Sunday, 13 January 2019

जिसके माथे पर लिखा हुआ है 'राजा"!


बाघ कोई साधारण प्राणी नहीं। मनुष्य ने उससे भय भी खाया है और उससे रिश्ता भी जोड़ा है। वह पशुओं का राजा सही, इंसान का तो 'भाई" है...!
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बाघ और इंसान के बीच परस्पर भय व सम्मान का रिश्ता भी रहा है और सह-अस्तित्व का भी। वियतनाम की एक लोककथा में मानव व बाघ का जटिल रिश्ता सामने आता है। एक मछुआरा अपनी वृद्ध मां के साथ रहता था और नदी से मछलियां पकड़कर आजीविका कमाता था। वह रात में नदी में अपने जाल डाल आता और सुबह जाकर उनमें फंसी मछलियों को समेटकर बाजार में बेच आता। एक दिन जब वह नदी पर गया, तो देखा कि उसके जाल फाड़ दिए गए थे और उनमें कोई मछली नहीं थी। उसने अपने जाल फिर से बुने व शाम को नदी में डाल आया मगर अगली सुबह फिर उसे जाल फटे हुए मिले। यही सिलसिला जब दो-चार दिन लगातार चला, तो मछुआरे ने तय किया कि वह रात को नदी किनारे रुककर पता करेगा कि कौन यह हरकत कर रहा है। मगर अगली सुबह वह घर नहीं लौटा। लोगों को नदी किनारे उसकी लाश मिली। उसे देखकर स्पष्ट था कि उसे बाघ ने मौत के घाट उतारा है। उसकी मां का इकलौता सहारा चला गया। वह रोज उसकी कब्र पर जाती और आंसू बहाकर घर लौटती।
एक दिन घर लौटते हुए वृद्ध मां को रास्ते में एक बाघ मिल गया। उसने सीधे-सीधे बाघ से पूछ लिया, 'क्या तुम्हीं ने मेरे बेटे के प्राण लिए थे?" बाघ सिर झुकाकर चुपचाप खड़ा रहा। मछुआरे की मां ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए आगे प्रश्न किया, 'अब मेरा कौन सहारा होगा? कौन मेरी देखभाल करेगा? क्या तुम मेरे बेटे की तरह मेरा भरन-पोषण करोगे?" इस पर बाघ ने हल्के से अपने सिर हिलाया और चला गया। अगले दिन वृद्धा को अपने द्वार पर एक हिरण पड़ा मिला। वह समझ गई कि बाघ इसका शिकार कर यहां छोड़ गया है। उसने हिरण का कुछ मांस पकाकर खाया और बाकी बाजार में बेच आई। अब कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर बाघ उसके द्वार पर कोई शिकार छोड़ जाता। एक रात वह जागती रही और बाघ के आने पर उसे घर के भीतर बुलाया। अब वृद्धा और बाघ के बीच मां-बेटे का रिश्ता बन गया। दोनों एक-दूसरे की देखभाल करते। मृत्यु से पहले वृद्धा ने बाघ से वचन ले लिया कि अब वह कभी किसी मानव का शिकार नहीं करेगा। परंपरानुसार, साल के आखिरी महीने के आखिरी दिन लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को भोग लगाते थे और उन्हें मृत्युलोक में लौटकर कुछ पल साथ गुजारने की गुजारिश करते थे। गांव वालों ने देखा कि हर साल इस दिन उस वृद्धा की कब्र पर बाघ अपना कोई शिकार छोड़ जाता था...
बाघ को कई संस्कृतियों में जंगल का या पशुओं का राजा माना जाता है। चीन में तो उसे पशुओं का राजा मानने का खास कारण है। उसके माथे पर मौजूद धारियां चीनी लिपि में 'राजा" शब्द से मिलती-जुलती है। यानी उसके माथे पर ही लिखा है कि वह राजा है! चीन में यह मान्यता भी रही है कि बाघ अत्यंत दीर्घजीवी होता है। पांच सौ वर्ष की आयु प्राप्त करने पर वह श्वेत रंग को प्राप्त होता है और हजार वर्ष आयु का होने पर न केवल अमरत्व को प्राप्त होता है, बल्कि खुद को किसी भी जीव में परिवर्तित करने की शक्ति पा लेता है।
नगालैंड में सृष्टि के सृजन की कथा के अनुसार, जिलिमोसिरो (निर्मल जल) एक आदिम नारी थी। वह जब बरगद के पेड़ तले सो रही थी, तो बादल ने आकर उसे गर्भवती कर दिया। उसने तीन पुत्रों को जन्म दिया- देवता, मनुष्य व बाघ। इस प्रकार इंसान व बाघ आपस में भाई हुए।

Sunday, 30 December 2018

फल के बाहर आकर पछताया काजू बीज


यदि आप सर्दियों का लुत्फ लेते हुए काजू-बादाम खा रहे हैं, तो जरा इनसे जुड़े किस्सों का भी रसास्वादन कीजिए। ये किस्से दिलचस्प भी हैं और दार्शनिक भी।
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काजू का बीज फल के भीतर होने के बजाए बाहर क्यों होता है? फिलिपीन्स की एक लोककथा ने इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है। इसके अनुसार, पहले काजू के बीज भी फल के भीतर ही हुआ करते थे। मगर भीतर वे खुद को बंधा हुआ महसूस करते थे। वे फल की कैद में बैठे-बैठे ही चिड़ियों का चहचहाना, नदियों की कलकल, बच्चों की किलकारियां, हवाओं की सरसराहट आदि सुना करते थे और सोचते थे कि कितना अच्छा होता यदि वे यह सब देख पाते! उन्हें अफसोस था कि वे बाहर की दुनिया तभी देख सकते हैं, जब कोई खाने के इरादे से उन्हें फल के बाहर निकाले। फिर कुछ ही पल में वे किसी के मुंह का निवाला बनते और सब कुछ खत्म...। काजू के बीजों ने इच्छा जताई कि काश हम फल के बाहर होेते! वन परी ने उनकी इच्छा सुनी और अपनी तिलस्मी शक्तियों से इसे साकार कर दिया।
अब काजू के बीज फल के बाहर लगने लगे। वे संसार के सौंदर्य को देखकर खुश थे। मगर जल्द ही वे तस्वीर के दूसरे रुख से भी दो-चार हुए। दोपहर में जब धूप तेज हुई, तो वे उसकी तपिश से परेशान हो गए। रात को जब कंपकंपा देने वाली सर्द हवाएं चलीं तो वे कांप उठे। उन्हें खुले में टंगा देखकर पक्षी उनका भक्षण करने के लिए लपकने लगे। उन्हें एहसास हुआ कि वे फल के भीतर ही अधिक सुरक्षित थे। तब उन्होंने वन परी से गुहार लगाई कि उन्हें वापस फल के भीतर कर दिया जाए मगर परी ने कह दिया कि तुम्हारी इच्छा पूरी की जा चुकी है, अब तुम जहां हो वहीं रहोगे। कहानी का संदेश संभवत: यही है कि प्रकृति ने जो जैसा बनाया है, उसके पीछे ठोस वजह है। उसके विपरीत जाने की कोशिश नहीं करना चाहिए।
मनुष्य की कल्पनाशक्ति के विस्तृत दायरे से काजू-बादाम जैसे सूखे मेवे भी बाहर नहीं हैं। इनके इर्द-गिर्द रचे गए किस्से-कहानियां मानो इनके स्वाद को और रुचिकर बना देते हैं। बादाम की उत्पत्ति को लेकर ग्रीस की एक दंतकथा कहती है कि फिलिस नामक राजकुमारी का प्रेमी अकामस युद्ध पर गया और नहीं लौटा। उसे यकीन हो गया कि अकामस युद्ध में मारा गया है। दुख के मारे उसने प्राण त्याग दिए। तब देवी एथेना ने फिलिस के प्रेम से द्रवित होकर उसे एक वृक्ष में तब्दील कर दिया। यही बादाम का वृक्ष है। फिलिस का प्रेमी अकामस मरा नहीं था। दस साल बाद जब वह लौटा और उस वृक्ष का आलिंगन किया, तो उस पर बहार आ गई। तभी से बादाम के वृक्ष को ग्रीस में प्रेम और आशा का प्रतीक माना जाता आया है।
आज भी ग्रीक शादियों में शकर चढ़े बादामों को विषम संख्या में छोटी-छोटी पोटलियों में बांधकर, चांदी की तश्तरी में रखकर परोसा जाता है। विषम संख्या का बंटवारा नहीं किया जा सकता और आशा की जाती है कि नवविवाहित जोड़े को भी कभी 'बांटा" नहीं जा सकेगा और वे सदा एक रहेंगे। बादाम में मीठे व कड़वे स्वाद का मिश्रण होता है। यह जीवन का प्रतीक है क्योंकि जीवन में भी आपको मीठे के साथ-साथ कड़वा भी मिलता है। उस पर शकर चढ़ाकर कामना की जाती है कि नवविवाहितों के जीवन में मीठे का अनुपात ज्यादा हो।
स्वीडन में क्रिसमस के अवसर पर चावल की एक प्रकार की खीर बनाने की परंपरा है। इसमें कुल जमा एक बादाम डाला जाता है। जिस किसी के हिस्से में यह बादाम आए, माना जाता है कि उसके लिए आने वाला साल शुभ रहेगा...

जिनके पांव जमीं पर नहीं पड़ते...!


धरती पर पांव रखे रहना यदि मनुष्य होने की निशानी है, तो देवता माना जाने वाला राजा जमीन पर कैसे पैर रखे...? और यदि धरती से ही शक्ति प्राप्त हो, तो भला कोई इसके स्पर्श से दूर क्यों रहना चाहे...? धरती और इंसान के बीच बड़ा अनोखा संबंध है।
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प्रशांत महासागर के छोटे-से देश टोंगा में राजा को अर्द्ध दैवीय दर्जा प्राप्त रहा है। यूं तो अनेक देशों में राजा को दैवीय शक्तियों से लैस, ईश्वर तुल्य या फिर साक्षात ईश्वर मानने का रिवाज रहा है। इसके साथ ही उन्हें भांति-भांति के विशेषाधिकारों से लैस किया जाता रहा है। टोंगा के राजा को चूंकि मनुष्य से ऊंचा दर्जा दिया गया है, सो माना जाता है कि उनके पैर साधारण मनुष्यों की भांति धरती को स्पर्श नहीं करने चाहिए। टोंगा स्थित प्राचीन तलाईतुमु किले के बीचो-बीच एक ऊंचा मंच बना हुआ है, जिस पर राजा विशेष अवसरों पर कुछ खास अनुष्ठान किया करते थे। इसके आसपास जमीन से ऊपर उठे हुए पैदल रास्ते बनाए गए हैं, जिन पर चलने का अधिकार केवल राजा को था।
यह मजेदार है कि जिस धरती से जीवन निकला, राजा को उससे भी ऊपर मान लिया जाए। गोया राजा के पांव जमीन पर टिकना उसकी शान के खिलाफ हो! या फिर शायद इसके जरिए यह दिखाया जाता हो कि देव-तुल्य राजा सारे जमीनी पचड़ों से ऊपर है। जमीन या कहें धरती से मानव का खास रिश्ता है। वह धरती पर ही जन्मा, उसी पर अपना जीवन गुजारता है। धरती को मां का दर्जा अनेक संस्कृतियों में दिया गया है। इसके साथ ही इंसान जमीन को लेकर कई तरह के अनुष्ठान विभिन्ना अवसरों पर करता आया है और यह सिलसिला आज भी कायम है। यह तो हुआ मनुष्य व धरती के रिश्ते का आध्यात्मिक पहलू। भौतिक पहलू की बात करें, तो जमीन के मालिकाना हक को लेकर इंसान सदियों से मरने-मारने पर उतारू होता आया है। न जाने कितने युद्ध इसी आधिपत्य के लिए लड़े गए। राजाओं के लिए यह आम था कि वे जमीन के साथ-साथ उस पर मौजूद हर चीज पर अपना स्वामित्व मानकर चलते थे। मगर जब राजा पर 'ईश्वरत्व" या 'देवत्व" सवार हो, तो वह खुद को इसी धरती से ऊपर भी मान सकता है। आखिर ईश्वर और देवी-देवताओं को भी पृथ्वीवासी नहीं माना गया है। राजा आकाश में स्थित किसी लोक में भले न रह पाए, धरती पर पैर न रखकर खुद को धरतीवासियों से अलग तो जता ही सकता है!
उधर इंडोनेशिया के बाली द्वीप में लोग मानते हैं कि मनुष्य दैवी लोक से जन्म लेकर धरती पर आता है। जन्म के बाद पहले 105 दिन तक उसमें देवत्व के अंश मौजूद रहते हैं। इसीलिए शिशु के 105 दिन का होने तक उसके पैर जमीन को छूने नहीं दिए जाते। इस दौरान उसे देवता-तुल्य माना जाता है।
ग्रीक मान्यताओं में एंटियस को समुद्र व धरती की संतान माना गया है। ऐसा कहा जाता था कि धरतीपुत्र होने के नाते वह धरती, यानी अपनी माता से ही शक्ति पाता था। वह अपने सामने से गुजरने वाले लोगों को दंगल की चुनौती देता था। चूंकि उसे धरती मां से लगातार शक्ति प्राप्त होती रहती थी, सो उसे हराना असंभव था। वह अपने प्रतिद्वंद्वी को न केवल परास्त कर देता था, बल्कि उसके प्राण भी हर लेता था। अपने द्वारा मारे गए लोगों की खोपड़ियों से उसने अपने पिता का मंदिर भी बना डाला था। एक दिन उसने अपने इलाके से गुजर रहे योद्धा हेराक्लिज को दंगल के लिए ललकारा। दंगल शुरू हुआ और हेराक्लिज ने थोड़ी ही देर में जान लिया कि एंटियस को जमीन पर पटककर चित्त नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी शक्ति का तो स्रोत ही धरती है। सो हेराक्लिज ने एंटियस को अपने बलशाली बाजुओं में भींच लिया और उसे जमीन से ऊपर उठाकर, तब तक भींचे रखा, जब तक कि उसने दम नहीं तोड़ दिया। धरती पर पांव न पड़ना एंटियस को भारी पड़ गया।

Tuesday, 27 November 2018

अविश्वास की विभाजन रेखा खींचती अग्नि


अग्नि जीवन का पोषण भी करती है और संहार भी। उसके इन दोनों रूपों से परिचित होते हुए ही मनुष्य ने उसे सदा से अपने जीवन का हिस्सा बनाया है। इससे कई रोचक मिथक व परंपराएं उपजी हैं।
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दक्षिणी अफ्रीका की सान जनजाति के लोग मानते हैं कि पहले-पहल जीवन जमीन के ऊपर नहीं, बल्कि इसके नीचे पनपता था। मनुष्य वहां सारे पशु-पक्षियों के साथ शांति से रहते थे। सब एक-दूसरे को समझते थे और मिल-जुलकर बसर करते थे। स्वयं ईश्वर भी वहीं निवास करते थे। वहां सूरज तो नहीं था लेकिन प्रकाश व ऊष्मा हर समय मौजूद रहती थी। फिर ईश्वर ने सोचा कि क्यों न जमीन के ऊपर भी एक दुनिया बसाई जाए। उन्होंने एक विशाल वृक्ष रचा, जिसकी शाखाएं पूरी धरती पर छा गईं और इसके बाद बाकी सारी चीजें रचीं, जो हम आज देखते हैं। अब उन्होंने भूमिगत संसार में रह रहे मनुष्यों व पशु-पक्षियों को ऊपर बुला लिया। नया संसार देखकर सभी खुशी से झूम उठे। ईश्वर ने सबको हिदायत दी कि वे पहले की ही तरह यहां भी मिल-जुलकर रहें, एक-दूसरे की बात सुनें व एक-दूसरे की कद्र करें। साथ ही उन्होंने मनुष्यों कोे विशेष हिदायत दी कि तुम किसी भी हाल में अग्नि प्रज्वलित नहीं करोगे। इतना कहकर ईश्वर चले गए।
अब हुआ यूं कि दिन में तो सूरज के प्रकाश व ऊष्मा से सब प्रसन्नाचित्त रहे मगर जब शाम को सूरज ढला, तो मनुष्यों को अंधेरे और उससे भी अधिक ठंड ने परेशान करना शुरू कर दिया। पशु-पक्षी अपने शरीर की बनावट की बदौलत ठंड से बच गए लेकिन मनुष्य परेशान होते रहे। यह सिलसिला रात-दर-रात चलता रहा। धीरे-धीरे मनुष्यों को पशु-पक्षियों से ईर्ष्या होने लगी। आखिर एक रात मनुष्यों ने तय कर लिया कि वे खुद को गर्म रखने के लिए आग जलाएंगे। ईश्वर के आदेश की अवहेलना करते हुए उन्होंने अग्नि प्रज्वलित कर दी। इससे वे तो ऊष्मा पाकर प्रसन्ना हो गए लेकिन सारे पशु-पक्षी आग से डरकर इधर-उधर भाग उठे। कोई पहाड़ों पर चला गया, कोई गुफाओं में जा छुपा, तो कोई पेड़ों की ऊंची शाखों पर बस गया। अग्नि ने मनुष्यों व शेष जीव जगत के बीच विभाजन रेखा खींच दी। तभी से मनुष्य अभिशप्त है कि पशु-पक्षी उस पर विश्वास नहीं करेंगे।
अग्नि प्रकृति के मूल तत्वों में से एक है और इसके बिना जीवन संभव नहीं। मगर अफ्रीका की यह कथा उसी अग्नि को नकारात्मक रूप में दर्शाती है, इसीलिए अपने आप में अनूठी है। एक और खास बात यह है कि इसमें मनुष्य पहले ही से अग्नि से परिचित था और इसे प्रज्वलित करने की विधि उसे ज्ञात थी। जबकि अधिकांश स्थानों के मिथकों में हमें यही सुनने को मिलता है कि कैसे मनुष्य का अग्नि से परिचय हुआ और उसने इसे अपनाया। ऐसे अधिकांश मिथकों में चोरी का जिक्र आता है। कभी मनुष्य कहीं से अग्नि चुरा लाता है, तो कभी कोई पशु-पक्षी उसके लिए इसे चुरा लाता है।
जापानी पौराणिक कथाओं के अनुसार, अग्नि के देवता कागुत्सुची को जन्म देते हुए उनकी माता इजानामी भस्म हो गईं। इस पर उनके पिता इजानागी ने क्रुद्ध होकर अपनी तलवार से कागुत्सुची के जिस्म के आठ टुकड़े कर दिए। ये आठ टुकड़े आठ ज्वालामुखी बन गए। इजानागी की तलवार से जो खून टपका, उसकी हर बूंद से एक-एक देवता प्रकट हुए। इस प्रकार अग्नि का प्राकट्य देवताओं के जन्म से जुड़ा हुआ है।
अग्नि को लेकर कई तरह के रिवाज और परंपराएं भी चली आई हैं। मसलन, प्रशांत महासागर के कुछ द्वीपों में घर के चूल्हे के पास एक वृद्ध महिला की नन्ही मूर्ति रखी जाती है। इसे अग्नि की पहरेदार माना जाता है और कहते हैं कि यह सुनिश्चित करती है कि चूल्हा सदा जलता रहे। योरप के कुछ हिस्सों में कभी ऐसा माना जाता था कि यदि घर में अग्नि ठीक से नहीं जल पा रही, तो जरूर शैतान आसपास मंडरा रहा है। इंग्लैंड में कुछ लोग अग्नि की लपटों का अध्ययन करके भविष्य बताने का दावा करते थे। और हां, जापान में बच्चों को चेताया जाता है कि अगर वे आग से खेलेंगे, तो जीवन भर बिस्तर गीला करते रहेंगे...!

नींद न आए, तो समझ जाओ कि...!


क्या संसार के रचयिता ने नींद के आगोश में तमाम जीव-जंतुओं की रचना कर डाली? क्या विस्मृति की नदी वाली अंधेरी गुफा में वास करते हैं निद्रा देव? क्यों तगड़ी दावत उड़ाकर पीठ के बल सोने से चैन की नींद नसीब नहीं होती...?
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अमेरिका के एबेनाकी आदिवासी समुदाय के लोग सृष्टि के निर्माण की कहानी कुछ यूं सुनाते हैं कि एक बार ईश्वर ने जब अपने आसपास देखा तो पाया कि न कोई रंग था, न ध्वनि, न प्रकाश था और न किसी प्रकार की हलचल। उन्होंने तय किया कि वे जीवन से धड़कने वाला संसार बनाएंगे। उन्होंने समुद्र में रहने वाले विशाल कछुए को बुलाया और आदेश दिया कि वह अपनी पीठ को धरती बना दे। फिर उन्होंने उसकी पीठ पर पहाड़, मैदान व खाइयां रच डालीं। साथ ही आसमान को नीला कर उसमें सफेद बादल उड़ा दिए। इसके बाद बारी आई इस नए रचे गए संसार में प्राणियों को लाने की। ईश्वर बहुत देर तक विचार करते रहे कि किस-किस प्रकार के प्राणी रचे जाएं। वे कुछ तय नहीं कर पा रहे थे और सोचते-सोचते उनकी नींद लग गई। नींद में उन्होंने सपना देखा, जिसमें उन्हें अजीब-अजीब जीव-जंतु नजर आए। कोई चार पैरों पर चल रहा था, तो कोई जमीन पर रेंग रहा था। कोई हवा में उड़ रहा था, तो कोई पानी मंे तैर रहा था। ये भांति-भांति की ध्वनियां उत्पन्ना कर रहे थे। कोई आपस में मिल-जुलकर रह रहे थे, तो कोई लड़ रहे थे। ईश्वर नींद से जागे, तो सोचने लगे कि ऐसे अजीबोगरीब प्राणी हर्गिज हो नहीं सकते। मगर यह क्या! उन्होंने अपने आसपास देखा तो पाया कि चारों ओर ठीक वैसे ही प्राणी विचर रहे थे, जैसे उन्होंने सपने में देखे थे। उन्होंने नींद में ही, अपने स्वप्न के माध्यम से सारे प्राणियों की रचना कर डाली थी!
इस प्रकार एबेनाकी समुदाय मानता है कि संसार का आबाद होना नींद का ही सुपरिणाम है। एक तरह से यह नींद की वांछनीयता ही नहीं, अनिवार्यता को भी रेखांकित करता है। आज विज्ञान मानता है कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए नींद अनिवार्य है। इसके बगैर जिया नहीं जा सकता। यह नींद के महत्व की स्वीकारोक्ति ही है कि विभिन्ना संस्कृतियों की पौराणिक कथाओं, जनश्रुतियों आदि में नींद से जुड़े कथानक मिलते हैं। प्राचीन ग्रीस में हिप्नॉस को नींद का देवता माना जाता था। वे रात्रि की देवी और अंधकार के देवता के पुत्र व मृत्यु के देवता के भाई थे। गौर कीजिए, यहां नींद का संबंध रात्रि व अंधकार के साथ-साथ मृत्यु से भी जोड़ा गया है, जोकि चिरनिद्रा है। यह भी कहा जाता है कि हिप्नॉस एक अंधेरी गुफा में निवास करते हैं, जिसमें से विस्मृति की नदी निकलती है।
नींद को लेकर कई गुत्थियां मानव मन को विस्मित करती रही हैं। इन गुत्थियों के पीछे तर्क तलाशते हुए उसने दिलचस्प धारणाएं गढ़ डालीं। ब्राजील में कहा जाता है कि यदि आप ठूंस-ठूंसकर खाने के बाद पीठ के बल सो जाते हैं, तो पीसादीरा नामक चुड़ैल आपकी छाती पर आ बैठेगी! दुबली-पतली, छोटे कद की पीसादीरा की नाक लंबी व आंखें लाल हैं। उसके लंबे, पीले नाखून, नुकीले दांत व हरे रंग का मुंह उसे और भी डरावना बनाते हैं। जब वह किसी की छाती पर आ बैठती है, तो व्यक्ति हड़बड़ाकर जाग जाता है और उसे देखकर सन्ना रह जाता है। वह चाहते हुए भी न हाथ-पांव हिला सकता है और न ही कुछ बोल पाता है। उसका दम घुटने लगता है। ऐसे में या तो पीसादीरा तब तक डटी रह सकती है, जब तक व्यक्ति दम घुटने से मर न जाए या फिर वह अचानक उठकर जा सकती है, जिसके बाद व्यक्ति धीरे-धीरे पूरी तरह जागृत अवस्था में आएगा और उसे इस पूरे मामले की बहुत धुंधली-सी याद ही रहेगी।
चलते-चलते जापान में प्रचलित एक मजेदार धारणा के बारे में भी जान लें। वहां कहा जाता है कि अगर रात को आपको देर तक नींद नहीं आ रही, तो समझ जाइए कि आप किसी के सपने में जाग रहे हैं..!

Sunday, 28 October 2018

जब तोप से दागे गए पनीर के गोले!


पनीर को कभी दैवीय देन माना गया था। इसका उपयोग भोजन के अलावा युद्ध में भी हुआ है और शादी को न्योतों में भी। यहां तक कि बैंकिंग में भी इसका उपयोग है!
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क्रोएशिया के तटीय इलाके में हाल ही में 7,200 वर्ष पुराने मिट्टी के बर्तनों में पनीर के अंश पाए गए हैं। इसे अब तक विश्व में कहीं भी पाया गया पनीर का सबसे पुराना नमूना माना जा रहा है। साथ ही, इससे पता चला है कि पनीर का इतिहास जितना पुराना माना जाता आया है, उससे कहीं अधिक पुराना है। इस प्रकार यह दुग्ध उत्पाद मनुष्यों के सबसे पुराने आहारों में से एक कहा जा सकता है। खास तौर पर ठंडे देशों में इसकी लोकप्रियता का लंबा इतिहास मिलता है। ग्रीक पौराणिक कथाओं में तो कहा गया है कि सूर्य, प्रकाश, संगीत व काव्य के देवता अपोलो तथा राजकुमारी सायरीनी के पुत्र एरिस्टियस ने मनुष्यों को पनीर बनाने की कला दी थी। जाहिर है, 'दैवीय देन" होने के नाते इसका ग्रीक समाज में खास स्थान रहा। ... या फिर यह भी कह सकते हैं कि इसके खास स्थान को देखते हुए इसे दैवीय देन का दर्जा दिया गया। बताया तो यह भी जाता है कि प्राचीन ग्रीस में देवताओं को भोग के रूप में, अन्य पदार्थों के अलावा पनीर अर्पित किया जाता था।
मजेदार बात यह है कि पनीर का उपयोग हमेशा केवल खाद्य पदार्थ के रूप में ही होता आया हो, ऐसा भी नहीं है। इसके कुछ अन्य उपयोग बड़े ही दिलचस्प रहे हैं। मसलन, 1865 में ब्राजील और उरुग्वे के बीच युद्ध चल रहा था। दोनों देशों की नौसेनाएं एक-दूसरे पर बारूद के गोले बरसा रही थीं। अचानक उरुग्वे के जंगी जहाज के कमांडर को बताया गया कि जहाज पर गोले खत्म हो गए हैं। अब दुश्मन सेना का मुकाबला कैसे किया जाए? कमांडर ने दिमाग लगाया और तय किया कि बारूद के गोले खत्म हो गए हैं, तो किसी अन्य वस्तु को गोलों के रूप में दागा जाए। तलाश की गई कि जहाज पर ऐसी कौन-कौन-सी वस्तुएं हैं, जिनका ऐसा उपयोग किया जा सकता है। जब उन्हें बताया गया कि जहाज की रसोई में बासी व सख्त हो चुका पनीर मौजूद है, तो कमांडर ने आदेश दिया कि इस पनीर के ही गोले बनाए जाएं और इन्हें तोपों में भरकर दागा जाए। इसे खेल मत समझिए, यह तरकीब कारगर भी रही। पहले दो गोले तो निशाना चूक गए लेकिन तीसरा गोला दुश्मन जहाज के मस्तूल से टकराकर बिखर गया और इसके दो नुकीले, सख्त टुकड़ों ने दो दुश्मन सैनिकों के प्राण हर लिए!
पनीर को घातक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने की एक मिसाल एक आइरिश पौराणिक कथा में भी मिलती है। इसमें मेव नामक रानी का जिक्र है, जिसके पिता ने उसकी शादी कोंकोबार नामक राजा से कर दी थी। मगर मेव की अपने पति से नहीं निभी और वह उसे छोड़ गई। तब मेव के पिता ने अपनी ही एक अन्य पुत्री एथिन को कोंकोबार से ब्याह दिया। मगर क्रूर मेव ने अपनी ही बहन को मार डाला, जिससे एथिन का पुत्र फरबेड मां की ममता से वंचित हो गया। बरसों बाद, जब फरबेड युवा हो चुका था, तो उसने अपनी मौसी से मां की हत्या का प्रतिशोध लिया। मेव प्रतिदिन एक झील पर नहाने जाया करती थी। फरबेड ने एक खास गुलेल तैयार की और झाड़ियों के पीछे से उस दूरी पर पत्थर मारने का अभ्यास करने लगा, जहां मेव नहाया करती थी। उसका निशाना अचूक हो चला था और आखिर उसने अपने प्रतिशोध को पूर्णता देने कर ठान ली। मगर उस दिन मेव नियत समय से कुछ पहले ही झील पर नहाने पहुंच गई। फरबेड के पास पत्थर नहीं था मगर हाथ में पनीर था, जिसे वह खा रहा था। सो उसने कठोर पनीर के उस टुकड़े को ही गुलेल पर लगाकर निशाना साधा। पनीर सीधे मेव के सिर पर लगा और वह वहीं ढेर हो गई।
ऐसा नहीं है कि पनीर का उपयोग हिंसक कार्यों में ही होता हो। प्राचीन ग्रीस में शादी के निमंत्रण के साथ पनीर से बनी मिठाइयां भेजने के रिवाज के प्रमाण मिले हैं। यही नहीं, इटली में क्रेडिटो एमिलियानो नामक बैंक है, जो इस मायने में अनूठा है कि वह उस इलाके में बनने वाले बेशकीमती पनीर को गिरवी रखने के बदले ऋण देता है! इस पनीर को खास वातावरण में सुरक्षित रखने की जरूरत होती है, जिसके लिए बैंक ने विशेष वेयरहाउस बना रखा है।

क्यों लंबी हुई शुतुरमुर्ग की गर्दन?


शुतुरमुर्ग ने भले ही कभी उड़ान न भरी हो, मगर उसके आकार व अन्य विचित्रताओं ने मनुष्य की कल्पनाओं से खूब उड़ानें भरवाई हैं। इसे लेकर व्याप्त धारणाएं व किस्से बड़े रोचक हैं।
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कुछ मिथक इस कदर जनमानस में पैठ कर जाते हैं कि हम इन्हें निर्विवाद तथ्य मान लेते हैं। ऐसा ही एक मिथक शुतुरमुर्ग से जुड़ा है। वह यह कि किसी खतरे या अप्रिय स्थिति को देखकर शुतुरमुर्ग अपना सिर जमीन में गाड़ देता है। वह सोचता है कि इससे आसन्ना खतरा या अप्रिय स्थिति टल जाएगी। इसी के चलते, कड़वी हकीकत से मुंह फेरने वाले व्यक्ति को शुतुरमुर्ग प्रवृत्ति का कहा जाता है। जबकि तथ्य यह है कि शुतुरमुर्ग ऐसा कुछ करता ही नहीं। दरअसल, मादा शुतुरमुर्ग अपने अंडे घोंसले में देने के बजाए जमीन में बनाए गए गड्ढों में देती है। वह दिन में कई बार इन अंडों को उलटती-पलटती है। इस दौरान, देखने वाले को भ्रम हो सकता है कि वह अपना सिर जमीन में गाड़ रही है। वैसे भी, शुतुरमुर्ग का सिर काफी छोटा होता है, सो यदि वह सिर झुकाए खड़ा हो, तो यह भ्रम होना मुश्किल नहीं है कि उसका सिर जमीन के अंदर है।
शुतुरमुर्ग की खासियत यह है कि यह सबसे बड़ा जीवित पक्षी है और उड़ने से लाचार है। इस कारण अफ्रीकी मूल का होते हुए भी यह दुनिया भर में प्रसिद्ध है। साथ ही कई तरह के मिथकों और असत्य धारणाओं का विषय भी। कहते हैं कि प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक अरस्तू ने शुतुरमुर्ग के विशाल आकार को देखते हुए इसे पक्षी मानने से ही इनकार कर दिया था। उनका मानना था कि यह आधा पक्षी व आधा पशु है! मध्य-पूर्व की प्राचीन संस्कृति में लोग इसे दुष्ट प्राणी मानते थे। वे इसका संबंध सृष्टि से पहले व्याप्त रहे अंधकार व अस्त-व्यस्तता की देवी तियामत से जोड़ते थे। वहीं प्राचीन मिस्र में इसका खासा धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व था। इसका संबंध सत्य व न्याय की देवी मात से जोड़ा जाता था। इसीलिए इसके पंख को भी सत्य का प्रतीक माना गया। बाद के दौर में शुतुरमुर्ग के पंख कई संस्कृतियों में श्रेष्ठि वर्ग के श्र्ाृंगार का हिस्सा बने।
शुतुरमुर्ग की लंबी गर्दन को लेकर अफ्रीका में एक मजेदार लोककथा चली आई है। इसके अनुसार, बहुत पहले शुतुरमुर्ग की गर्दन छोटी हुआ करती थी। एक बार नर शुतुरमुर्ग ने अंडे सेने में मादा का हाथ बंटाने का प्रस्ताव रखा। तय हुआ कि दिन में मादा यह जिम्मेदारी निभाएगी और रात में नर। मगर एक रात अचानक अपनी पत्नी की खिलखिलाहट भरी हंसी सुनकर शुतुरमुर्ग के कान खड़े हो गए। उसने सिर उठाकर देखा तो पाया कि उसकी पत्नी एक अन्य सजीले नर शुतुरमुर्ग के साथ चांदनी रात में, दीमक के टीलों के बीच लुका-छिपी खेल रही है! जाहिर है, इस बेवफाई पर उसका पारा चढ़ गया मगर वह अंडों को छोड़कर नहीं जा सकता था। सो वहीं बैठा-बैठा, अपनी गर्दन लंबी कर-करके देखने की कोशिश करता रहा कि दीमक के टीलों के बीच क्या चल रहा है। सारी रात यूं ही बीत गई। सुबह जब बेवफा मादा अंडों के पास लौटी, तो गुस्से में आग-बबूला हो रहा शुतुरमुर्ग उठ खड़ा हुआ। अचानक उसे अपनी गर्दन में कुछ अजीब-सा लगा। जब उसने अपने पैरों की ओर देखा, तो पाया कि वे उसके सिर से बहुत दूर हो गए हैं। तब उसे समझ में आया कि रात भर गर्दन तानकर पत्नी की हरकतों पर नजर रखने के चलते उसकी गर्दन इतनी लंबी हो गई है। बस, तभी से शुतुरमुर्गों की गर्दन लंबी रहने लगी।