होकर चंद पल सुकून के चाहता है, जो उसे नींद के आगोश में मुहैया होते हैं। मगर डरावने स्वप्न इस राहत में खलल बनकर आ धमकते हैं। नन्हे शिशु से लेकर बड़े-बुजुर्गों तक इस अप्रिय अनुभव से गुजरते हैं। विज्ञान ने दु:स्वप्नों के कुछ कारण भी खोज निकाले हैं, जैसे तनावपूर्ण मन:स्थिति, हाल ही में गुजरा कोई हादसा आदि मगर इनसे बचने का कोई रामबाण नुस्खा न उपलब्ध हो पाया है और न शायद कभी उपलब्ध होगा। हां, इन कष्टकारी सपनों को लेकर इंसान का चिंतन-मनन चलता रहा है। इसके चलते विभिन्ना संस्कृतियों में दु:स्वप्नों के कुछ दिलचस्प कारण गिनाए गए हैं और इनसे बचने के उपाय भी सुझाए गए हैं।
योरप में लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि कोई राक्षस सो रहे व्यक्ति की छाती पर सवार होकर उसकी नींद में बुरे सपने डाल देता है। उसके यूं छाती पर सवार होने की वजह से व्यक्ति की सांस फूलने लगती है, वह घबरा उठता है और नींद से जाग जाता है। कुछ लोग यह भी मानते थे कि किसी राक्षसी घोड़े की सवारी करने की वजह से बुरे सपने आते हैं। यह भी माना जाता था कि ये सपने डायनों की वजह से आते हैं और ये डायनें कभी मेंढक, तो कभी घोड़े और कभी कुत्ता, बिल्ली, मधुमक्खी आदि का रूप धारण कर लेती हैं। जब कोई व्यक्ति इनकी वजह से बुरे सपने देखकर जागता है, तो उसके बाल बुरी तरह उलझे हुए होते हैं। कहा तो यह भी जाता था कि बुरे सपनों वाली यह डायन पेड़ों पर भी सवार हो जाती है और इस कारण पेड़ों की डालियां आपस में उलझ जाती हैं!
प्राचीन यूनान में बुरे सपनों के लिए फॉवीटॉर को जिम्मेदार माना गया था। इन्हें बाकायदा दु:स्वप्नों के देवता का दर्जा हासिल था और ये नींद के देवता के पुत्र माने गए। माना जाता था कि ये मनुष्य के सपनों में दैत्यों, डरावने पशुओं आदि को लेकर आते हैं। इनके दो भाई भी हैं, जिनमें से एक सपनों में मनुष्यों को दर्शाते हैं और दूसरे, निर्जीव वस्तुओं को।

दु:स्वप्नों से त्रस्त मनुष्य ने इनसे बचने के लिए तरह-तरह की युक्तियां आजमाई हैं। पंद्रहवीं सदी के आसपास योरप में ऐसी एक युक्ति काफी प्रचलित हुई थी। वह यह कि अपने बिस्तर के पास यदि एक ऐसा पत्थर टांग दिया जाए, जिसमें प्राकृतिक रूप से छेद हो, तो इससे बुरे सपने लाने वाले राक्षस-डायन आदि आपसे दूर रहते हैं। फ्रांस में कहा जाता है कि दु:स्वप्नों के दैत्य से अगर बचकर रहना है, तो आप अपने गद्दे के नीचे लोहे की कुछ कीलें रख लें। या फिर अपने पैरों की उंगलियां बिस्तर से बाहर की ओर करके सोएं। उत्तर दिशा में सिर करके सोने से भी इस दैत्य से बचा जा सकता है। बुरे सपने हमें नींद से जगा तो देते ही हैं, अक्सर हमारे अवचेतन में यह भय भी छोड़ जाते हैं कि हमने सपने में जो अनिष्ट होते देखा, कहीं वह सच तो नहीं हो जाएगा! इसीलिए मेक्सिको में यह कहा जाता है कि यदि आपको कोई बुरा सपना आए, तो अपने किसी करीबी व्यक्ति को उसके बारे में बता दें। इससे वह सपना हकीकत में नहीं बदल पाएगा। हां, यह बात उसके कानों में फुसफुसाने के बजाए जोर-जोर से बोलकर सुनानी चाहिए...!

Sunday, 23 April 2017

अजब शोध के गजब विषय!

यह जरूरी नहीं कि वैज्ञानिक शोध किसी ऐसे विषय पर ही हो, जो इंसान की जिंदगी बदल दे। दुनिया भर के विद्वान ऐसे विषयों पर भी शोध करते आए हैं, जिनके बारे में सुनकर यह सवाल उठता है कि यह कवायद आखिर की ही क्यों गई!
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इंसानी दिमाग यदि खोजी प्रवृत्ति का न होता, तो आज शायद हम अन्य प्राणियों से बहुत भिन्ना न होते। अपने मन में उठती जिज्ञासाओं और इन्हें शांत करने के उपक्रमों ने ही मनुष्य को सारी प्रजातियों में उन्नात बनाया। आग जलाने और पहिया बनाने से लेकर डिजिटल व नैनो टेक्नोलॉजी के हैरतअंगेज कारनामों तक का सफर उसने खुद से सवाल करने और फिर उनका समाधान खोजने के माध्यम से ही तय किया है। मगर कई बार ये सवाल खुद ही सवालों के घेरे में आ जाते हैं। दुनिया के विभिन्ना हिस्सों में निरंतर चल रहे शोध-अनुसंधानों के विषयों पर गौर करें, तो कई बार बड़े ही बेतुके-से विषय भी मिल जाते हैं। तब यह सोचकर हैरानी होती है कि अच्छे-खासे धन, समय व ऊर्जा को खपाकर आखिर ऐसे विषयों पर शोध की ही क्यों जाती है और इससे क्या हासिल होता है!
अभी कुछ ही दिन पहले कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में इस बात पर शोध की गई कि अच्छी तरह बांधा गया जूते का फीता भी अचानक खुल क्यों जाता है? इसके लिए शोधकर्ताओं ने बाकायदा ट्रेडमिल पर दौड़ते शख्स के जूतों का स्लो मोशन वीडियो बनाया और देखा कि फीता कब व कैसे खुलने लगता है। निष्कर्ष यह निकाला गया कि दरअसल हम जिस तरह से जूते का फीता बांधते आए हैं, वही गलत है! अब बताइए, जब संसार में भांति-भांति की समस्याएं हैं, अभाव हैं जिन्हें दूर करने की दरकार है, तब शोध के लिए यह विषय कितना प्रासंगिक कहा जा सकता है? हां, लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं पर शोधकर्ताओं का भी पूरा हक है और उन्हें यह तय करने का अधिकार होना ही चाहिए कि वे किस विषय पर शोध करें। मगर कई बार शोध के विषय इस पूरी कवायद की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं।
फीता खुलने के रहस्य पर शोध तो एक ताजा उदाहरण मात्र है। दुनिया के अलग-अलग भागों में होती रही 'शोध" गतिविधियों पर गौर करें, तो ऐसे अनेक बेतुके विषय मिल जाएंगे जिन पर खोजबीन की गई और बाकायदा रिसर्च पेपर लिखे गए। मसलन, ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के डॉ लेन फिशर ने विस्तृत अध्ययन कर यह जानने का प्रयास किया कि चाय या दूध में बिस्किट डुबोने की सबसे सटीक तकनीक कौन-सी है, जिससे बिस्किट टूटे नहीं। उधर इलिनोआ स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि क्या एक पौंड सीसा और एक पौंड पंखों का वजन एक-समान महसूस होता है? 23 लोगों की आंखों पर पट्टी बांधकर उनसे एक जैसे आकार के बक्से उठवाए गए और पूछा गया कि कौन-सा बक्सा भारी है। अधिकांश लोगों ने उन बक्सों को ज्यादा भारी बताया, जिनमें सीसा रखा था, हालांकि वजन सभी बक्सों का एक समान था।
दुनिया के सबसे शांतिप्रिय देशों में से एक के रूप में विख्यात स्विट्जरलैंड की बर्न यूनिवर्सिटी में 2009 में एक बड़े ही हिंसक विषय पर अनुसंधान किया गया। अनुसंधानकर्ताओं के सामने सवाल यह था कि किसी के सिर पर बियर की खाली बोतल मारने से उसकी खोपड़ी फूटने की अधिक संभावना होती है या फिर भरी बोतल मारने से...? यह पाया गया कि भरी हुई बोतल 70 प्रतिशत अधिक ताकत से सिर से टकराएगी लेकिन खोपड़ी फोड़ने के लिए खाली बोतल भी पर्याप्त है! जापान के एक विश्वविद्यालय के शोधकताओं ने यह जानने की कोशिश की कि क्या कबूतर दो अलग-अलग चित्रकारों के बनाए चित्रों में फर्क कर पाते हैं? निष्कर्ष निकला 'हां"। उधर स्वीडन में किए गए अनुसंधान में यह बताया गया कि मुर्गे-मुर्गियां 'सुंदर" दिखने वाले मनुष्यों को ज्यादा पसंद करते हैं! वहीं केंब्रिज के एक संस्थान ने अध्ययन करके यह नतीजा निकाला कि भेड़ें एक-दूसरे के चेहरे पहचान सकती हैं। इसी तरह अमेरिकी शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि चूहे क्लासिकल म्यूजिक पसंद करते हैं या जैज़?

इन तमाम अनुसंधानों के बीच क्यों न एक शोध यह जानने के लिए भी की जाए कि आखिर क्यों मनुष्य ऐसे बेतुके विषयों पर शोध करने को प्रेरित होता है...? 

Sunday, 9 April 2017

सबसे बड़ा आलसी कौन?

आलसियों की जमात खीझ भी उत्पन्न करती है और उपहास का विषय भी बनती है। कथा साहित्य में अक्सर आलसियों का जिक्र हंसी के पात्र के रूप में ही किया जाता है।
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क्या आलसीपन छूत का रोग है? पिछले दिनों फ्रांस में किए गए एक शोध का यही निष्कर्ष निकला कि यदि आप आलसी लोगों से घिरे हैं, तो चाहे-अनचाहे आप भी आलसीपन की गिरफ्त में आ जाएंगे! यानी संगत का असर आलसीपन के मामले में तो स्पष्ट रूप से सामने आता है। यह बहस का विषय हो सकता है कि यह निष्कर्ष किस हद तक सही है मगर दिलचस्प बात यह है कि जहां समय-समय पर आलसीपन के 'दौरे" हम सभी को पड़ते हैं, वहीं कुछ लोग इसे स्थायी भाव के रूप में लिए रहते हैं। यानी उनके मामले में दोष किसी संगत को देना मुश्किल है।
आलसियों की जमात खीझ भी उत्पन्न करती है और उपहास का विषय भी बनती है। कथा साहित्य में अक्सर आलसियों का जिक्र हंसी के पात्र के रूप में ही किया जाता है। कभी अंत में उन्हें सबक मिल जाता है और कभी नहीं भी मिलता। फिलिपीन्स में 'आलसी जॉन" नामक पात्र से जुड़ी लोक कथाओं की समूची श्र्ाृंखला ही चली आई है, जोकि बेहद लोकप्रिय है। कभी उसे बालक के रूप में चित्रित किया जाता है और कभी युवा के रूप में मगर उम्र कोई भी हो, आलसीपन ही उसके चरित्र को परिभाषित करता है। वह इस कदर आलसी है कि अमरूद से लदे पेड़ पर से पके फल तोड़ने के बजाए उसके नीचे अपना मुंह खोलकर लेट जाता है और इंतजार करता है कि कोई फल पेड़ पर से सीधे उसके मुंह में आ गिरे!
जाहिर है, इस तरह की लोक कथाओं में आलसीपन के किस्से अतिरंजित करके सुनाए जाते हैं और यही इन्हें दिलचस्प भी बनाता है। एक जर्मन लोक कथा में एक राजा असमंजस में है कि अपने तीन बेटों में से किसे वह अपना उत्तराधिकारी बनाए। वह तय करता है कि तीनों में जो सबसे ज्यादा गुणी होगा, वही होगा उत्तराधिकारी। दिक्कत यह है कि तीनों ही राजकुमारों में केवल एक 'गुण" है और वह है उनका आलसीपन। सो राजा उन तीनों को बुलाकर कहता है कि तुममें से जो सबसे ज्यादा आलसी होगा, वही मेरे बाद राजा बनेगा। अब तीनों बेटों में स्वयं को दूसरों से ज्यादा आलसी बताने की होड़ लग जाती है। पहला बेटा कहता है, 'जब मैं सोने जाता हूं, तो अपनी आंखें तक बंद करने की मेहनत नहीं करता।" दूसरा बेटा कहता है, 'जब मैं आग तापने बैठता हूं और आग मेरे पैर को झुलसाने लगती है, तो मैं पैर पीछे करने का भी उपक्रम नहीं करता।" तभी तीसरा राजकुमार कह उठता है, 'पिताजी, मैं तो इतना आलसी हूं कि यदि मुझे फांसी पर लटकाया जा रहा हो और कोई मेरे हाथ में चाकू थमा दे जिससे मैं रस्सी काट दूं, तो भी मैं रस्सी काटने की जेहमत उठाने के बजाए फांसी पर लटक जाऊंगा...!" राजा साहब इस तीसरे बेटे को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देते हैं।

अमेरिकी आदिवासी समुदाय के बीच सात आलसी लड़कों की एक कहानी प्रसिद्ध है, जो न अपनी मां का कहना मानते हैं और न ही किसी काम में उसकी मदद करते हैं। मां उन्हें डांटती रहती है, तो एक दिन सातों ईश्वर से प्रार्थना करने लगते हैं कि उन्हें घर से इतनी दूर ले जाया जाए कि न मां उन्हें परेशान कर पाए और न वे मां को। वे घर की परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करते जाते हैं कि अचानक कोई अदृश्य ताकत उन्हें आसमान की ओर उठाने लगती है। सातों ऊपर उठते जाते हैं, तभी मां बाहर आकर उन्हें रोकने की कोशिश करती है। एक बेटा मां की पकड़ में आ जाता है, जबकि शेष छह आसमान में पहुंच जाते हैं और तारे बन जाते हैं। इन छह के तारामंडल को ही प्लीयडीज या कृतिका तारामंडल कहा जाता है।

Sunday, 26 March 2017

क्या कहता है यह निशान?

हमारे शरीर पर प्रकृति ने बर्थमार्क के रूप में कुछ सहज कलाकारी की और उसे लेकर हमारे पूर्वजों ने उतनी ही सहजता से ढेरों गाथाएं गुंथ लीं। यह निशान क्यों पड़ता है और इसका क्या निहितार्थ है, इसे लेकर भांति-भांति की रोचक धारणाएं व्याप्त हैं।
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क्या हमारे शरीर पर मौजूद जन्मचिह्न (बर्थमार्क) महज इत्तेफाक होता है या इसके पीछे कोई कहानी होती है? वैसे तो विज्ञान कहता है कि त्वचा के किसी एक स्थान पर अत्यधिक पिगमेंट कोशिकाओं या रक्तवाहिकाओं के इकट्टा होने से उस स्थान पर त्वचा का रंग शेष त्वचा से अलग हो जाता है और यही आकृति बर्थमार्क के रूप में नजर आती है। मगर जन्म के समय से ही शरीर पर मौजूद या जन्म के ठीक बाद उभरने वाले इन अजीब निशानों को लेकर जिज्ञासु इंसान ने इसके पीछे इतने दिलचस्प कारणों की कल्पना कर डाली कि विज्ञान वाली व्याख्या बड़ी रूखी और नीरस जान पड़ती है!
अनेक संस्कृतियों में लोग मानते हैं कि बर्थमार्क का संबंध गर्भावस्था में मां के मनोभावों या गतिविधि से होता है। मसलन, यह कि यदि गर्भावस्था में मां को कोई लाल या भूरी वस्तु खाने की तीव्र इच्छा हो और वह पूरी न हो पाए, तो बच्चे के शरीर पर लाल या भूरे रंग का निशान बन जाता है। यानी मां की अतृप्त इच्छाएं शिशु की त्वचा पर अंकित हो जाती हैं। योरप से लेकर अरब तक ऐसी धारणा व्याप्त है। वहीं ईरान में इसे सूर्य ग्रहण से जोड़ा गया है। वहां कहते हैं कि यदि कोई गर्भवती स्त्री सूर्य ग्रहण को देखते हुए अपने पेट पर हाथ रखती है, तो बच्चे को बर्थमार्क पड़ जाता है। जापान में गर्भवतियों को आगाह किया जाता है कि वे आग को घूरकर न देखें, अन्यथा बच्चे के शरीर पर जले के निशान जैसा जन्मचिह्न बन जाएगा!
विश्व में जहां-जहां पुनर्जन्म की मान्यता है, वहां बर्थमार्क का संबंध पिछले जन्म की किसी घटना से भी बताया जाता है। मसलन, यदि पिछले जन्म में शरीर के किसी अंग पर घातक चोट लगी थी, तो इस जन्म में उसी स्थान पर निशान बना मिलेगा। ऐसा हम बॉलिवुडिया फिल्मों में भी देखते आए हैं। कुछ देशों में यह माना जाता है कि बर्थमार्क फरिश्तों द्वारा शिशु को चूमने के कारण बनता है। इसलिए बर्थमार्क को शुभ मानकर इसे धारण करने वाले व्यक्ति का स्पर्श करना भाग्यशाली कहा जाता है। वहीं कुछ समुदायों में इसे शैतान का निशान मानकर बर्थमार्क धारण करने वाले को दुष्ट भी ठहरा दिया जाता है!
चीन में बर्थमार्क के आधार पर व्यक्तित्व की व्याख्या करने का चलन रहा है। कहते हैं कि यदि आपके बायें पैर पर निशान है, तो आप बहुत बुद्धिमान हैं और यदि दायें पैर पर निशान है, तो आप खूब यात्रा करेंगे। हां, यदि निशान आपके पेट पर है, तो यह इस बात को दर्शाता है कि आप बेहद लालची हैं! छाती पर मौजूद निशान कहता है कि आज नहीं तो कल आपकी किस्मत खुलने वाली है। जबड़े पर मौजूद बर्थमार्क स्वास्थ्य समस्याओं की ओर इशारा करता है। दायें कंधे पर बर्थमाक कहता है कि आप धनवान होंगे, जबकि बायें कंधे का बर्थमार्क इससे ठीक विपरीत कहता है।

हमारे शरीर पर प्रकृति ने कुछ सहज कलाकारी की और उसे लेकर हमारे पूर्वजों ने उतनी ही सहजता से ढेरों गाथाएं गुंथ लीं। आखिर गाथाएं गुंथना हमारी सहज वृत्ति जो है...!