Sunday, 24 March 2019

पत्थर घुमाओ, श्राप दे डालो!

श्राप की अवधारणा शायद मानव इतिहास जितनी ही पुरानी है। इससे जुड़े किस्से-कहानियां एक तरह से मनुष्य के परपीड़क रूप की बानगी भी दिखाते हैं।
***

आयरलैंड में कुछ खास तरह के पत्थर पाए जाते हैं, जिनकी बनावट जरा लीक से हटकर है। इनमें कुछ तो प्राकृतिक रूप से यह बनावट लिए हुए होते हैं, वहीं अन्य को पुरातन काल में इस तरह तराशा गया था। इनका बीच का हिस्सा कुछ दबा हुआ होता है, जिससे कटोरेनुमा आकृति बन जाती है। इस पत्थर के 'कटोरे" में बारिश का पानी भर जाता है, जिसे पवित्र मानने की परंपरा रहती आई है। कहा जाता है कि एक संत के जन्म के तुरंत बाद उनका सिर एक पत्थर से टकरा गया था, जिससे पत्थर में गड्ढेनुमा आकृति बन गई और इसमें भरने वाले बारिश के पानी में तमाम रोगों का इलाज करने का चमत्कारिक गुण आ गया। खैर, इस कटोरे में सिर्फ पानी ही नहीं होता, कई बार कुछ कंकर या छोटे पत्थर भी इसमें आ ठहरते हैं। पत्थर के कटोरे में मौजूद इन छोटे पत्थरों का प्रयोग लोग पारंपरिक रूप से आशीर्वाद और श्राप दोनों देने के लिए करते आए हैं। किसी के भले की कामना करनी हो, तो हाथ से उस छोटे पत्थर को घड़ी की सुई की दिशा में घुमाते हुए प्रार्थना की जाती है या सीधे-सीधे बोल दिया जाता है कि फलां की बीमारी ठीक हो जाए या फलां को जीवन की सारी खुशियां मिलें आदि। वहीं यदि किसी को श्राप देना हो, तो उसी पत्थर को घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में घुमाते हुए शत्रु का बुरा चाहा जाता है। अब इसे मानव की नकारात्मक प्रवृत्ति कहें या कुछ और, आम बोलचाल में इन पत्थरों को 'दुआ के पत्थर" के बजाए 'बद्दुआ/ श्राप के पत्थर" ही कहा जाता है!
भलाई और बुराई के दो छोरों के बीच अपनी जीवन नैया खेता आ रहा मनुष्य कभी अन्याय का शिकार होने पर, तो कभी निरे कपट के चलते, शिद्दत से दूसरे के बुरे की कामना करता है। साथ ही, उसके किस्सों-कहानियों, पुरातन आख्यानों आदि में श्रापों का खूब वर्णन मिलता है। उसने माना कि कुछ खास शक्तियां या सिद्धि प्राप्त लोग जब किसी का बुरा चाहते हैं, तो वास्तव में उनका बुरा होता है। ऐसा विश्वास देशों और संस्कृतियों की सीमाएं लांघकर समूचे मानव जगत में पाया जाता है। साथ ही, इसके चलते श्राप संबंधी कुछ दिलचस्प जनश्रुतियां, पौराणिक किस्से आदि भी सदियों से चले आए हैं।
प्राचीन ग्रीक आख्यानों में ट्रॉय की राजकुमारी कैसेंड्रा का जिक्र आता है। सत्य और भविष्यकथन के देवता अपोलो का दिल कैसेंड्रा पर आ गया। उन्होंने राजकुमारी के समक्ष प्रणय प्रस्ताव पेश किया और बदले में उसे भविष्य देखने का वरदान देने का वादा किया। कैसेेंड्रा ने अपोलो का प्रस्ताव स्वीकार किया लेकिन भविष्य देखने की शक्ति प्राप्त होते ही अपनी बात से पलट गई और अपोलो को ठुकरा दिया! जाहिर है, इस धोखे से अपोलो को कुपित होना ही था। उन्होंने तत्काल कैसेंड्रा को श्राप दे डाला कि वह जब भी कोई भविष्यवाणी करेगी, तो उस पर कोई यकीन नहीं करेगा। कैसेंड्रा आजीवन इस श्राप को ढोती रही। वह जब-जब भविष्य में किसी अनिष्ट को भांपकर लोगों को आगाह करती, उस पर अविश्वास ही किया जाता। यहां तक कि उसने अपने प्रिय नगर ट्रॉय की बर्बादी का मंजर भी पहले ही देख लिया था लेकिन उसे टाल न सकी क्योंकि किसी ने उस पर यकीन नहीं किया।
क्या कभी किसी श्राप को भी वरदान में बदला जा सकता है? ईरान व आसपास के इलाकों में प्रचलित कथाओं में नार्ट कबीले के लोगों के बारे में बताया जाता है। कहते हैं कि एक बार ईश्वर इन लोगों से नाराज हो गए और इन्हें श्राप दिया कि वे दिन भर में चाहे जितना भी गेहूं काटें, शाम को उन्हें एक बाल्टी भर गेहूं ही मिलेंगे। नार्ट लोग बड़े शातिर निकले। वे अब दिन में बस एक मुट्ठी गेहूं काटकर आराम फरमाने बैठ जाते और शाम को बाल्टी भर गेहूं पाते!

Sunday, 3 March 2019

जब चाहकर भी जहर से न मर सका सम्राट


जहर को लेकर अनेक वास्तविक व काल्पनिक किस्से चले आए हैं। इनमें से कुछ बड़े ही दिलचस्प होते हैं...
***

एक किंवदंती है कि पांचवीं सदी ईसा पूर्व के फारसी सम्राट आर्टजर्कसिस द्वितीय की मां परिसटिस और पत्नी स्टेटीरा की आपस में बिल्कुल नहीं बनती थी। दोनों के बीच इस कदर परस्पर अविश्वास था कि वे एक-दूसरे पर जहर द्वारा हत्या का षड़यंत्र रचने का शक करती थीं। इस शक के चलते दोनों का कुछ खाना-पीना दुश्वार हो गया। तब हल यह निकाला गया कि वे दोनों एक ही साथ, एक ही रसोइये द्वारा बनाए गए एक-जैसे व्यंजनों का सेवन करेंगी। अब बात यह थी कि परिसटिस वास्तव में अपनी बहू का काम तमाम करना चाहती थी और चूंकि दोनों का भोजन एक ही होता था, सो यह संभव नहीं हो पा रहा था। तब उसने एक नायाब चाल चली। उसने छुरी की एक ओर की एक धार पर जहर लगाया। फिर भोजन के दौरान भुने हुए मांस का एक टुकड़ा जहर लगी धार से काटकर अपनी बहू को परोसा और दूसरी ओर वाली धार से कटा दूसरा टुकड़ा खुद खाया। स्टेटीरा बीमार पड़ी और तड़प-तड़पकर मर गई। मगर मरने से पहले उसने अपने पति से स्पष्ट कह दिया कि मुझे शक है तुम्हारी मां ने मुझे जहर दिया है। पत्नी की मृत्यु से दुखी सम्राट ने अपनी मां के सेवकों पर खूब कहर बरपाया, जब तक कि उन्होंने सच नहीं उगल दिया। फिर उसने राजमाता परिसटिस को देश निकाला दे दिया।
प्रमाणित इतिहास हो या मथिकीय कथाएं, जहर के प्रयोग के ऐसे सैंकड़ों उदाहरण मिल जाते हैं। इनमें कुछ अतिरंजित होते हैं, तो कुछ की प्रामाणिकता संदिग्ध होती है। कुछ किस्से सच्चे होते हैं, तो कुछ कोरी गल्प। जो भी हो, इनमें से कई किस्से रोचकता से भरपूर होते हैं। सुकरात को जहर देकर मारा गया था, तो क्लियोपेट्रा ने अपने प्राण सांप के जहर से ले लिए। सिकंदर की मौत की वजह भी कुछ लोग जहर बताते हैं। भारत में विष कन्याओं के कई किस्से बताए जाते हैं।
तुर्की का एक इलाका प्राचीन काल में पॉन्टस कहलाता था। यहां के सम्राट मित्रदातिस षष्ठम को भी जहर से मारे जाने का डर था और वह भी खुद अपनी मां के हाथों! कहा जाता था कि सम्राट की मां ने अपने पति को जहर देकर मरवा दिया था। दोनों बेटों के नाबालिग होने के कारण वह स्वयं राजपाट चला रही थी। मित्रदातिस को शक था कि उसके छोटे भाई को राजगद्दी पर आसीन करने की खातिर मां उसे भी जहर देकर रास्ते से हटा सकती है। जब वह बीमार रहने लगा, तो उसका शक पुख्ता हो गया कि उसे धीमा जहर दिया जा रहा है। वह राजमहल से भाग खड़ा हुआ और जंगलों में रहने लगा। यहां वह किसी ऐसी खुराक की खोज में जुट गया, जिसमें संसार में मौजूद हर तरह के जहर की काट हो। बरसों की मेहनत के बाद वह सफल हुआ और इस खुराक की बदौलत उसका शरीर किसी भी जहर को बेअसर करने में सक्षम हो गया। वह राजधानी लौटा और राजगद्दी पर अपना हक जताकर उस पर आसीन भी हो गया। समय का पहिया घूमा। रोमन शासक पॉम्पी से युद्ध में पराजित होकर मित्रदातिस को काले सागर के उत्तर की ओर भागना पड़ा। वहां रहकर वह स्थानीय लोगों को लेकर नए सिरे से सेना गठित करने लगा ताकि अपना राजपाट वापस हासिल कर सके। मगर सेना खड़ी करने के फेर में उसने लोगों पर इस कदर सख्ती की कि वे उसके खिलाफ विद्रोह कर उठे। हारकर मित्रदातिस ने आत्महत्या का फैसला किया मगर जब उसने जहर खाया, तो वह बेअसर रहा। कभी जहर से खौफ खाने वाला सम्राट अब चाहकर भी जहर से नहीं मर सकता था! तब उसने अपने मित्र बिट्यूटस से विनती की कि वह अपनी तलवार द्वारा उसे जलालत भरे जीवन से मुक्त कर दे। बिट्यूटस ने भारी मन से सम्राट की इच्छा पूरी कर दी...

Sunday, 17 February 2019

पर्वतों के महायुद्ध से बदलता भूगोल!


क्या पर्वत भी कभी देवता थे या फिर देवताओं की सवारी थे? ज्वालामुखी के रूप में आग उगलते पर्वतों को मनुष्य ने युद्धरत देवताओं के रूप में भी देखा है...
***

न्यूजीलैंड के माओरी आदिवासी मानते हैं कि पहाड़ भी कभी देवी-देवता हुआ करते थे और अकल्पनीय शक्ति से संपन्ना थे। देश के उत्तरी द्वीप पर स्थित सात पहाड़ों का माओरी समाज में विशेष महत्व है। उनके अनुसार, इन सात में से छह पहाड़ देवता थे, जबकि पिहंगा पहाड़ देवी। सभी छह देवता पिहंगा पर मोहित थे और एक दिन तय हुआ कि वे आपस में युद्ध कर तय करेंगे कि पिहंगा किसकी होगी। पहाड़ों के बीच यह युद्ध कई दिनों तक चला, जिसमें वे एक-दूसरे पर आग उगलते रहे। जलती चट्टानें आसमान में इधर से उधर उड़ती रहीं। इस महायुद्ध से धरती कांप उठी। अंतत: टोंगारिरो पर्वत विजेता रहा और अनंतकाल तक पिहंगा के बगल में उपस्थित होने का अधिकारी बना। शेष पराजित पर्वतों से कहा गया कि वे रात भर में जितना दूर जा सकें, चले जाएं। दो पर्वत दक्षिण की ओर चले गए और दो पूर्व की ओर। वहीं तारानाकी पर्वत अपनी पराजय से सबसे ज्यादा दुखी था क्योंकि वही सबसे ज्यादा शिद्दत से पिहंगा को चाहता था। कुछ लोग तो यह भी मानते हैं कि तारानाकी और पिहंगा पति-पत्नी थे और टोंगारिरो ने पिहंगा को छीन लिया था। दुख, क्रोध व ग्लानि से कसमसाता तारानाकी जमीन में गहरी खाई बनाता हुआ दूर चला गया और समुद्र के किनारे जा खड़ा हुआ। पिहंगा के लिए बहाए गए उसके आंसू इस खाई में भर गए और नदी के रूप में बह निकले।
ज्वालामुखियों के विस्फोट, भूकंप और नित बदलते भूगोल को देखने व उसका वर्णन करने का यह बड़ा ही दिलचस्प तरीका है। हालांकि पहाड़ों को देवी-देवता का दर्जा देने का यह इकलौता उदाहरण नहीं है। अनेक देशों-समाजों में पहाड़ पूजनीय रहे हैं। या तो इन्हें सीधे-सीधे ईश्वरीय अवतार माना गया या फिर इनके विराट आकार के आदर स्वरूप मनुष्य इनके आगे नतमस्तक हुआ। पर्वतों के शिखरों का विशेष महत्व था। शायद इसलिए कि आकाश छूते ये शिखर स्वर्ग के निकट माने जाते थे। ऊंचाइयों और दिव्यता का वैसे भी एक परस्पर संबंध मानव अवचेतन में रचा-बसा रहा है। इसलिए भी अपनी ऊंचाई के चलते पर्वत दिव्य आभामंडल से मंडित रहे हैं। अनेक पर्वत ईश्वर या देवताओं के वास के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। फिर वह यूनानी सभ्यता का ओलिंपस पर्वत हो या फिर भारतीय-तिब्बती सभ्यता में पवित्रतम माना गया कैलाश पर्वत। मेरू, सिनाई, फुजी, किलिमंजारो आदि अनेक वास्तविक व मिथकीय पर्वतों के उल्लेख से विश्व भर के प्राचीन आख्यान भरे पड़े हैं।
अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत स्थित शास्ता पर्वत का स्थानीय आदिवासियों के बीच विशेष धार्मिक महत्व है। इससे जुड़ी कथा भी माओरियों की कथा की भांति प्रेम, इनकार और युद्ध के इर्द-गिर्द घूमती है। बताते हैं कि पाताल लोक के देवता लाओ को क्लामथ कबीले की राजकुमारी से प्रेम हो गया और उन्होंने कबीले के मुखिया से उसका हाथ मांग लिया। मगर लाओ के वीभत्स रंग-रूप के देखकर राजकुमारी ने उनसे विवाह करने से इनकार कर दिया। तब लाओ ने पूरे कबीले को सबक सिखाने का प्रण लिया। भयभीत क्लामथ कबीले ने स्वर्गलोक के देवता स्कैल का आह्वान किया कि वे आकर उनकी रक्षा करें। अब स्कैल शास्ता पर्वत पर सवार हुए और लाओ पास ही स्थित मजामा पर्वत पर। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ। दोनों पर्वतों के बीच गगनभेदी गर्जना के साथ आग के भयावह गोले दागे गए। ऐसा युद्ध हुआ कि धरती कांप गई। आखिरकार स्कैल ने लाओ को परास्त किया और कबीले की रक्षा की। तभी से वह शास्ता पर्वत भी पवित्र हो गया, जिस पर सवार होकर उन्होंने यह विजय प्राप्त की थी।

Sunday, 3 February 2019

फूलों में महकते किस्से


फूलों ने संसार को खूबसूरत बनाया, तो इनकी उत्पत्ति भला नीरस कैसे रह सकती थी? मनुष्य ने विभिन्ना फूलों की उत्पत्ति के पीछे रोचक किस्से गढ़े हैं। इनमें प्रेम भी है, विरह भी और थोड़ा तिलस्म भी।
***

तुर्की की एक प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार, फरहाद नामक शिल्पकार को राजकुमारी शीरीं से प्रेम हो गया। शीरीं भी उसके प्रेम में गिरफ्तार हो गई। जाहिर है, शीरीं के पिता को यह स्वीकार नहीं हो सकता था कि उनकी बेटी एक आम शिल्पकार के प्रेम में पड़े। उन्होंने फरहाद के सामने एक असंभव-सी शर्त रख दी और इसके पूरा होने पर शीरीं का हाथ उसे देने का वादा किया। शर्त यह थी कि फरहाद पहाड़ों के बीच नहर खोद दे। प्रेम में पागल फरहाद इस काम में जुट गया और धीरे-धीरे नहर का काम पूरा होने को आया। जब राजा ने देखा कि फरहाद शर्त पूरी करने को है, तो उसने शीरीं की मौत की झूठी खबर फरहाद तक पहुंचा दी। फरहाद इस कदर व्यथित हुआ कि उसने अपने औजारों से ही खुद के प्राण ले लिए। उधर शीरीं को जब फरहाद की मौत की खबर लगी, तो वह दौड़ती हुई उसके पास गई और उसने भी खुदकुशी कर ली। दोनों प्रेमियों का खून बहकर एकाकार हो गया और उसने एक खूबसूरत फूल का रूप ले लिया। यही फूल ट्यूलिप कहलाया।
रंग-बिरंगे, खुशबू बिखेरते फूलों के आकर्षण में सदा से कैद रहे इंसान ने कई पुष्पों की उत्पत्ति की ऐसी ही दिलचस्प कहानियां गढ़ी हैं। मानो किसी फूल की सुंदरता व महक ही उसके लिए काफी नहीं थी। उस फूल की उत्पत्ति को किसी विशेष कहानी से संबद्ध करना भी जरूरी था। सो ऐसे अनेक किस्से-कहानियां चल पड़े। खास बात यह कि ऐसी अधिकांश कहानियों में अधूरे प्रेम का वर्णन था।
ग्रीक मिथकों में नारसिसस नामक शिकारी का जिक्र है, जिस पर एक दिन पहाड़ी युवती एको की नजर पड़ी और वह उसे दिल दे बैठी। वह छुप-छुपकर नारसिसस का पीछा करती रही। जब नारसिसस को महसूस हुआ कि कोई उसका पीछा कर रहा है, तो उसने पलटकर पूछा कि कौन है वहां? एको ने उसी का वाक्य दोहरा दिया, 'कौन है वहां?" कुछ देर तक यही चलता रहा कि एको नारसिसस का वाक्य ही दोहरा देती। आखिरकार वह सामने आई और नारसिसस के प्रति प्रेम का इजहार किया। मगर मगरूर नारसिसस ने उसे दुत्कार दिया। एको अपना टूटा दिल लिए एक कंदरा में चली गई और विरह में तिल-तिल कर खत्म हो गई। उसकी जगह रह गई केवल उसकी आवाज, जो दूसरों की आवाज की प्रतिध्वनि के रूप में सुनाई देती। जब प्रेम व सौंदर्य की देवी एफ्रोडाइटी ने एको का यह हश्र देखा, तो नारसिसस को उसके घमंड की सजा देने की ठानी। एक दिन नारसिसस जंगल में अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश कर रहा था। एफ्रोडाइटी ने अपनी शक्तियों से उसे एक ताल की ओर खींचा। जैसे ही वह पानी पीने के लिए झुका, ताल में अपना प्रतिबिंब देखकर उस पर मोहित हो गया। अपने ही प्रतिबिंब के प्रेम में वह इस कदर पड़ा कि उस स्थान से हट नहीं सका। पानी में खुद को निहारते हुए ही अंतत: उसकी देह निष्प्राण हो गई। उसके स्थान पर एक फूल प्रकट हुआ, जिसे नारसिसस (नरगिस) के नाम से जाना गया।
लाल गुलाब की उत्पत्ति को लेकर रोमन कथा यह है कि पहले दुनिया के सारे गुलाब सफेद हुआ करते थे। ये सौंदर्य की देवी वीनस को बहुत प्रिय थे। एक दिन उनका पैर कंटीली झाड़ियों में पड़ गया और उससे खून बह निकला इस खून से रंगकर सफेद गुलाब लाल हो गए। आगे किस्सा यह है कि एक दिन वीनस के पुत्र और प्रेम के देवता क्यूपिड गुलाब को सूंघ रहे थे, तो उसमें छिपी मधुमक्खी ने उनके होंठ पर डंक मार दिया। वीनस ने क्यूपिड के होंठ से मधुमक्खी का डंक निकाला और उसे गुलाब की डाल पर रख दिया। इस डंक ने ही कांटे का रूप लिया और इस प्रकार गुलाब के पौधों पर कांटे उपस्थित हुए।

Sunday, 27 January 2019

विधाता की उदासी छूमंतर करने वाली 'आत्माएं"


तितलियां अपने इंद्रधनुषी रंगों से खुशियां तो बिखेरती ही हैं, इन्हें कई स्थानों पर दिवंगत पूर्वजों की आत्मा भी माना गया है। कोई इन्हें लंबी आयु का प्रतीक मानता है, तो कोई कहता है कि ये हमारी मनोकामनाएं ईश्वर तक पहुंचाती हैं।
***

टोहोना आटम  नामक एक अमेरिकी आदिवासी समुदाय में तितलियों की उत्पत्ति की बड़ी ही मजेदार कहानी सुनाई जाती है। इसके अनुसार, एक दिन जब विधाता कुछ बच्चों को खेलता हुआ देख रहे थे, तो बड़े उदास हो गए। उनकी उदासी का कारण बच्चों का उन्मुक्त होकर हंसना-खेलना नहीं, बल्कि यह विचार था कि एक दिन ये बच्चे वृद्धावस्था को प्राप्त होंगे। इनके शरीर जर्जर हो जाएंगे। बाल पक जाएंगे, दांत गिर जाएंगे, चलने-फिरने में परेशानी आएगी। फिर, वे फूलों को देखकर इस खयाल से उदास हो गए कि जल्द ही ये मुरझा जाएंगे। हरी-भरी पत्तियों को देख यह सोचकर दुखी हो गए कि ये सूखकर झड़ जाएंगे। अपनी ही सृष्टि की नश्वरता के नियम से उदास विधाता ने आखिरकार तय किया कि वे कुछ ऐसा रचेंगे, जिससे उनका भी दिल खुश हो जाए और जो सामने खेल रहे बच्चों को भी आनंदित कर दे।
विधाता ने अपना झोला निकाला और उसमें सूरज की थोड़ी रोशनी डाली। फिर उसमें आकाश का थोड़ा नीला रंग, बच्चों की परछाई, झड़ते हुए पत्ते का पीलापन, एक लड़की के बालों का काला रंग, आसपास फैले फूलों के लाल, नारंगी, जामुनी आदि रंग डाले। अंत में उन्होंने पंछियों के गीत भी अपने झोले में डाल दिए। अब वे खेल में मशगूल बच्चों के पास गए और बोले, 'बच्चों, यह झोला खोलकर देखो। इसमें तुम्हारे लिए कुछ है।" बच्चों ने जैसे ही झोला खोला, उसमें से सैंकड़ों रंग-बिरंगी तितलियां निकल आईं। अपने चारों ओर इन सुंदर तितलियों को देखकर बच्चे मंत्रमुग्ध रह गए। अब तितलियों ने गाना शुरू कर दिया और बच्चों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मगर तभी एक चिड़िया विधाता के पास आई और बोली, 'आपने तो हमें रचते समय वादा किया था कि हर पंछी का अपना गीत होगा। अब आपने हमारा गीत इन नए प्राणियों को दे दिया! यह आपने अच्छा नहीं किया।" इस पर विधाता को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने तितलियों से गीत वापस ले लिया। तभी से रंग-बिरंगी तितलियां खामोश हैं मगर अपने सौंदर्य से संसार को लुभा रही हैं।
तितलियां भला किसका मन नहीं मोहतीं? उदासी की तपती दोपहरी में ये आनंद की शीतल बयार बनकर आती हैं। अपने छोटे-से जीवनकाल में ये चहुं ओर खुशियां बिखेर जाती हैं। संक्षिप्त जीवनकाल के बावजूद चीन में इन्हें लंबी आयु व स्वस्थ जीवन का प्रतीक माना जाता है। वहीं जापान में इन्हें दांपत्य सुख के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। मेक्सिको, आयरलैंड व रूस जैसे देशों में तितलियों को दिवंगत आत्माओं का प्रतिरूप माना जाता रहा है। ग्रीक दार्शनिक अरस्तू ने भी इन्हें 'आत्मा" कहकर संबोधित किया था। आयरलैंड में तितलियों को, खासकर सफेद तितलियों को मारना अपशकुन माना जाता है। सफेद तितलियों को दिवंगत बच्चों की आत्माएं कहा जाता है। मध्ययुगीन मेक्सिको की एजटेक संस्कृति में मान्यता थी कि परलोक में प्रसन्ना पूर्वजों की आत्माएं तितली बनकर अपने परिजनों से मिलने आती हैं। उनके स्वागत में घर में गुलदस्ते सजाए जाते थे। वहां गुलदस्तों को ऊपर की ओर से सूंघना वर्जित था। माना जाता था कि ऊपर से इन्हें सूंघने का अधिकार केवल पूर्वजों की आत्माओं, यानी तितलियों को है।
अमेरिकी आदिवासी मानते हैं कि यदि आप किसी तितली को नुकसान पहुंचाए बगैर उसे पकड़ते हैं और उसे अपनी मनोकामना बताकर छोड़ देते हैं, तो वह आपकी मनोकामना सीधे ईश्वर के पास पहुंचा देती है! तितलियों को लेकर शुभ-अशुभ संबंधी कई धारणाएं भी व्याप्त हैं। कई देशों में लोग मानते हैं कि अगर आप साल के पहले दिन सुबह-सुबह सफेद तितली देखें, तो आपका पूरा साल शुभ जाता है। वहीं एक समय ऐसा भी था, जब सफर पर निकल रहे नाविकों को यदि तितली दिखाई दे जाए, तो वे इसे अशुभ मानते हुए भयग्रस्त हो जाते थे कि वे सफर से जीवित नहीं लौटेंगे...!

Sunday, 13 January 2019

जिसके माथे पर लिखा हुआ है 'राजा"!


बाघ कोई साधारण प्राणी नहीं। मनुष्य ने उससे भय भी खाया है और उससे रिश्ता भी जोड़ा है। वह पशुओं का राजा सही, इंसान का तो 'भाई" है...!
***

बाघ और इंसान के बीच परस्पर भय व सम्मान का रिश्ता भी रहा है और सह-अस्तित्व का भी। वियतनाम की एक लोककथा में मानव व बाघ का जटिल रिश्ता सामने आता है। एक मछुआरा अपनी वृद्ध मां के साथ रहता था और नदी से मछलियां पकड़कर आजीविका कमाता था। वह रात में नदी में अपने जाल डाल आता और सुबह जाकर उनमें फंसी मछलियों को समेटकर बाजार में बेच आता। एक दिन जब वह नदी पर गया, तो देखा कि उसके जाल फाड़ दिए गए थे और उनमें कोई मछली नहीं थी। उसने अपने जाल फिर से बुने व शाम को नदी में डाल आया मगर अगली सुबह फिर उसे जाल फटे हुए मिले। यही सिलसिला जब दो-चार दिन लगातार चला, तो मछुआरे ने तय किया कि वह रात को नदी किनारे रुककर पता करेगा कि कौन यह हरकत कर रहा है। मगर अगली सुबह वह घर नहीं लौटा। लोगों को नदी किनारे उसकी लाश मिली। उसे देखकर स्पष्ट था कि उसे बाघ ने मौत के घाट उतारा है। उसकी मां का इकलौता सहारा चला गया। वह रोज उसकी कब्र पर जाती और आंसू बहाकर घर लौटती।
एक दिन घर लौटते हुए वृद्ध मां को रास्ते में एक बाघ मिल गया। उसने सीधे-सीधे बाघ से पूछ लिया, 'क्या तुम्हीं ने मेरे बेटे के प्राण लिए थे?" बाघ सिर झुकाकर चुपचाप खड़ा रहा। मछुआरे की मां ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए आगे प्रश्न किया, 'अब मेरा कौन सहारा होगा? कौन मेरी देखभाल करेगा? क्या तुम मेरे बेटे की तरह मेरा भरन-पोषण करोगे?" इस पर बाघ ने हल्के से अपने सिर हिलाया और चला गया। अगले दिन वृद्धा को अपने द्वार पर एक हिरण पड़ा मिला। वह समझ गई कि बाघ इसका शिकार कर यहां छोड़ गया है। उसने हिरण का कुछ मांस पकाकर खाया और बाकी बाजार में बेच आई। अब कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर बाघ उसके द्वार पर कोई शिकार छोड़ जाता। एक रात वह जागती रही और बाघ के आने पर उसे घर के भीतर बुलाया। अब वृद्धा और बाघ के बीच मां-बेटे का रिश्ता बन गया। दोनों एक-दूसरे की देखभाल करते। मृत्यु से पहले वृद्धा ने बाघ से वचन ले लिया कि अब वह कभी किसी मानव का शिकार नहीं करेगा। परंपरानुसार, साल के आखिरी महीने के आखिरी दिन लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को भोग लगाते थे और उन्हें मृत्युलोक में लौटकर कुछ पल साथ गुजारने की गुजारिश करते थे। गांव वालों ने देखा कि हर साल इस दिन उस वृद्धा की कब्र पर बाघ अपना कोई शिकार छोड़ जाता था...
बाघ को कई संस्कृतियों में जंगल का या पशुओं का राजा माना जाता है। चीन में तो उसे पशुओं का राजा मानने का खास कारण है। उसके माथे पर मौजूद धारियां चीनी लिपि में 'राजा" शब्द से मिलती-जुलती है। यानी उसके माथे पर ही लिखा है कि वह राजा है! चीन में यह मान्यता भी रही है कि बाघ अत्यंत दीर्घजीवी होता है। पांच सौ वर्ष की आयु प्राप्त करने पर वह श्वेत रंग को प्राप्त होता है और हजार वर्ष आयु का होने पर न केवल अमरत्व को प्राप्त होता है, बल्कि खुद को किसी भी जीव में परिवर्तित करने की शक्ति पा लेता है।
नगालैंड में सृष्टि के सृजन की कथा के अनुसार, जिलिमोसिरो (निर्मल जल) एक आदिम नारी थी। वह जब बरगद के पेड़ तले सो रही थी, तो बादल ने आकर उसे गर्भवती कर दिया। उसने तीन पुत्रों को जन्म दिया- देवता, मनुष्य व बाघ। इस प्रकार इंसान व बाघ आपस में भाई हुए।

Sunday, 30 December 2018

फल के बाहर आकर पछताया काजू बीज


यदि आप सर्दियों का लुत्फ लेते हुए काजू-बादाम खा रहे हैं, तो जरा इनसे जुड़े किस्सों का भी रसास्वादन कीजिए। ये किस्से दिलचस्प भी हैं और दार्शनिक भी।
***

काजू का बीज फल के भीतर होने के बजाए बाहर क्यों होता है? फिलिपीन्स की एक लोककथा ने इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है। इसके अनुसार, पहले काजू के बीज भी फल के भीतर ही हुआ करते थे। मगर भीतर वे खुद को बंधा हुआ महसूस करते थे। वे फल की कैद में बैठे-बैठे ही चिड़ियों का चहचहाना, नदियों की कलकल, बच्चों की किलकारियां, हवाओं की सरसराहट आदि सुना करते थे और सोचते थे कि कितना अच्छा होता यदि वे यह सब देख पाते! उन्हें अफसोस था कि वे बाहर की दुनिया तभी देख सकते हैं, जब कोई खाने के इरादे से उन्हें फल के बाहर निकाले। फिर कुछ ही पल में वे किसी के मुंह का निवाला बनते और सब कुछ खत्म...। काजू के बीजों ने इच्छा जताई कि काश हम फल के बाहर होेते! वन परी ने उनकी इच्छा सुनी और अपनी तिलस्मी शक्तियों से इसे साकार कर दिया।
अब काजू के बीज फल के बाहर लगने लगे। वे संसार के सौंदर्य को देखकर खुश थे। मगर जल्द ही वे तस्वीर के दूसरे रुख से भी दो-चार हुए। दोपहर में जब धूप तेज हुई, तो वे उसकी तपिश से परेशान हो गए। रात को जब कंपकंपा देने वाली सर्द हवाएं चलीं तो वे कांप उठे। उन्हें खुले में टंगा देखकर पक्षी उनका भक्षण करने के लिए लपकने लगे। उन्हें एहसास हुआ कि वे फल के भीतर ही अधिक सुरक्षित थे। तब उन्होंने वन परी से गुहार लगाई कि उन्हें वापस फल के भीतर कर दिया जाए मगर परी ने कह दिया कि तुम्हारी इच्छा पूरी की जा चुकी है, अब तुम जहां हो वहीं रहोगे। कहानी का संदेश संभवत: यही है कि प्रकृति ने जो जैसा बनाया है, उसके पीछे ठोस वजह है। उसके विपरीत जाने की कोशिश नहीं करना चाहिए।
मनुष्य की कल्पनाशक्ति के विस्तृत दायरे से काजू-बादाम जैसे सूखे मेवे भी बाहर नहीं हैं। इनके इर्द-गिर्द रचे गए किस्से-कहानियां मानो इनके स्वाद को और रुचिकर बना देते हैं। बादाम की उत्पत्ति को लेकर ग्रीस की एक दंतकथा कहती है कि फिलिस नामक राजकुमारी का प्रेमी अकामस युद्ध पर गया और नहीं लौटा। उसे यकीन हो गया कि अकामस युद्ध में मारा गया है। दुख के मारे उसने प्राण त्याग दिए। तब देवी एथेना ने फिलिस के प्रेम से द्रवित होकर उसे एक वृक्ष में तब्दील कर दिया। यही बादाम का वृक्ष है। फिलिस का प्रेमी अकामस मरा नहीं था। दस साल बाद जब वह लौटा और उस वृक्ष का आलिंगन किया, तो उस पर बहार आ गई। तभी से बादाम के वृक्ष को ग्रीस में प्रेम और आशा का प्रतीक माना जाता आया है।
आज भी ग्रीक शादियों में शकर चढ़े बादामों को विषम संख्या में छोटी-छोटी पोटलियों में बांधकर, चांदी की तश्तरी में रखकर परोसा जाता है। विषम संख्या का बंटवारा नहीं किया जा सकता और आशा की जाती है कि नवविवाहित जोड़े को भी कभी 'बांटा" नहीं जा सकेगा और वे सदा एक रहेंगे। बादाम में मीठे व कड़वे स्वाद का मिश्रण होता है। यह जीवन का प्रतीक है क्योंकि जीवन में भी आपको मीठे के साथ-साथ कड़वा भी मिलता है। उस पर शकर चढ़ाकर कामना की जाती है कि नवविवाहितों के जीवन में मीठे का अनुपात ज्यादा हो।
स्वीडन में क्रिसमस के अवसर पर चावल की एक प्रकार की खीर बनाने की परंपरा है। इसमें कुल जमा एक बादाम डाला जाता है। जिस किसी के हिस्से में यह बादाम आए, माना जाता है कि उसके लिए आने वाला साल शुभ रहेगा...