Sunday, 23 April 2017

अजब शोध के गजब विषय!

यह जरूरी नहीं कि वैज्ञानिक शोध किसी ऐसे विषय पर ही हो, जो इंसान की जिंदगी बदल दे। दुनिया भर के विद्वान ऐसे विषयों पर भी शोध करते आए हैं, जिनके बारे में सुनकर यह सवाल उठता है कि यह कवायद आखिर की ही क्यों गई!
***

इंसानी दिमाग यदि खोजी प्रवृत्ति का न होता, तो आज शायद हम अन्य प्राणियों से बहुत भिन्ना न होते। अपने मन में उठती जिज्ञासाओं और इन्हें शांत करने के उपक्रमों ने ही मनुष्य को सारी प्रजातियों में उन्नात बनाया। आग जलाने और पहिया बनाने से लेकर डिजिटल व नैनो टेक्नोलॉजी के हैरतअंगेज कारनामों तक का सफर उसने खुद से सवाल करने और फिर उनका समाधान खोजने के माध्यम से ही तय किया है। मगर कई बार ये सवाल खुद ही सवालों के घेरे में आ जाते हैं। दुनिया के विभिन्ना हिस्सों में निरंतर चल रहे शोध-अनुसंधानों के विषयों पर गौर करें, तो कई बार बड़े ही बेतुके-से विषय भी मिल जाते हैं। तब यह सोचकर हैरानी होती है कि अच्छे-खासे धन, समय व ऊर्जा को खपाकर आखिर ऐसे विषयों पर शोध की ही क्यों जाती है और इससे क्या हासिल होता है!
अभी कुछ ही दिन पहले कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में इस बात पर शोध की गई कि अच्छी तरह बांधा गया जूते का फीता भी अचानक खुल क्यों जाता है? इसके लिए शोधकर्ताओं ने बाकायदा ट्रेडमिल पर दौड़ते शख्स के जूतों का स्लो मोशन वीडियो बनाया और देखा कि फीता कब व कैसे खुलने लगता है। निष्कर्ष यह निकाला गया कि दरअसल हम जिस तरह से जूते का फीता बांधते आए हैं, वही गलत है! अब बताइए, जब संसार में भांति-भांति की समस्याएं हैं, अभाव हैं जिन्हें दूर करने की दरकार है, तब शोध के लिए यह विषय कितना प्रासंगिक कहा जा सकता है? हां, लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं पर शोधकर्ताओं का भी पूरा हक है और उन्हें यह तय करने का अधिकार होना ही चाहिए कि वे किस विषय पर शोध करें। मगर कई बार शोध के विषय इस पूरी कवायद की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं।
फीता खुलने के रहस्य पर शोध तो एक ताजा उदाहरण मात्र है। दुनिया के अलग-अलग भागों में होती रही 'शोध" गतिविधियों पर गौर करें, तो ऐसे अनेक बेतुके विषय मिल जाएंगे जिन पर खोजबीन की गई और बाकायदा रिसर्च पेपर लिखे गए। मसलन, ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के डॉ लेन फिशर ने विस्तृत अध्ययन कर यह जानने का प्रयास किया कि चाय या दूध में बिस्किट डुबोने की सबसे सटीक तकनीक कौन-सी है, जिससे बिस्किट टूटे नहीं। उधर इलिनोआ स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि क्या एक पौंड सीसा और एक पौंड पंखों का वजन एक-समान महसूस होता है? 23 लोगों की आंखों पर पट्टी बांधकर उनसे एक जैसे आकार के बक्से उठवाए गए और पूछा गया कि कौन-सा बक्सा भारी है। अधिकांश लोगों ने उन बक्सों को ज्यादा भारी बताया, जिनमें सीसा रखा था, हालांकि वजन सभी बक्सों का एक समान था।
दुनिया के सबसे शांतिप्रिय देशों में से एक के रूप में विख्यात स्विट्जरलैंड की बर्न यूनिवर्सिटी में 2009 में एक बड़े ही हिंसक विषय पर अनुसंधान किया गया। अनुसंधानकर्ताओं के सामने सवाल यह था कि किसी के सिर पर बियर की खाली बोतल मारने से उसकी खोपड़ी फूटने की अधिक संभावना होती है या फिर भरी बोतल मारने से...? यह पाया गया कि भरी हुई बोतल 70 प्रतिशत अधिक ताकत से सिर से टकराएगी लेकिन खोपड़ी फोड़ने के लिए खाली बोतल भी पर्याप्त है! जापान के एक विश्वविद्यालय के शोधकताओं ने यह जानने की कोशिश की कि क्या कबूतर दो अलग-अलग चित्रकारों के बनाए चित्रों में फर्क कर पाते हैं? निष्कर्ष निकला 'हां"। उधर स्वीडन में किए गए अनुसंधान में यह बताया गया कि मुर्गे-मुर्गियां 'सुंदर" दिखने वाले मनुष्यों को ज्यादा पसंद करते हैं! वहीं केंब्रिज के एक संस्थान ने अध्ययन करके यह नतीजा निकाला कि भेड़ें एक-दूसरे के चेहरे पहचान सकती हैं। इसी तरह अमेरिकी शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि चूहे क्लासिकल म्यूजिक पसंद करते हैं या जैज़?

इन तमाम अनुसंधानों के बीच क्यों न एक शोध यह जानने के लिए भी की जाए कि आखिर क्यों मनुष्य ऐसे बेतुके विषयों पर शोध करने को प्रेरित होता है...? 

Sunday, 9 April 2017

सबसे बड़ा आलसी कौन?

आलसियों की जमात खीझ भी उत्पन्न करती है और उपहास का विषय भी बनती है। कथा साहित्य में अक्सर आलसियों का जिक्र हंसी के पात्र के रूप में ही किया जाता है।
***

क्या आलसीपन छूत का रोग है? पिछले दिनों फ्रांस में किए गए एक शोध का यही निष्कर्ष निकला कि यदि आप आलसी लोगों से घिरे हैं, तो चाहे-अनचाहे आप भी आलसीपन की गिरफ्त में आ जाएंगे! यानी संगत का असर आलसीपन के मामले में तो स्पष्ट रूप से सामने आता है। यह बहस का विषय हो सकता है कि यह निष्कर्ष किस हद तक सही है मगर दिलचस्प बात यह है कि जहां समय-समय पर आलसीपन के 'दौरे" हम सभी को पड़ते हैं, वहीं कुछ लोग इसे स्थायी भाव के रूप में लिए रहते हैं। यानी उनके मामले में दोष किसी संगत को देना मुश्किल है।
आलसियों की जमात खीझ भी उत्पन्न करती है और उपहास का विषय भी बनती है। कथा साहित्य में अक्सर आलसियों का जिक्र हंसी के पात्र के रूप में ही किया जाता है। कभी अंत में उन्हें सबक मिल जाता है और कभी नहीं भी मिलता। फिलिपीन्स में 'आलसी जॉन" नामक पात्र से जुड़ी लोक कथाओं की समूची श्र्ाृंखला ही चली आई है, जोकि बेहद लोकप्रिय है। कभी उसे बालक के रूप में चित्रित किया जाता है और कभी युवा के रूप में मगर उम्र कोई भी हो, आलसीपन ही उसके चरित्र को परिभाषित करता है। वह इस कदर आलसी है कि अमरूद से लदे पेड़ पर से पके फल तोड़ने के बजाए उसके नीचे अपना मुंह खोलकर लेट जाता है और इंतजार करता है कि कोई फल पेड़ पर से सीधे उसके मुंह में आ गिरे!
जाहिर है, इस तरह की लोक कथाओं में आलसीपन के किस्से अतिरंजित करके सुनाए जाते हैं और यही इन्हें दिलचस्प भी बनाता है। एक जर्मन लोक कथा में एक राजा असमंजस में है कि अपने तीन बेटों में से किसे वह अपना उत्तराधिकारी बनाए। वह तय करता है कि तीनों में जो सबसे ज्यादा गुणी होगा, वही होगा उत्तराधिकारी। दिक्कत यह है कि तीनों ही राजकुमारों में केवल एक 'गुण" है और वह है उनका आलसीपन। सो राजा उन तीनों को बुलाकर कहता है कि तुममें से जो सबसे ज्यादा आलसी होगा, वही मेरे बाद राजा बनेगा। अब तीनों बेटों में स्वयं को दूसरों से ज्यादा आलसी बताने की होड़ लग जाती है। पहला बेटा कहता है, 'जब मैं सोने जाता हूं, तो अपनी आंखें तक बंद करने की मेहनत नहीं करता।" दूसरा बेटा कहता है, 'जब मैं आग तापने बैठता हूं और आग मेरे पैर को झुलसाने लगती है, तो मैं पैर पीछे करने का भी उपक्रम नहीं करता।" तभी तीसरा राजकुमार कह उठता है, 'पिताजी, मैं तो इतना आलसी हूं कि यदि मुझे फांसी पर लटकाया जा रहा हो और कोई मेरे हाथ में चाकू थमा दे जिससे मैं रस्सी काट दूं, तो भी मैं रस्सी काटने की जेहमत उठाने के बजाए फांसी पर लटक जाऊंगा...!" राजा साहब इस तीसरे बेटे को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देते हैं।

अमेरिकी आदिवासी समुदाय के बीच सात आलसी लड़कों की एक कहानी प्रसिद्ध है, जो न अपनी मां का कहना मानते हैं और न ही किसी काम में उसकी मदद करते हैं। मां उन्हें डांटती रहती है, तो एक दिन सातों ईश्वर से प्रार्थना करने लगते हैं कि उन्हें घर से इतनी दूर ले जाया जाए कि न मां उन्हें परेशान कर पाए और न वे मां को। वे घर की परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करते जाते हैं कि अचानक कोई अदृश्य ताकत उन्हें आसमान की ओर उठाने लगती है। सातों ऊपर उठते जाते हैं, तभी मां बाहर आकर उन्हें रोकने की कोशिश करती है। एक बेटा मां की पकड़ में आ जाता है, जबकि शेष छह आसमान में पहुंच जाते हैं और तारे बन जाते हैं। इन छह के तारामंडल को ही प्लीयडीज या कृतिका तारामंडल कहा जाता है।

Sunday, 26 March 2017

क्या कहता है यह निशान?

हमारे शरीर पर प्रकृति ने बर्थमार्क के रूप में कुछ सहज कलाकारी की और उसे लेकर हमारे पूर्वजों ने उतनी ही सहजता से ढेरों गाथाएं गुंथ लीं। यह निशान क्यों पड़ता है और इसका क्या निहितार्थ है, इसे लेकर भांति-भांति की रोचक धारणाएं व्याप्त हैं।
***

क्या हमारे शरीर पर मौजूद जन्मचिह्न (बर्थमार्क) महज इत्तेफाक होता है या इसके पीछे कोई कहानी होती है? वैसे तो विज्ञान कहता है कि त्वचा के किसी एक स्थान पर अत्यधिक पिगमेंट कोशिकाओं या रक्तवाहिकाओं के इकट्टा होने से उस स्थान पर त्वचा का रंग शेष त्वचा से अलग हो जाता है और यही आकृति बर्थमार्क के रूप में नजर आती है। मगर जन्म के समय से ही शरीर पर मौजूद या जन्म के ठीक बाद उभरने वाले इन अजीब निशानों को लेकर जिज्ञासु इंसान ने इसके पीछे इतने दिलचस्प कारणों की कल्पना कर डाली कि विज्ञान वाली व्याख्या बड़ी रूखी और नीरस जान पड़ती है!
अनेक संस्कृतियों में लोग मानते हैं कि बर्थमार्क का संबंध गर्भावस्था में मां के मनोभावों या गतिविधि से होता है। मसलन, यह कि यदि गर्भावस्था में मां को कोई लाल या भूरी वस्तु खाने की तीव्र इच्छा हो और वह पूरी न हो पाए, तो बच्चे के शरीर पर लाल या भूरे रंग का निशान बन जाता है। यानी मां की अतृप्त इच्छाएं शिशु की त्वचा पर अंकित हो जाती हैं। योरप से लेकर अरब तक ऐसी धारणा व्याप्त है। वहीं ईरान में इसे सूर्य ग्रहण से जोड़ा गया है। वहां कहते हैं कि यदि कोई गर्भवती स्त्री सूर्य ग्रहण को देखते हुए अपने पेट पर हाथ रखती है, तो बच्चे को बर्थमार्क पड़ जाता है। जापान में गर्भवतियों को आगाह किया जाता है कि वे आग को घूरकर न देखें, अन्यथा बच्चे के शरीर पर जले के निशान जैसा जन्मचिह्न बन जाएगा!
विश्व में जहां-जहां पुनर्जन्म की मान्यता है, वहां बर्थमार्क का संबंध पिछले जन्म की किसी घटना से भी बताया जाता है। मसलन, यदि पिछले जन्म में शरीर के किसी अंग पर घातक चोट लगी थी, तो इस जन्म में उसी स्थान पर निशान बना मिलेगा। ऐसा हम बॉलिवुडिया फिल्मों में भी देखते आए हैं। कुछ देशों में यह माना जाता है कि बर्थमार्क फरिश्तों द्वारा शिशु को चूमने के कारण बनता है। इसलिए बर्थमार्क को शुभ मानकर इसे धारण करने वाले व्यक्ति का स्पर्श करना भाग्यशाली कहा जाता है। वहीं कुछ समुदायों में इसे शैतान का निशान मानकर बर्थमार्क धारण करने वाले को दुष्ट भी ठहरा दिया जाता है!
चीन में बर्थमार्क के आधार पर व्यक्तित्व की व्याख्या करने का चलन रहा है। कहते हैं कि यदि आपके बायें पैर पर निशान है, तो आप बहुत बुद्धिमान हैं और यदि दायें पैर पर निशान है, तो आप खूब यात्रा करेंगे। हां, यदि निशान आपके पेट पर है, तो यह इस बात को दर्शाता है कि आप बेहद लालची हैं! छाती पर मौजूद निशान कहता है कि आज नहीं तो कल आपकी किस्मत खुलने वाली है। जबड़े पर मौजूद बर्थमार्क स्वास्थ्य समस्याओं की ओर इशारा करता है। दायें कंधे पर बर्थमाक कहता है कि आप धनवान होंगे, जबकि बायें कंधे का बर्थमार्क इससे ठीक विपरीत कहता है।

हमारे शरीर पर प्रकृति ने कुछ सहज कलाकारी की और उसे लेकर हमारे पूर्वजों ने उतनी ही सहजता से ढेरों गाथाएं गुंथ लीं। आखिर गाथाएं गुंथना हमारी सहज वृत्ति जो है...! 

Sunday, 5 March 2017

मुस्कान के तोहफे लाते पंछी

इस दुनिया को जो चीजें रहने लायक और हंसी-खुशी रहने लायक बनाती हैं, उनमें कुछ भोले-से, कुछ खब्ती-से, कुछ नटखट तो कुछ सयाने ये पंछी भी शामिल हैं।

***

आप कहीं बैठे हों और अचानक कोई नन्ही-सी चिड़िया फुर्र से उड़कर या हौले-हौले फुदकते हुए आपके पास आ जाए, तो आपकी प्रतिक्रिया क्या रहेगी? मन पुलकित हो उठेगा। चेहरे पर बरबस मुस्कान खिल उठेगी। कुछ पलों के लिए ही सही, चिंताएं मानो गायब हो जाएंगी...। अब ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के कुछ शोधकर्ताओं ने पाया है कि जो लोग चहचहाते पंछियों के बीच रहते हैं, उनके अवसाद, तनाव व व्यग्रता से ग्रस्त होने की संभावना घट जाती है। दूसरे शब्दों में, प्रकृति और खास तौर पर पक्षियों का सान्निाध्य हमारे मानसिक कुशलक्षेम पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
देखा जाए, तो यह कोई बहुत अनोखी बात नहीं है। मनुष्य और पक्षियों के मध्य एक अनूठा रिश्ता सदा से रहता आया है। इस रिश्ते में नैसर्गिक वात्सल्य का भी पुट है और पारस्परिक सहयोग व आदान-प्रदान का भी। इस दुनिया को जो चीजें रहने लायक और हंसी-खुशी रहने लायक बनाती हैं, उनमें कुछ भोले-से, कुछ खब्ती-से, कुछ नटखट तो कुछ सयाने ये पंछी भी शामिल हैं।
वापस ब्रिटिश-ऑस्ट्रेलियाई शोध पर लौटें, तो पक्षियों के हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की अनेक मिसालें सामने आती रही हैं। मसलन, अमेरिका में 1970 के दशक में सारस की एक प्रजाति विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई थी। उसके संरक्षण के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास चल रहे थे। संरक्षणकर्ता चाहते थे कि ये सारस मनुष्यों से जितना दूर रह सकें, दूर ही रहें क्योंकि मनुष्य इन्हें नुकसान पहुंचाते हैं और यदि ये मनुष्यों के सान्निाध्य के आदी हो गए, तो अनजाने में अपनी व अपनी प्रजाति की मौत को बुलावा देंगे। उधर क्लैरिस नामक महिला अपने आंगन में पक्षियों के लिए खूब दाना डालकर रखा करती थी। सारसों के एक समूह की नजर यहां पड़ी और वे नियमित रूप से क्लैरिस के आंगन में आने लगे। देखते ही देखते उन्होंने इस आंगन को मानो अपना घर ही बना लिया। मगर संरक्षणकर्ता तो इन्हें मनुष्यों से दूर रखना चाहते थे। सो उन्होंने क्लैरिस से आग्रह किया कि वे अपने आंगन में दाना डालना बंद कर दें। मगर क्लैरिस ने साफ इनकार कर दिया। कारण यह कि उनके पति अलजाइमर रोग से पीड़ित थे। वे अपने में सिमटे, गुमसुम रहते थे मगर जैसे ही आंगन में ये खूबसूरत सारस दिखाई देते, उनके चेहरे पर मुस्कान दौड़ जाती। खुशी मानो कुछ पलों के लिए उनके जीवन में लौट आती। जो काम कोई दवा न कर पाई थी, वह इन पंछियों ने कर दिखाया था...
अफ्रीका के तंजानिया व मोजांबिक में 'हनीगाइड" नामक पक्षी पाए जाते हैं। इनका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि ये वाकई गाइड की तरह मुनष्यों को मधुमक्खियों के छत्तों तक ले जाते हैं। शहद निकालने वालों और इन वन्य पक्षियों के बीच एक बिल्कुल अनूठा संबंध पनप गया है। जंगलों के ऊंचे पेड़ों पर या पहाड़ियों में बने छत्ते, जो इंसान को नजर नहीं आ पाते, उन्हें ये पक्षी खोज निकालते हैं। फिर शहद निकालने वालों के पास जाकर एक खास तरह की ध्वनि निकालते हैं और यहां से वहां छोटी-छोटी उड़ान भरकर उस दिशा को इंगित करते हैं, जहां चलना है। उनके इंसानी मित्र उनके दिखाए रास्ते पर चल पड़ते हैं। छत्ते तक पहुंच जाने पर मनुष्य अपने 'हुनर" से धुआं वगैरह करके मधुमक्खियों को भगा देते हैं व शहद निकाल देते हैं। अब छत्ते में बचा मोम हनीबर्ड्स की दावत बनता है। दरअसल इसी दावत की प्राप्ति के लिए इन्होंने शहद निकालने वाले मनुष्यों के साथ यह रिश्ता बनाया है। मधुमक्खियों के हमले के डर से ये सीधे छत्तों तक नहीं पहुंच सकते, सो इंसानी मदद लेते हैं और बदले में इंसानों का भी भला करते हैं!

कुछ समय पहले गेबी नामक बच्ची के बारे में पढ़ा था, जिसकी इधर-उधर खाना गिराने की आदत ने उसे मोहल्ले के कौओं की दोस्त बना दिया। कौए रोज उसके आने-जाने का इंतजार करने लगे। फिर गेबी व उसकी मां बाकायदा कौओं के लिए आंगन में खाना डालने लगीं। अब एक अजीब-सी बात देखने में आई। कौए जब खाना चट कर लौट जाते, तो अपने पीछे गेबी के लिए लाए कुछ 'तोहफे" छोड़ जाते, जैसे कान की बाली, स्क्रू, शीशे का टुकड़ा आदि। मानो वे अपनी इस नन्ही अन्नापूर्णा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे हों! सच तो यह है कि पंछी हमारे लिए इन छोटे-छोटे भौतिक उपहारों से कहीं बढ़कर तोहफे लेकर आते हैं...

Saturday, 11 February 2017

"मेरे देश का कपड़ा...!"

कोई छः-सात साल का वह बालक शायद अपने पापा की बाइक को साफ करने का शौक पूरा करने एक हाथ में पानी स्प्रे करने वाली बोतल और दूसरे में कपड़ा लेकर बाहर निकला। मगर बाहर अपनी ही लगभग हमउम्र दोस्तों को देख उनके साथ खेलने लगा। खेल-खेल में शरारत सूझी और वह दोनों लड़कियों पर पानी स्प्रे करने लगा। लडकियां इधर-उधर भागने लगीं, वह पानी छिड़कता गया। बड़ी वाली लड़की डांटने लगी, "इतनी ठंड है और तू पानी डाल रहा है!" बालक को अपनी भूल का एहसास हुआ और वह दूसरे हाथ में थामे कपड़े से अपनी दोस्त के चेहरे पर लगा पानी पोछने लगा। मगर इस पर वह और भड़क गई। "तूने मेरे मुंह पर ये गन्दा कपड़ा लगाया!" बालक तपाक से बोल पड़ा, "ए भाई, ये कपड़ा गन्दा नईं है, हो!" मगर उसकी सफाईपसंद दोस्त संतुष्ट नहीं हुई और उसे चपत-पर-चपत मारने लगी और दोहराती रही, "तूने मुंह पर गंदा कपड़ा लगाया...।" थोड़ी और मार खा लेने के बाद बालक अचानक अपने कंधे चौड़े करके बोल पड़ा, "तो क्या? ये मेरे देश का कपड़ा है!"
अभी जीवन का एक दशक पूरा करने से दूर वह मासूम न जाने कैसे सीख चुका है कि अपनी गलत करतूतों पर पर्दा डालने की लिए देश (और देशभक्ति) की आड़ लेना मुफ़ीद रहता है...।
...(अपने ड्रॉइंग रूम की खिड़की से देखी सत्य घटना)।

Thursday, 2 February 2017

चार चोरों का रक्षा कवच

आखिर उन कुख्यात चोरों ने ऐसा कौन-सा रक्षा कवच ईजाद कर लिया था कि वे जानलेवा महामारी के बीच भी बेधड़क चोरियां किए जा रहे थे...?
***

मध्ययुगीन योरप में प्लेग फैला हुआ था। फ्रांस भी इस महामारी से अछूता नहीं था। चारों ओर मौत का तांडव जारी था। शायद ही कोई घर हो जहां इस दर्दनाक मौत ने दस्तक न दी हो। इस सबके बीच, टुलुज शहर में लगातार चोरी की वारदातें हो रही थीं। दिन में इत्र बेचने वाले चार शख्स रात को बेधड़क घरों में घुस-घुसकर जो हाथ आता, चुरा ले जाते। किसी घर में कोई जीवित न होता, केवल लाशें पड़ी होतीं जिनका अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई न होता। तो किसी घर में मृत्यु के कगार पर पहुंच चुके प्लेग रोगी होते, जो चोरों को रोकने में असमर्थ होते। महामारी और मौत के हाहाकार के बीच ये चोरियां प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गई थीं। आखिरकार चोर पकड़े गए और अदालत में पेश किए गए। उन्होंने अपना अपराध कबूल भी कर लिया मगर जज साहब को एक सवाल लगातार परेशान कर रहा था। वह यह कि जो बीमारी महामारी बनकर चारों ओर फैली हुई थी, उससे ये चारों चोर कैसे बच गए! वह भी तब, जबकि वे रोज प्लेग पीड़ितों और इससे मरने वालों की लाशों के पास इतना-इतना समय बिताया करते थे! जज ने चोरों के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर तुम लोग प्लेग से बच निकलने का राज बताओ, तो तुम्हारी सजा माफ कर दी जाएगी।
तब चोरों ने अपनी सेहत का जो राज बताया, उसे सुनकर जज समेत सभी चौंक गए। उन्होंने बताया कि वे सेब के सिरके में लहसुन व कुछ जड़ी-बूटियां मिलाकर प्रतिदिन न केवल इसका सेवन करते थे, बल्कि प्लेग पीड़ितों के पास जाने से पहले अपने सिर से पांव तक यह सिरका लगा लेते थे। यही उनका रक्षा कवच था और इसी की बदौलत वे इतने दिनों से महामारी के बीच भी चोरियां करते फिर रहे थे। यह किंवदंति कितनी सच है और कितनी गप्प, यह विवाद का विषय है मगर प्लेग से बचाव का यह नुस्खा 'चार चोरों वाला सिरका" के नाम से मशहूर हो गया और आज भी है।
विभिन्ना रोगों में सिरके के उपयोग से होने वाले लाभों का बखान सदियों से होता आया है। आयुर्वेद में भी औषधि के रूप में इसके उपयोग का उल्लेख आता है। मिस्र में मिले 3000 ईसा पूर्व के कुछ मर्तबानों में सिरके के अंश मिले हैं, जिससे उस समय भी इसके इस्तेमाल का पता चलता है। वैसे कहा यह भी जाता है कि पहले-पहल सिरके का उपयोग महज सफाई के लिए किया जाता था। भोजन व चिकित्सा का हिस्सा यह बाद में बना। सिरके के गुणों को देखते हुए इसका विविध प्रकार से उपयोग किया गया और साथ ही इसे लेकर भांति-भांति के दावे किए गए, मिथक गढ़े गए। ऐसा ही एक किस्सा मिस्र की महारानी क्लियोपेट्रा को लेकर है। वह यह कि एक बार क्लियोपेट्रा ने अपने प्रेमी रोमन सेनापति मार्क एंथनी से शर्त लगाई कि वह संसार का सबसे महंगा भोजन परोस सकती है। फिर उसने सिरके से भरे दो ग्लास मंगवाए। उसने अपने कानों में दुनिया के दो सबसे बड़े मोतियों के झुमके पहन रखे थे। एक झुमके से मोती निकालकर उसने एक ग्लास में डाला, तो मोती सिरके में घुल गया। क्लियोपेट्रा उसे पी गई और फिर दूसरा मोती निकालकर अपने मेहमान के सिरके के ग्लास में डालने जा रही थी कि एंथनी के साथी प्लैंकस ने उसे रोक दिया और शर्त का विजेता घोषित कर दिया।

दूसरी-तीसरी सदी ईसा पूर्व हुए अफ्रीकी सेनापति हैनिबल द्वारा रोम कूच करने और हाथियों पर सवार हो आल्प्स पर्वत पार करने को लेकर कई किंवदंतियां हैं। इनमें से एक यह भी है कि रास्ते में आने वाली बड़ी चट्टानों पर हैनिबल ने सिरका डलवाकर उनके छोटे-छोटे टुकड़े करवाए ताकि उन टुकड़ों को आसानी से हटाकर सेना आगे बढ़ सके। सत्रहवीं सदी में फ्रांस के राजा लुई 13वें की सेना अपनी तोपों को इस्तेमाल के बाद ठंडा करने के लिए उन पर सिरका लगाया करती थी। जापान के समुराई लड़ाके अपनी ताकत बढ़ाने के लिए नियमित रूप से चावल के सिरके का सेवन किया करते थे। रोमन सैनिक भी ताकत और ताजगी के लिए सिरका पीते थे। वहीं अमेरिकी गृहयुद्ध से लेकर प्रथम विश्व युद्ध तक सेनाओं में इसका इस्तेमाल एंटीसेप्टिक के तौर पर घावों पर लगाने के लिए किया जाता था। 

Sunday, 22 January 2017

सिंहासन पर सूर्य की संतान

मानव सदा सूर्य के प्रताप का कायल रहा है और शासक अपना संबंध सूर्य से जोड़ते रहे हैं। अनेक देशों के शासक सूर्यवंशी होने का दावा करते आए हैं।
***

सूर्य का हमारे जीवन, हमारी संस्कृति और हमारी आस्थाओं में क्या स्थान है, यह सर्वविदित है। पृथ्वी को जीवन ऊर्जा प्रदान करने वाले सूर्य की महत्ता लगभग हर युग में, हर कहीं स्वीकार की गई है। यही कारण है कि विभिन्ना रूपों में सूर्य की पूजा मानव सभ्यता का अभिन्ना अंग रही है। दक्षिण अमेरिका के इन्का साम्राज्य में सूर्य देवता इन्टी को सृष्टि निर्माता वीराकोचा का पुत्र माना गया। समुद्र की देवी उनकी मां थीं और पृथ्वी तथा चंद्रमा उसकी बहनें। चूंकि सूर्य की कृपा से ही फसलें उगती थीं, सो इन्का लोगों के मन में इन्टी देव के प्रति असीम श्रद्धा थी। मगर सदा अपनी कृपा बरसाने वाले इन्टी कभी-कभी अपने भक्तों से रुष्ट भी हो जाते थे। सूर्य ग्रहण को उनके क्रोध का परिणाम माना जाता था। तब रुष्ट सूर्यदेव को मनाने के लिए विशेष चढ़ावे चढ़ाए जाते थे।
इस दक्षिण अमेरिकी सभ्यता में सूर्य के प्रति श्र्ाृद्धा इस कदर व्याप्त थी कि शासक वंश स्वयं को इन्टी, यानी सूर्य का ही वंशज बताता था। कहा जाता था कि पृथ्वीवासियों की अराजकता व असभ्यता से इन्टी दुखी थे, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र मान्को कपाक से कहा कि वह पृथ्वी पर जाए और मनुष्यों को सही तरीके से जीना सिखाए। इस प्रकार मान्को कपाक ने धरती पर सभ्यता की स्थापना की और प्रथम इन्का सम्राट बने। यह कुछ वैसा ही है, जैसे भारत में सूर्यवंश की उत्पत्ति सूर्य से मानी गई है। इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया आदि की कुछ जनजातियां भी स्वयं को सूर्य देव की वंशज मानती आई हैं। मिस्र में सम्राट को चित्रों में अक्सर सिर पर सूर्य को धारण किए हुए दर्शाया जाता था।
सूर्य की शक्ति का कायल होने के लिए आदि काल से ही मनुष्य के पास अनेक कारण थे। ऊर्जा के इस अनंत स्रोत से ही समस्त सृष्टि जीवन पाती है। आसमान में विराजित सूर्य की नजर से समस्त संसार में कुछ भी छुपा नहीं रह सकता। फिर, यह भी है कि सूर्य प्रकाश का परम स्रोत है और प्रकाश को हमेशा से ज्ञान के साथ जोड़ा जाता आया है। सो सूर्य ज्ञानवान भी माना गया। वह अपना प्रकाश व अपनी ऊष्मा समूचे संसार को समान रूप से प्रदान करता है, इसलिए वह न्यायप्रिय भी हुआ। इस प्रकार सूर्य को उन गुणों से लैस पाया गया, जो शासक वर्ग स्वयं में दर्शाना चाहता है। यही कारण है कि हर दौर, हर काल में शासक अपना संबंध सूर्य से जोड़ते आए हैं। उधर मेसोपोटामिया में राजा को 'मेरे आका" की तर्ज पर 'मेरे सूर्य" कहकर संबोधित किया जाता था।
वापस इन्का सभ्यता की बात करें, तो वहां तीन नैतिक सिद्धांतों पर जोर दिया जाता था। ये थे- चोरी मत करोे, झूठ मत बोलो और आलस मत करो। मान्यता यह थी कि जो लोग इन सिद्धांतों का पालन करते हैं, वे मृत्यु के बाद सूर्य की ऊष्मा के बीच रहते हैं और जो इनका पालन नहीं करते, उन्हें मृत्यु उपरांत सर्द धरती पर ही सदा के लिए रहना होता है। जांबिया की जनजातियां मानती आई हैं कि आसमान के देवता सूर्य पर वास करते हैं। इसी प्रकार मिस्र में कहा जाता था कि सृष्टि का सृजन करने वाले अमुन देव सूर्य पर रहते हैं। घाना व माली जैसे अफ्रीकी देशों में भी सृष्टि निर्माता का वास सूर्य पर माना गया था।

धारणाएं व अस्थाएं अनेक हैं मगर ये सब यही दर्शाती हैं कि सूर्य हमेशा से मानव को विस्मित करता आया है। और यह तय है कि आसमान में टंगा यह आग का विराट गोला जब तक धधकता रहेगा, तब तक विस्मय का रिश्ता बना रहेगा।