Sunday, 9 September 2018

पत्थर पर दर्ज चेतावनियां


पुरातन शिलालेख केवल राजे-महाराजों के गुणगान या नियम-कायदे गिनाने तक सीमित नहीं थे। कहीं-कहीं ये प्राकृतिक आपदा से बचाने वाले संकेतकों का भी काम करते आए हैं।
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हाल ही में योरप में पड़ी भीषण गर्मी के चलते जब कई नदियों का जलस्तर काफी नीचे चला गया, तो कुछ अनोखे पुरातन शिलालेख प्रकट हुए। इन पर लिखी इबारत एक प्रकार से लोगों को आगाह करती है कि अब सूखे का खतरा मंडरा रहा है। दरअसल यह अतीत में पड़े सूखे के दौरान पत्थरों पर दर्ज चेतावनियां हैं। जिस प्रकार आज हम नदियों में 'खतरे का निशान" पाते हैं, जिसके ऊपर पानी आने से बाढ़ का खतरा होता है, उसी प्रकार ये शिलालेख जताते थे कि इस स्तर के नीचे पानी जाने से सूखे का खतरा रहेगा। यह तब की बात है, जब योरपीय समाज बस इतना अन्ना उगा लेता था कि जीवन निर्वाह हो जाए। ऐसे में सूखा पड़ने पर जीवन संकट में पड़ जाता था। इसलिए उस दौर के लोग आने वाली पीढ़ियों के लिए सूखे की पूर्व चेतावनी के तौर पर ये शिलालेख छोड़ गए। इन्हें सूखे के पत्थर या भूख के पत्थर भी कहा जाता है क्योंकि इनके प्रकट होने पर भूख का खतरा मंडराने लगता था।
इन शिलालेखों पर चेतावनी अलग-अलग अंदाज में लिखी गई है। मसलन, जर्मनी व चेक गणराज्य की सीमा पर पाए गए ऐसे ही एक शिलालेख पर लिखा है, 'जब तुम मुझे देखो, तो रोओ।" संदेश स्पष्ट है कि जब नदी का पानी इतना नीचे चला जाए कि यह शिलालेख दिखने लगे, तो संकट आसन्ना है। ऐसे कुछ शिलालेखों पर वे सन् भी अंकित हैं, जब-जब जल स्तर नीचे गया और ये प्रकट हुए थे। कुछ पर लिखने वालों के हस्ताक्षर भी हैं। आज योरप इतना संपन्ना हो चुका है कि एकाध साल के सूखे से उसकी अर्थव्यवस्था पर भले ही थोड़ा फर्क पड़े लेकिन जीवन-मृत्यु का मामला नहीं बनता। इसलिए अब जब भी ये शिलालेख प्रकट होते हैं, तो एक प्रकार से पर्यटकों के लिए आकर्षण भर रहते हैं। ये जताते हैं कि बीते दौर में पत्थरों पर दर्ज शब्द केवल किसी राजा का महिमागान ही नहीं करते थे या राजसी अथवा धार्मिक नियम-कायदों की सूची ही नहीं दर्शाते थे। ये आम जन की जीवन रक्षा के लिए महत्वपूर्ण संकेतक का काम भी करते थे। साथ ही अतीत में आई प्राकृतिक विपदा के स्मारक भी बनते थे।
उधर जापान में समुद्रतट से लगे इलाकों में जगह-जगह पर सुनामी संबंधी चेतावनियां देने वाले शिलालेख खड़े मिलते हैं। इन पर कुछ इस प्रकार की इबारत लिखी होती है- 'भीषण सुनामियों को याद करो। इस बिंदु से निचले स्तर पर अपने मकान मत बनाओ।" जापान भूकंप प्रवण क्षेत्र है और कभी-कभी इन भूकंपों के कारण यहां सुनामी भी आती है। ऐसे में समुद्र की कातिल लहरों से बचने के लिए ऊंचाई वाले स्थान पर चले जाना ही बचाव का उपाय होता है। समझदारी इसी में है कि एक निश्चित स्तर से अधिक ऊंचाई पर ही लोग बसें। ये 'सुनामी पत्थर" बताते हैं कि अमुक ऊंचाई से नीचे सुनामी का खतरा रहेगा, इसलिए इसके नीचे बसाहट न हो।
पत्थर पर दर्ज ये चेतावनियां सदियों पुरानी हैं मगर आज भी अपनी जगह पर मुस्तैदी से डटी हैं। ये जीवन की नश्वरता व प्रकृति के सर्वशक्तिमान होने का आभास लगातार कराती हैं। साथ ही पूर्वजों में मौजूद, आने वाली पीढ़ियों के कुशलक्षेम की चिंता को भी दर्शाती हैं।

Sunday, 2 September 2018

खरगोश ने सिखाया सिंह को दहाड़ना!


सिंह को न सिर्फ जंगल के राजा का खिताब मिला है, बल्कि कई राजवंशों ने इसे अपना प्रतीक भी बनाया है। मगर क्या यह संभव है कि उसकी दहाड़ के पीछे नन्हे-से खरगोश की करामात है...?
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खूंखार शिकारी पशुओं के प्रति भय व 'परिस्थितिजन्य" सम्मान का भाव होना स्वाभाविक ही है। प्राणी जगत के शेष सदस्यों के साथ ही मनुष्यों ने भी यह भय व सम्मान पाला है। इन्हीं शिकारी पशुओं में शामिल है सिंह या बब्बर शेर, जिसे अनेक संस्कृतियों में जंगल के राजा का खिताब दिया गया है। शारीरिक बल के अलावा जो चीज सिंह को अन्य पशुओं से अलग करती है, वह है इसके चेहरे के आसपास लहराते बाल। ये इसकी शख्सियत को एक अनूठी 'गरिमा" देते हैं और आपको चेतावनी देते हैं कि आप इन जनाब को हल्के में कतई न लें।
मानव ने सिंह को हल्के में तो नहीं ही लिया। तमाम प्राचीन संस्कृतियों ने इसे भौतिक ताकत व राजनीतिक सत्ता के प्रतीक के रूप में अपनाया। कहीं यह राजसत्ता का प्रतीकचिह्न बना, तो कहीं इसे शासक के रक्षक के तौर पर प्रतिष्ठित किया गया। यहां तक कि कहीं-कहीं तो राजा को ही सिंह के रूप में चित्रित भी किया गया। मंदिरों, मठों, राजमहलों आदि के प्रवेश द्वारों पर सिंहों की मूर्तियां लगी होना आम बात थी। दिलचस्प बात यह है कि प्रतीक के रूप में सिंह चीन जैसे देश में भी स्थापित हैं, जो मूल रूप से सिंहों का निवास स्थल है ही नहीं। माना जाता है कि भारत से गए बौद्ध भिक्षुओं के माध्यम से चीनियों का सिंह से परिचय हुआ और फिर उन्होंने इस अनदेखे पशु को अपनी लोक संस्कृति में शामिल कर लिया।
सिंह की वास्तविक ताकत के प्रति श्रद्धा भाव रखते हुए जब मनुष्य संतुष्ट नहीं हुआ, तो उसे कुछ काल्पनिक या कहें मिथकीय ताकत भी बख्श डाली। इसी का उदाहरण है ग्रीक पौराणिक कथाओं में आने वाला नेमियन सिंह। कहा जाता है कि ग्रीस के नेमिया क्षेत्र में इस सिंह का जबर्दस्त खौफ व्याप्त था। यह टायफॉन नामक राक्षस व एचिडना नामक सर्प कन्या की संतान था। उसे यह वरदान प्राप्त था कि उसकी चमड़ी को मनुष्यों का कोई भी अस्त्र-शस्त्र बेध नहीं सकता। इस प्रकार वह अपराजेय था और पूरे नेमिया में अपना आतंक फैलाए रहता था। आखिरकार हर्कुलिस नामक योद्धा को उसे मारने के लिए भेजा गया। हर्कुलिस ने सिंह के, उसकी गुफा में जाने का इंतजार किया। फिर गुफा के दो में से एक द्वार को बंद कर दिया और दूसरे द्वार से खुद गुफा में जा पहुंचा। अंधेरे में उसने अपने विराट बाहुबल से सिंह का गला घोंटकर उसे मौत के घाट उतार दिया।
अफ्रीकी देश अंगोला में सिंह के बारे में बड़ी ही मजेदार कथा चली आई है। इसके अनुसार, पहले सिंह दहाड़ा नहीं करता था। वह बहुत ही धीमी आवाज निकालता था, जिससे उसके शिकारों को उसके आने की भनक ही नहीं लगती थी। एक दिन जंगल के सारे पशुओं ने कुछ ऐसा करना तय किया, जिससे सिंह जोरदार आवाज निकाला करे और उसकी आमद का पता चलते ही सब अपनी रक्षा में मुस्तैद हो सकें। खरगोश ने यह जिम्मा अपने सिर लिया। उसने सिंह से जाकर कहा कि महाराज, बुरी खबर है। आपके भाई गंभीर बीमार हैं और आपसे मिलने की ख्वाहिश रखते हैं। यह सुनते ही सिंह व्यथित हो गया और उसने खरगोश से कहा कि मुझे ले चलो मेरे भाई के पास। अब खरगोश भाई के पास ले जाने के बहाने सिंह को जंगल-जंगल घुमाता रहा। आखिर सिंह थककर चूर हो गया और कुछ देर आराम करने के लिए घास पर लेट गया। उसे नींद लग गई, तो खरगोश ने पास ही मधुमक्खी का छत्ता तलाश लिया। मधुमक्खियां बाहर गई थीं, सो खरगोश ने छत्ते से सारी शहद लूट ली और रास्ते में कुछ बूंदे छिड़कते हुए आकर सोते सिंह के पंजों पर शहद लगा दी। फिर वह जाकर झाड़ियों में छुप गया। शाम को जब मधुमक्खियां लौटीं और शहद को गायब पाया, तो वे आग-बबूला हो गईं। इधर-उधर तलाशने पर उन्हें सोते सिंह के पंजों पर शहद नजर आ गई। सो उसे ही शहद चोर समझते हुए मधुमक्खी सेना ने सिंह पर हमला कर दिया। हड़बड़ाकर जागा सिंह मधुमक्खियों के डंक से तड़प उठा और देखते ही देखते उसकी हल्की कराहें गगनभेदी दहाड़ों में बदल गई। बस, तभी से सिंह दहाड़ रहा है और उसकी दहाड़ से सारे प्राणी आगाह हो जाते हैं।

Sunday, 26 August 2018

क्या आपने माफी मांगी...?

गलती के लिए माफी मांगने की लंबी रही है। कहीं इसके लिए स्पष्ट तौर-तरीके निर्धारित हैं, तो कहीं बिना सोचे-समझे और बिना गलती किए माफी मांगने की आदत भी है!
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इंसान से गलती हो ही जाती है और सभ्यता का तकाजा है कि वह अपनी गलती के लिए क्षमा मांग ले। पुणे के पास स्थित पिंपरी चिंचवड़ के एक युवा ने पिछले दिनों इसी का पालन किया। गर्लफ्रैंड के साथ झगड़ा हो जाने के बाद उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने गर्लफ्रैंड से माफी मांगने का फैसला किया। इसके लिए उसने जो तरीका अपनाया, वह बड़ा नाटकीय रहा। उसकी गर्लफ्रैंड के जिस रास्ते से निकलने की संभावना थी, उस रास्ते पर उसने 'आई एम सॉरी" लिखे 300 से ज्यादा बैनर लगवा दिए। रात के अंधेरे में दर्ज किए गए इस माफीनामे को सुबह जब पूरे शहर ने देखा, तो चारों ओर इसकी चर्चा चल पड़ी। किसी ने प्रेमी की दिलेरी की तारीफ की, तो किसी ने इसे सार्वजनिक स्थल का दुरुपयोग माना। हां, पुलिस को माफीनामे का यह तरीका रास नहीं आया।
माफी मांगने को हमारे यहां व कई अन्य संस्कृतियों में भी बड़प्पन की निशानी माना गया है। क्षमायाचना के माध्यम से हम अपराध बोध से मुक्त होकर नई शुरुआत कर सकते हैं। यह उस व्यक्ति का विश्वास फिर से हासिल करने का साधन भी बन सकता है, जिसके साथ हमने गलत किया है। क्षमा मांगने व किसी को क्षमा करने की कई यादगार मिसालें हमारे इतिहास व परंपराओं में दर्ज हैं। जैन धर्म में हर वर्ष मनाए जाने वाले क्षमा पर्व का खास स्थान है।
जापान में माफी मांगना शिष्टाचार का अनिवार्य अंग माना जाता है। वहां के लोगों के व्यवहार में क्षमायाचना का भाव इस कदर झलकता है कि कई विदेशियों को यह अनूठा, यहां तक कि अटपटा भी लगता है। खास बात यह है कि जापान में माफी मांगना किसी गलत काम की स्वीकारोक्ति नहीं, बल्कि शिष्टाचार व विनम्रता का संकेत माना जाता है और विनम्रता जापानी संस्कृति में बेहद महत्वपूर्ण गुण माना गया है। इसीलिए वहां की भाषा में क्षमायाचना के लिए कई अलग-अलग शब्द निर्धारित हैं। सामने वाले की उम्र, उससे आपके परिचय के स्तर और घटनाक्रम की परिस्थिति के हिसाब से तय होता है कि आपको माफी मांगने के लिए कौन-से शब्द या शब्दों का उपयोग करना है। इसके साथ ही शारीरिक मुद्रा का भी अहम स्थान होता है। यूं तो जापानी एक-दूसरे के अभिवादन में भी थोड़ा झुकते हैं लेकिन माफी मांगने के लिए अधिक झुका जाता है व अधिक देर के लिए झुका जाता है।
जापान की ही तरह, पड़ोसी चीन के गुआंगझाऊ क्षेत्र में भी माफी मांगने के लिए कई शब्द व वाक्यांश निर्धारित हैं। अपनी गलती के लिए आप कितनी ग्लानि महसूस कर रहे हैं, इसके आधार पर तय होता है कि आप किन शब्दों में माफी मांगेंगे। इनमें 'क्षमा करना" से लेकर 'मुझसे गलती हो गई, मुझे सजा दो" तक शामिल है।
ब्रिटिश लोगों की भी ख्याति बात-बात पर क्षमायाचना के लिए रही है। 'सॉरी" कहना किस कदर उनके अवचेतन में रच-बस गया है, यह कुछ समय पहले मानवशास्त्री केट फॉक्स द्वारा किए गए एक प्रयोग से सामने आया। केट कई शहरों-कस्बों में घूम-घूमकर राह चलते लोगों से जान-बूझकर टकराती गईं। उन्होंने पाया कि लगभग 80 प्रतिशत लोगों ने टकराने के लिए 'सॉरी" कहा, इसके बावजूद कि दोष केट का था, न कि उनका! इनमें से बड़ी संख्या में लोग बिना कुछ सोचे 'सॉरी" बोल रहे थे या फिर अपनी ही धुन में 'सॉरी" बोलते हुए निकल रहे थे। यानी जिनमें वास्तव में क्षमा का भाव नहीं था, वे भी आदतन यह शब्द बोल रहे थे।
हां, ब्रिटेन ने सदियों तक भारत समेत दुनिया के अनेक देशों पर जो अत्याचार किए, उसके लिए आधिकारिक क्षमायाचना का अब भी उसके तमाम पूर्व उपनिवेशों को इंतजार है। इन्हीं में से एक उपनिवेश ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने जरूर वहां के मूल निवासियों पर किए गए जुल्मों के लिए आधिकारिक रूप से माफी मांगी है और इसी की स्मृति स्वरूप वहां अब हर साल 26 मई को राष्ट्रीय क्षमा दिवस मनाया जाता है।

Sunday, 19 August 2018

दांतों से नियंत्रित होता भाग्य!


दांत का टूटकर गिरना हमारे लिए खास घटना रहता आया है। कारण है दांतों में रूहानी ताकत व जादुई शक्तियां होने का विश्वास। इससे उपजे हैं दांत संबंधी अनेक रिवाज और मिथक।
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एक समय था, जब योरप के लोग दृढ़ता से मानते थे कि यदि हमारा एक भी दांत किसी डायन या जादूगरनी के हाथ लग जाए, तो वह इसके माध्यम से हमारे भाग्य को नियंत्रित कर सकती है। इसलिए टूटे हुए दांतों का क्या किया जाए, यह एक अहम प्रश्न था। यह प्रश्न तब और भी अहम हो जाता था, जब बच्चे दूध के दांत गिरने के दौर से गुजर रहे होते। इसलिए इन दांतों को 'ठिकाने लगाने" के कुछ खास तरीके ईजाद किए गए। कहीं दांतों को जमीन में गाड़ दिया जाता, तो कहीं आसमान में उछाल दिया जाता। मध्ययुगीन इंग्लैंड में बच्चे के दांत को जला दिया जाता था। लोगों का विश्वास था कि यदि टूटकर शरीर से अलग हुए दांत का ठीक से निपटारा न किया गया, तो मृत्यु के बाद उसकी आत्मा दांत की तलाश में अनंतकाल तक भटकती रहेगी!
चूहे, गिलहरी आदि जैसे जीवों की ख्याति उनके मजबूत दांतों के लिए है। इसलिए इंसानी दांतों संबंधी कई मिथक भी किसी--किसी तरह इनसे जुड़े हैं। कुछ पश्चिमी देशों में टूटे हुए दांत को चूहे को 'खिलाने" का रिवाज था। लोग मानते थे कि यदि बच्चे का दूध का दांत किसी चूहे या गिलहरी को खिला दिया जाए, तो बच्चे को आने वाला स्थायी दांत खूब मजबूत व टिकाऊ होता है। माना जाता है कि टूटे दांत के बदले बच्चे को पैसे या कोई तोहफा देने की परंपरा स्कैंडिनेवियाई देशों से शुरू हुई। बाद में यह परंपरा अलग-अलग रूपों में कई अन्य देशों में फैली। दांत टूटने पर माता-पिता उसे बच्चे के तकिए के नीचे रख देते। फिर जब बच्चा सो जाता, तो तकिए के नीचे से दांत को हटाकर कुछ पैसे या तोहफा रख देते। बच्चे के जागने पर उससे कहा जाता कि यह टूटे दांत के एवज में दंत परी या चूहा या फिर कोई और छोड़ गया है। अर्जेंटीना में तो दांत ले जाने वाले चूहे का खास खयाल रखा जाता है। दांत को बच्चे के सिरहाने रखा जाता है और पास में पानी का ग्लास भी रखा जाता है ताकि जब चूहा दांत लेने आए, तो पहले अपनी प्यास बुझाए, फिर दांत लेकर अपने सफर पर आगे बढ़े! जागने पर बच्चा पाता है कि ग्लास में पानी की जगह रुपए रखे हैं, जो चूहा उनके लिए छोड़ गया है।
दांतों को शरीर के सबसे मजबूत अंगों में माना जाता आया है। कई लोगों के बीच तो यह धारणा भी रही है कि दांत अनश्वर होते हैं। इसके चलते दांत को माला में पिरोकर पहनने का रिवाज भी पनपा। युद्ध में अपनी रक्षा की खातिर सैनिक इस तरह की दांतों वाली माला या तावीज पहनकर जाते! दांतों में भौतिक ताकत ही नहीं, रूहानी ताकत के भी होने का विश्वास अनेक संस्कृतियों में व्याप्त था। दक्षिण अमेरिका की माया सभ्यता के लोग अपने दांतों की रूहानी ताकत बढ़ाने के लिए इनमें फिरोजा व जेड जैसे रत्न जड़ते थे।
कहीं-कहीं दांतों की जमावट के आधार पर भविष्य दर्शन का भी दावा किया जाता है। नॉर्वे में ऐसी मान्यता है कि यदि आपके दांत एक-दूसरे से दूर-दूर हैं, तो आप दूर देशों की यात्राएं करेंगे। वहीं, यदि आपके दांत एक-दूसरे के बहुत पास-पास हैं, तो आप हमेशा अपने घर व प्रियजनों के करीब रहेंगे। यदि आपके दांत एक-दूसरे के ऊपर चढ़ रहे हों, तो आप कंजूस निकलेंगे। यह तो हुई नॉर्वे के लोगों की मान्यता। हांग कांग के लोग मानते हैं कि यूं एक-दूसरे पर चढ़ रहे दांतों वाले लोग झगड़ालू होते हैं!

Sunday, 8 July 2018

जब नाच उठा सूखे का भय और बह निकली नदी


बारिश कराने के लिए कोई नृत्य करता है, तो कोई देवताओं को दावत देता है। हर हाल में बरसात पाकर रहने के लिए हमारे पूर्वजों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है...
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उत्तर अमेरिका के एक समुदाय में प्रचलित जनश्रुति के मुताबिक, एक बार ऐसा सूखा पड़ा कि कई महीनों तक बारिश ही नहीं हुई। मैदान सूख गए, नदी सूख गई, पशु मरने लगे। लोग आसमान ताकते रहते लेकिन कोई राहत नहीं मिलती। धीरे-धीरे पूरे इलाके में 'भय" का राज होने लगा। हर किसी पर यह हावी होने लगा। फैलते-फैलते चारों ओर भय फैल गया। बस, गांव के बाहरी छोर पर वह स्थान इससे बचा रह गया, जहां बच्चे खेलते थे और बुजुर्ग गपियाते थे। जब भय वहां जा पहुंचा, तो बच्चों ने उसे आश्चर्य से देखते हुए बुजुर्गों से पूछा कि यह कौन आया है? बुजुर्गों ने बताया कि यह भय है। जब बच्चों ने पूछा कि क्या यह हमारे साथ खेलने आया है, तो बुजुर्ग बोले, 'यह तो खेलना भूल चुका है।"
बच्चों ने सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए कि भय को फिर से खेलना आ जाए। तय हुआ कि वे नृत्य करेंगे, तो शायद भय फिर से खेलने लगे। बच्चों ने नृत्य करना शुरू किया। बुजुर्ग भी गीत गाते हुए उनका साथ देने लगे। जब इनके नृत्य व गीत की आवाज आसपास के गांवों तक पहुंची, तो लोग देखने आए कि क्या माजरा है। देखते ही देखते वे भी नृत्य में शामिल हो गए। इस प्रकार नृत्य का सिलसिला चलता रहा। आखिरकार भय भी खुद को रोक न सका और सबके साथ थिरकने लगा। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे और होंठों पर हंसी लौट आई। उसके साथ-साथ नृत्य करने वाले लोगों के भी आंसू बहने लगे। तभी हवा वहां आई और सारा नजारा देखकर न सिर्फ दूर-दूर से पशु-पक्षियों को बुला लाई, बल्कि खुद भी नृत्य में शामिल हो गई। सभी नाचे जा रहे थे और आंसू बहाए जा रहे थे। इन सबके आंसू धरती पर पड़ते गए और देखते ही देखते सूखी नदी फिर पानी से भर गई।
यह कहानी उत्तर अमेरिका के आदिवासी समुदायों में प्रचलित रही उस परंपरा से जोड़ी जाती है, जिसमें वर्षा का आह्वान करने के लिए विशेष नृत्य किया जाता है। दरअसल, जीवन के लिए वर्षा का महत्व तो मनुष्य काफी पहले ही जान चुका था लेकिन लंबे समय तक वह इससे अवगत नहीं था कि मौसम चक्र कैसे चलता है और बारिश कैसे होती है। सो जीवनदायी बरसात जब रूठी हुई लगे तो उसे मनाने के भांति-भांति के टोटके तलाशे गए। ऐसे ढेरों टोटके हमारे देश में अब भी अपनाए जाते देखे जा सकते हैं। अन्य देशों-संस्कृतियों में भी बारिश कराने के लिए विभिन्ना प्रकार के उपाय किए जाते रहे हैं। दक्षिण अमेरिका की माया सभ्यता में वर्षा के देवता चाक को प्रसन्ना करने के लिए आलीशान दावत का आयोजन किया जाता था। वहीं कई स्थानों पर इसके लिए बलि देने का चलन भी रहा है। कई देशों में ऐसे जादूगर/ ओझा होते थे, जो वर्षा करा सकने का दावा करते थे। समाज में इनका विशेष स्थान हुआ करता था। कुछ अफ्रीकी देशों में तो बारिश कराना खानदानी पेशा भी हुआ करता था!
थाइलैंड में एक अजीबोगरीब परंपरा रही है, जिस पर पशु क्रूरता के खिलाफ लड़ने वालों को आपत्ति भी हो सकती है। वहां जब लंबे समय तक बारिश नहीं होती है, तो एक बिल्ली को टोकरी में रखकर गांव भर में उसका जुलूस निकाला जाता है। जिन-जिन घरों के सामने से जुलूस निकलता है, वहां से बिल्ली पर पानी फेंका जाता है। लोग मानते हैं कि पानी पड़ने से चिढ़कर/ घबराकर बिल्ली जो 'म्याऊं-म्याऊं" करती है, उससे बारिश होने लगती है!

Sunday, 1 July 2018

जिसके बिना अधूरा है देवताओं का अस्तित्व


सोने को सदा चुनौती देती आई चांदी की कीमत उसकी प्रतीकात्मकता व धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व में निहित है। इसके बिना तो देवी-देवताओं का अस्तित्व भी अधूरा माना गया है।
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अफगानिस्तान की एक बड़ी प्यारी-सी लोककथा है। एक गरीब किसान जी-तोड़ मेहनत करने के बाद भी तंगहाली से मुक्त नहीं हो पा रहा था। वह कल्पना किया करता था कि काश किसी दिन उसका घर धन-दौलत से भर जाए! एक दिन वह खेत में काम कर रहा था कि अचानक कंटीली झाड़ियों में उसके कपड़े फंसकर फट गए। उसने यह सोचकर झाड़ी उखाड़ना शुरू की कि कहीं दोबारा इसकी वजह से किसी के कपड़े न फट जाएं। जब झाड़ियों की जड़ों के साथ कुछ मिट्टी भी उखड़ आई, तो उसने देखा कि नीचे एक बड़ा-सा मर्तबान दफन है। मर्तबान निकालकर व खोलकर देखा, तो वह दंग रह गया। उसमें चांदी के सिक्के भरे पड़े थे। उसने सोचा, 'मैंने धन-दौलत चाही तो थी लेकिन अपने घर में। मैं कैसे मान लूं कि यह दौलत मेरे ही लिए है!" यह सोचकर वह मर्तबान वापस वहीं गाड़कर घर चला आया। बीवी को बताया, तो वह आग-बबूला हो गई कि कैसा अहमक है, हाथ लगी दौलत को घर लाने से इनकार कर रहा है! रात को वह पड़ोसी के पास गई और उसे खेत में दफन खजाने के बारे में बताते हुए कहा कि मेरा शौहर तो उसे ला नहीं रहा, तुम जाकर ले आओ और आधा खजाना मेरे साथ बांट लो।
पड़ोसी तुरंत खेत की ओर लपका। उसे वह मर्तबान मिल भी गया मगर जैसे ही उसने उसे खोलकर देखा, तो पाया कि वह जहरीले सांपों से भरा है। उसने तुरंत मर्तबान का ढक्कन लगा दिया और सोचने लगा कि पड़ोसन मेरी जान की दुश्मन है, तभी मुझे इस लालच में फंसाया। उसे सबक सिखाने के इरादे से वह मर्तबान उठा लाया और किसान के घर की छत पर चढ़कर उसकी चिमनी में मर्तबान खाली कर दिया। वह यह सोचकर संतुष्ट था कि जहरीले सांप किसान पति-पत्नी का काम तमाम कर देंगे। मगर अगली सुबह जब किसान की नींद खुली, तो उसने देखा कि उसका घर चांदी के सिक्कों से भर गया है- ठीक वैसे ही, जैसे कि उसने इच्छा की थी...
गौर करें, एक भोले, गरीब किसान को मालामाल होते दिखाने के लिए यहां सोना नहीं, चांदी को माध्यम बताया गया है। धातु जगत में धन-दौलत की चरम सीमा का प्रतीक होना सोने का एकाधिकार नहीं, इसमें चांदी की भी भागीदारी है। वैसे सोने के साम्राज्य के आगे चांदी की सल्तनत भी हमेशा पूरे ठस्से से खड़ी रहती ही आई है। प्राचीन मिस्र में तो कहा गया था कि देवी-देवताओं के शरीर का मांस सोने का और अस्थियां चांदी की होती हैं। यानी देवी-देवताओं के अस्तित्व के लिए भी सोने के साथ-साथ चांदी का होना अनिवार्य है।
अपने रंग-रूप के कारण अनेक स्थानों पर चांदी का संबंध चंद्रमा से जोड़ा गया। साथ ही, यह कई चीजों की प्रतीक भी रही है। इसका उपयोग आभूषण बनाने व सिक्के ढालने में तो होता ही रहा है मगर इसका वास्तविक मूल्य इससे कहीं बढ़कर होता आया है। वजह है, इससे जुड़ी प्रतीकात्मकता और धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व। अनेक स्थानों पर इसे प्रेम, सत्यनिष्ठा, विश्वास व बुद्धिमत्ता के प्रतीक के तौर पर किसी को भेंट करने की परंपरा रही है। लिथुएनिया में विवाह में आने वाले मेहमान चांदी के सिक्के लेकर आते हैं। जब नृत्य शुरू होता है, तो सभी मेहमान अपने-अपने सिक्के नृत्य स्थल पर बिखेर देते हैं। बाद में इन सिक्कों को एक पात्र में इकट्ठा कर दिया जाता है और इनमें एक खास सिक्का मिला दिया जाता है, जिस पर वर-वधु के नामों के पहले अक्षर दर्ज होते हैं। अब मेहमानों से कहा जाता है कि वे बारी-बारी से पात्र में से एक सिक्का निकालें। जिस मेहमान के हाथ वर-वधु के नाम वाला विशेष सिक्का आता है, उसे वर या वधु के साथ नृत्य करने का मौका मिलता है।

Sunday, 10 June 2018

आसमान में तनी सतरंगी कल्पनाएं


देवताओं का अग्नि-सेतु या प्यास बुझाने धरती पर उतरता सर्प? सतरंगी लबादे में दौड़ लगाती देवी या रोगों का वाहक? इंद्रधनुष को इंसान ने कई रंगों में देखा है।
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बहुत पहले, जब संसार नया-नया ही बना था, एक दिन खुराफाती देवता नैनाबोजो ने देखा कि उनके निवास के आसपास सारे के सारे फूल सफेद थे। यह बात उन्हें रास नहीं आई। उन्होंने तय किया कि वे सारे फूलों में रंग भर देंगे। बस फिर क्या था, नैनाबोजो ने अपने रंग व कूची ली और चल पड़े फूलों को रंगने। उनका यह उपक्रम चल ही रहा था कि दो नन्हे पंछी खेलते-फुदकते वहां आ पहुंचे। पहले एक पंछी दूसरे का पीछा करते हुए जमीन की ओर गोता लगाता और फिर आकाश की ओर उड़ लेता, फिर दूसरा उस पहले पंछी का पीछा करने लगता। इधर नैनाबोजो फूलों को रंग रहे थे, उधर पंछियों का खेल जारी था। जब-जब पंछी गोता लगाकर नीचे आते, कभी उनका पंख तो कभी पैर नैनाबोजो के रंगों में डुबकी लगा जाता। कुछ ही देर में दोनों पंछी लाल, नारंगी, पीले, हरे, नीले रंगों में रंग गए। आखिर उनके व्यवधान से तंग आकर नैनाबोजो ने उन्हें भगा दिया। तब दोनों पंछी पास ही स्थित झरने की ओर उड़ गए। उन्होंने झरने के पानी से बनी धुंध के आर-पार अपना खेल जारी रखा। उनके तन पर लगे रंग अब धुंध की इस चादर कर चित्रकारी उकेरने लगे। कुछ देर बाद जब नैनाबोजो की निगाह झरने की ओर गई, तो उन्होंने वहां सात रंगों की अनूठी कलाकृति तनी हुई देखी। यह था दुनिया का पहला इंद्रधनुष।
एक उत्तर अमेरिकी आदिवासी समुदाय की यह लोकगाथा इंद्रधनुष की उत्पत्ति का बड़ा ही सुंदर चित्र खींचती है। बारिश के बाद प्रकृति का सतरंगी उत्सव मनाता इंद्रधनुष आदिकाल से लोगों में आश्चर्य, कौतुहल व आनंद का भाव उत्पन्ना करता आया है। दिलचस्प बात यह है कि विभिन्ना संस्कृतियों में इंद्रधनुष को लेकर धारणाएं भी विविधरंगी रहती आई हैं। प्रशांत महासागर स्थित पॉलीनेशिया में माना जाता है कि इंद्रधनुष एक दिव्य सीढ़ी है, जिसे चढ़कर शूरवीर स्वर्ग को जाते हैं। वहीं जापान में माना जाता है कि हमारे पूर्वज जब स्वर्ग से उतरकर धरती पर आते है, तो इंद्रधनुष पर से चलकर ही आते हैं। उत्तरी योरप में इसे धरती व देवलोक को जोड़ने वाले अग्नि-सेतु के रूप में देखा जाता है, जिस पर से गुजरने की अनुमति केवल देवताओं व शहीदों को है।
ग्रीक आख्यानों में तो इंद्रधनुष को बड़े ही अनोखे अंदाज में देखा गया है। इसके अनुसार पछुआ हवा के देवता जेफिरस की पत्नी आइरिस देवताओं व मनुष्यों के बीच संदेशवाहक की भूमिका निभाती हैं। जब वे अपने सतरंगी लबादे में आसमान से धरती और यहां से वापस आसमान की ओर दौड़ लगाती हैं, तो हमें इंद्रधनुष के रूप में नजर आती हैं।
अफ्रीका की जुलु जनजाति में इंद्रधनुष को जरा अलग तरह से देखा जाता है। ये लोग मानते हैं कि इंद्रधनुष आसमान में रहने वाला एक विशाल सर्प है, जो धरती के जलाशयों से पानी पीने आता है। मगर यह निरापद नहीं है। यदि कोई उस जलाशय में स्नान कर रहा हो, तो यह उसे तत्काल निगल लेता है! ऑस्ट्रेलिया की कई जनजातियां भी इंद्रधनुष को एक विशाल सर्प के रूप में देखती हैं, जिसने संसार को रचा है। म्यांमार के एक समुदाय में यह विश्वास रहा है कि इंद्रधनुष दानवी शक्ति होती है, जो मनुष्य की अकस्मात, हिंसक मृत्यु के लिए जिम्मेदार है। यह मानव आत्माओं का भक्षण करता है और फिर अपनी प्यास बुझाने धरती पर उतरता है। पेरू में तो इंद्रधनुष को कई तरह के रोगों, खास तौर पर त्वचा रोगों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। वहां बच्चों को सिखाया जाता है कि इंद्रधनुष दिखते ही वे अपना मुंह बंद कर दें ताकि कहीं बीमारी के जीवाणु उनके शरीर में प्रवेश न कर जाएं!
बुल्गारिया में कहा जाता है कि यदि कोई पुरुष इंद्रधुनष के नीचे से गुजरे, तो वह स्त्री की तरह सोचने लगता है और यदि कोई स्त्री इसके नीचे से गुजरे, तो वह पुरुष की तरह सोचने लगती है! उधर जर्मनी में मध्ययुग के दौरान यह मान्यता व्याप्त थी कि प्रलय आने से पहले चालीस साल तक किसी इंद्रधनुष के दर्शन नहीं होंगे। इसलिए, जब भी आसमान में इंद्रधनुष नजर आता, लोग यह सोचकर राहत की सांस लेते कि अभी कम से कम चालीस वर्ष तक तो प्रलय नहीं आने वाला...